त्वां तु चक्षुर्णं प्राप्प दग्धो घोरेण चक्षुषा । 'ये सत्यप्रतिज्ञ महारथी भीष्म सम्पूर्ण शास्त्रोंके पारंगत विद्वान् थे। इन्हें मनुष्य तथा सम्पूर्ण देवता मिलकर भी मार नहीं सकते थे। आप दृष्टिपातमात्रसे ही दूसरोंको भस्म करनेमें समर्थ हैं। आपके पास पहुँचकर भीष्म आपकी घोर दृष्टिसे ही नष्ट हो गये हैं' | ६७ £ न् एवमुक्तो धर्मराज: प्रत्युवाच जनार्दनम्,उनके ऐसा कहनेपर धर्मराज युधिष्ठिरने भगवान् श्रीकृष्णको इस प्रकार उत्तर दिया --'श्रीकृष्ण! आप हमारे आश्रय हैं तथा आप ही भक्तोंको अभय दान करनेवाले हैं। आपके ही कृपा-प्रसादसे विजय होती है और आपके ही रोषसे पराजय प्राप्त होती है
sañjaya uvāca | tvāṃ tu cakṣurṇaṃ prāpya dagdho ghoreṇa cakṣuṣā |
Sañjaya berkata: “Namun begitu ia masuk dalam jangkauan pandanganmu, ia hangus—dilalap oleh kedahsyatan matamu.”
संजय उवाच