कर्मयोग–ज्ञानयज्ञ–अवतारोपदेश
Karma-Yoga, Jñāna-Yajña, and Avatāra Instruction
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्गीतापवके अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं यणेशासत्ररूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्: श्रीकृष्णाजुनसंवादमें अर्जुनविषादयोग नामक पहला अध्याय पूरा हुआ,नफशमा न () अमन - 'कौरवोंको देख” इन शब्दोंका प्रयोग करके भगवानने यह भाव दिखलाया है कि “इस सेनामें जितने लोग हैं, प्रायः सभी तुम्हारे वंशके तथा आत्मीय स्वजन ही हैं। उनको तुम अच्छी तरह देख लो।” भगवान्के इसी संकेतने अर्जुनके अन्तःकरणमें छिपे हुए कुट॒ुम्ब-स्नेहको प्रकट कर दिया, मानो अर्जुनको निमित्त बनाकर लोककल्याण करनेके लिये स्वयं भगवानने ही इन शब्दोंके द्वारा उनके हृदयमें ऐसी भावना उत्पन्न कर दी, जिसमें उन्होंने युद्ध करनेसे इन्कार कर दिया और उसके फलस्वरूप साक्षात् भगवानके मुखारविन्दसे त्रिलोकपावन दिव्य गीतामृतकी ऐसी परम मधुर धारा बह निकली, जो अनन्त कालतक अनन्त जीवोंका परम कल्याण करती रहेगी। ३. वसिष्ठस्मृतिमें आततायीके लक्षण इस प्रकार बतलाये गये हैं-- अग्निदो गरदश्नैव शस्त्रपाणिर्धनापह: । क्षेत्रदारापहर्ता च षडेते ह्याततायिन: | (३।१९) “आग लगानेवाला, विष देनेवाला, हाथमें शस्त्र लेकर मारनेको उद्यत, धन हरण करनेवाला, जमीन छीननेवाला और स्त्रीका हरण करनेवाला--ये छहों ही आततायी हैं।' $. पाँच हेतु ऐसे हैं, जिनके कारण मनुष्य अधर्मसे बचता है और धर्मको सुरक्षित रखनेमें समर्थ होता है --ईश्वरका भय, शास्त्रका शासन, कुलमर्यादाओंके टूटनेका डर, राज्यका कानून और शारीरिक तथा आर्थिक अनिष्टकी आशंका। इनमें ईश्वर और शास्त्र सर्वथा सत्य होनेपर भी वे श्रद्धापर निर्भर करते हैं, प्रत्यक्ष हेतु नहीं हैं। राज्यके कानून प्रजाके लिये ही प्रधानतया होते हैं; जिनके हाथोंमें अधिकार होता है, वे उन्हें प्रायः नहीं मानते। शारीरिक तथा आर्थिक अनिष्टकी आशंका अधिकतर व्यक्तिगत रूपमें हुआ करती है। एक कुल-मर्यादा ही ऐसी वस्तु है, जिसका सम्बन्ध सारे कुटुम्बके साथ रहता है। जिस समाज या कुलमें परम्परासे चली आती हुई शुभ और श्रेष्ठ मर्यादाएँ नष्ट हो जाती हैं, वह समाज या कुल बिना लगामके मतवाले घोड़ोंके समान यथेच्छाचारी हो जाता है। यथेच्छाचार किसी भी नियमको सहन नहीं कर सकता, वह मनुष्यको उच्छृंखल बना देता है। जिस समाजके मनुष्योंमें इस प्रकारकी उच्छुंखलता आ जाती है, उस समाज या कुलमें स्वाभाविक ही सर्वत्र पाप छा जाता है। २. प्रत्येक अध्यायकी समाप्तिपर जो उपर्युक्त पुष्पिका दी गयी है, इसमें श्रीमद्भगवद्गीताका माहात्म्य और प्रभाव ही प्रकट किया गया है। “& तत्सत्” भगवानके पवित्र नाम हैं (गीता १७।२३), स्वयं श्रीभगवान्के द्वारा गायी जानेके कारण इसका नाम “श्रीमद्धगवद्गीता' है, इसमें उपनिषदोंका सारतत्त्व संगृहीत है और यह स्वयं भी उपनिषद् है, इससे इसको “उपनिषद्” कहा गया है, निर्मुण-निराकार परमात्माके परमतत्त्वका साक्षात्कार करानेवाली होनेके कारण इसका नाम “ब्रह्मविद्या' है और जिस कर्मयोगका योगके नामसे वर्णन हुआ है, उस निष्कामभावपूर्ण कर्मयोगका तत्त्व बतलानेवाली होनेसे इसका नाम “योगशास्त्र” है। यह साक्षात् परमपुरुष भगवान् श्रीकृष्ण और भक्तवर अर्जुनका संवाद है और इसके प्रत्येक अध्यायमें परमात्माको प्राप्त करानेवाले योगका वर्णन है, इसीसे इसके लिये श्रीकृष्णार्जुनसंवादे'"+ न योगो नाम” कहा गया है। षड्विशो<5ध्याय: (श्रीमद्धगवद्गीतायां द्वितीयो5ध्याय:) अर्जुनको युद्धके लिये उत्साहित करते हुए भगवान्के द्वारा नित्यानित्य वस्तुके विवेचनपूर्वक सांख्ययोग, कर्मयोग एवं स्थितप्रज्ञकी स्थिति और महिमाका प्रतिपादन सम्बन्ध--पहले अध्यायमें गीतोक्त उपदेशकी प्रस्तावनाके रूपमें दोनों सेनाओंके महाराथियोंका और उनकी शंखध्वनिका वर्णन करके अजुनिका रथ दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा करनेकी बात कही गयी; उसके बाद दोनों सेनाओंगें स्थित स्वजनसमुदायको देखकर शोक और मोहके कारण अर्जुनिके युद्धसे निवृत्त हो जानेकी और शस्त्र-अस्त्रोंकी छोड़कर विषाद करते हुए बैठ जानेकी बात कहकर उस अध्यायकी समाप्ति की गयी। ऐसी स्थितिमें भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनसे क्या बात कही और किस प्रकार उसे युद्धके लिये पुनः तैयार किया; यह सब बतलानेकी आवश्यकता होनेपर संजय अर्जुनकी स्थितिका वर्णन करते हुए दूसरे अध्यायका आरम्भ करते हैं-- संजय उवाच त॑ तथा कृपयादविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् । विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदन: संजय बोले--इस प्रकार करुणासे व्याप्त और आँसुओंसे पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रोंवाले शोकमुक्त उस अर्जुनके प्रति भगवान् मधुसूदनने यह वचन कहा
sañjaya uvāca |
taṁ tathā kṛpayāviṣṭam aśru-pūrṇākulekṣaṇam |
viṣīdantam idaṁ vākyam uvāca madhusūdanaḥ ||
Sanjaya berkata: Melihat Arjuna demikian—diliputi belas kasih, matanya gelisah dan penuh air mata, jiwanya tenggelam dalam duka—Madhusudana (Sri Krishna) berkata kepadanya demikian.
संजय उवाच
The verse sets up Krishna’s corrective teaching: compassion and attachment, when they lead to paralysis and abandonment of rightful duty, must be examined and transformed into clear discernment (viveka) aligned with dharma.
Sanjaya describes Arjuna’s emotional collapse—tearful, shaken, and despondent—after seeing his kin on both sides. In response, Krishna begins speaking, initiating the main instruction of the Gita in the second chapter.