कर्मयोग–ज्ञानयज्ञ–अवतारोपदेश
Karma-Yoga, Jñāna-Yajña, and Avatāra Instruction
सम्बन्ध-- बारहवें और तेरहवें श्लोकोंमें भगवान्ने आत्माकी नित्यता और निर्विकारताका प्रतिपादन किया तथा चौदहवें श्लोकमें इच्ध्रियोंके साथ विषयोंके संयोगोंको अनित्य बतलाया; किंतु आत्मा क्यों नित्य है और ये संयोग क्यों अनित्य हैं? इसका स्पष्टीकरण नहीं किया गया; अतएव इस श*लोकमें भगवान् नित्य और अनित्य वस्तुके विवेचनकी रीति बतलानेके लिये दोनोंके लक्षण बतलाते हैं-- नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । उभयोरपि दृष्टोडन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभि:,असत् वस्तुकी तो सत्ता नहीं है और सत्का अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनोंका ही तत्त्व तत्त्वज्ञानी पुरुषोंद्वारा देखा गया है
nāsato vidyate bhāvo nābhāvo vidyate sataḥ | ubhayor api dṛṣṭo 'ntas tv anayos tattvadarśibhiḥ ||
Yang tidak nyata tidak pernah sungguh-sungguh menjadi; yang nyata tidak pernah lenyap. Kebenaran akhir tentang keduanya telah disaksikan oleh para bijak yang melihat hakikat.
संजय उवाच