बभ्रुवाहन-धनंजययोः संग्रामः
Babhruvāhana and Dhanaṃjaya’s engagement at Maṇipūra
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३३ श्लोक हैं) है ० बक। हक २ >> अष्टसप्ततितमो< ध्याय: अर्जुनका सैन्धवोंके साथ युद्ध और दुःशलाके अनुरोधसे उसकी समाप्ति वैशम्पायन उवाच ततो गाण्डीवभृच्छूरो युद्धाय समुपस्थित: । विबभौ युधि दुर्धर्षो हिमवानचलो यथा,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर गाण्डीवधारी शूरवीर अर्जुन युद्धके लिये उद्यत हो गये। वे शत्रुओंके लिये दुर्जय थे और युद्धभूमिमें हिमवान् पर्वतके समान अचल भावसे डटे रहकर बड़ी शोभा पाने लगे इस प्रकार श्रीमह्ााभारत आश्वमेधिकपववके अन्तर्गत अनुगीतापर्वनें सैन्धवोंकी पराजयविषयक अठठत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ७८ ॥ ऑपनऔक्रात छा अ्-काजज एकोनाशीतितमो< ध्याय: अर्जुन और बश्रुवाहनका युद्ध एवं अर्जुनकी मृत्यु वैशम्पायन उवाच श्रुत्वा तु नृपतिः प्राप्त पितरं बश्रुवाहन: । निर्ययौ विनयेनाथ ब्राह्माणार्थपुर:सर:
Vaiśampāyana uvāca | tato gāṇḍīvabhṛcchūro yuddhāya samupasthitaḥ | vibhau yudhi durdharṣo himavānacalo yathā ||
Vaiśampāyana berkata: Setelah itu Arjuna, sang pahlawan pemegang busur Gāṇḍīva, tampil siap berperang. Di medan laga ia bersinar—tak tergoyahkan oleh musuh—tegak laksana gunung Himālaya.
वैशम्पायन उवाच