Puruṣottama-yoga
The Discipline of the Supreme Person) — Chapter 15 (Bhagavadgītā
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् । सर्वाश्चर्यमयं" देवमनन्तं* विश्वतोमुखम्,अनेक मुख और नेत्रोंसे युक्त, अनेक अद्भुत दर्शनोंवाले,5 बहुत-से दिव्य भूषणोंसे युक्त” और बहुत-से दिव्य शस्त्रोंको हाथोंमें उठाये हुए,*९ दिव्य माला और वस्त्रोंको धारण किये हुए*5 और दिव्य गन्धका सारे शरीरमें लेप किये हुए, सब प्रकारके आश्वर्योंसे युक्त, सीमारहित और सब ओर मुख किये हुए विराट्स्वरूप परमदेव परमेश्वरको अर्जुनने देखा हे अर्जुन! जो पुरुष केवल मेरे ही लिये सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंको करनेवाला है, मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्ति-रहित है और सम्पूर्ण भूतप्राणियोंमें वैरभावसे रहित है--वह अनन्य भक्तियुक्त पुरुष मुझको ही प्राप्त होता है* ।। इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्धगवदगीतापर्वणि श्रीमद्भधगवद्गीतासूपनिषत्तसु ब्रह्मुविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नामैकादशो<ध्याय:
sañjaya uvāca | divya-mālyāmbara-dharaṁ divya-gandhānulepanam | sarvāścarya-mayaṁ devam anantaṁ viśvato-mukham ||
Sanjaya berkata: Arjuna melihat Sang Dewa dalam rupa Virat—mengenakan kalung bunga dan busana surgawi, terurapi wewangian ilahi, penuh segala keajaiban, tanpa batas, dan menghadap ke segala arah.
संजय उवाच