Adhyaya 81
Anushasana ParvaAdhyaya 8127 Verses

Adhyaya 81

गोशकृन्माहात्म्य-प्रश्नः (On the Merit of Cow-Dung and the Abode of Śrī) / Inquiry into the Sanctity of Cow-Dung

Upa-parva: Go-mahātmyopākhyāna (Episode on the Sanctity of Cows and the Abode of Śrī)

Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma about a received claim: that cow-dung is associated with Śrī (prosperity), expressing doubt and requesting clarification (1). Bhīṣma replies by citing an ancient itihāsa: a dialogue involving cows and Śrī (2). Śrī appears in a beautiful form among the cows; they inquire who she is and where she intends to go (3–5). Śrī identifies herself as the famed Śrī, stating that gods and sages prosper when she is present, while those she rejects become deprived of dharma, artha, and kāma (6–9). She requests permanent residence among the cows. The cows refuse, characterizing her as unstable and unnecessary to them (10–11). Śrī challenges the refusal, noting that many beings seek her through austerity and that rejecting her may result in her being dishonored publicly (12–18). She asks for protection and at least a partial dwelling in one limb/part of them, requesting instruction on where she may reside (19–21). The cows deliberate and grant her residence in their dung and urine, calling it auspicious for them (22–23). Śrī accepts, blessing them, and then disappears (24–25). Bhīṣma concludes by stating that he has described the greatness of cow-dung and will further describe the greatness of cows (26).

Chapter Arc: भीष्म युधिष्ठिर को इक्ष्वाकुवंशी राजा सौदास और ब्रह्मतेज से दीप्त पुरोहित वसिष्ठ की कथा में ले जाते हैं—राजा पूछता है कि त्रैलोक्य में परम पवित्र क्या है, जिसका कीर्तन मनुष्य को उत्तम पुण्य दे। → वसिष्ठ उत्तर में ‘गौ’ को सनातन पवित्रता का आधार बताते हैं—गौ का दान, सेवा, और स्मरण भय-निवारक है; साथ ही गौ के प्रति आचरण-संहिता रखी जाती है: गोमूत्र-गोबर से घृणा न करना, गौमांस का त्याग, नित्य गो-नाम-संकीर्तन, अपमान से बचना। → वसिष्ठ का निर्णायक उद्घोष: ‘गावो भूतं च भव्यं च’—गौ ही भूत-भविष्य, पुष्टिका सनातन स्रोत और लक्ष्मी का मूल हैं; गोषु दत्तं न नश्यति—गौ में दिया दान नष्ट नहीं होता, और संकट-काल में भी गो-कीर्तन भय से मुक्त करता है। → कथा विधि में उतरती है—गोदान के आदर्श रूप (स्वर्ण-मण्डित सींग, दुग्धवती, सुरभि-स्वभाव) और उसके फल का आश्वासन; साधक को नित्य स्मरण, सम्मान और शरण-भाव अपनाने का उपदेश देकर भीष्म अध्याय का उपसंहार करते हैं।

Shlokas

Verse 1

ऑपन--माजल छा टॉस: अष्टसप्ततितमो< ध्याय: वसिष्ठका सौदासको गोदानकी विधि एवं महिमा बताना भीष्म उवाच एतस्मिन्नेव काले तु वसिष्ठमृषिसत्तमम्‌ | इक्ष्वाकुवंशजो राजा सौदासो वदतां वर:,भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! एक समयकी बात है, वक्ताओंमें श्रेष्ठ इक्ष्वाकुवंशी राजा सौदासने सम्पूर्ण लोकोंमें विचरनेवाले, वैदिक ज्ञानके भण्डार, सिद्ध सनातन ऋषिषभ्रेष्ठ वसिष्ठजीसे, जो उन्हींके पुरोहित थे, प्रणाम करके इस प्रकार पूछना आरम्भ किया

Bhishma berkata: “Wahai Raja, pada waktu itu juga raja Saudāsa dari wangsa Ikshvaku—terkemuka di antara para penutur—mendatangi Vasiṣṭha, yang terbaik di antara para resi, pengembara segala loka, gudang kebijaksanaan Weda, resi yang sempurna dan abadi, serta pendeta keluarganya. Setelah bersujud hormat, Saudāsa mulai bertanya demikian.”

Verse 2

सर्वलोकचरं सिद्ध ब्रह्यकोशं सनातनम्‌ । पुरोहितमभिप्रष्टमभिवाद्योपचक्रमे,भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! एक समयकी बात है, वक्ताओंमें श्रेष्ठ इक्ष्वाकुवंशी राजा सौदासने सम्पूर्ण लोकोंमें विचरनेवाले, वैदिक ज्ञानके भण्डार, सिद्ध सनातन ऋषिषभ्रेष्ठ वसिष्ठजीसे, जो उन्हींके पुरोहित थे, प्रणाम करके इस प्रकार पूछना आरम्भ किया

Bhishma berkata: setelah memberi hormat, Saudāsa mulai mengajukan pertanyaan kepada Vasiṣṭha, pendeta keluarganya—seorang resi sempurna dan abadi, pengembara segala loka, serta khazanah pengetahuan Brahma dan Weda.

Verse 3

सौदास उवाच त्रैलोक्ये भगवन्‌ किंस्वित्‌ पवित्र कथ्यतेडनघ । यत्‌ कीर्तयन्‌ सदा मर्त्य: प्राप्तुयात्‌ पुण्यमुत्तमम्‌,सौदास बोले--भगवन्‌! निष्पाप महर्षे! तीनों लोकोंमें ऐसी पवित्र वस्तु कौन कही जाती है जिसका नाम लेनेमात्रसे मनुष्यको सदा उत्तम पुण्यकी प्राप्ति हो सके?

Saudāsa berkata: “Wahai Bhagavan, wahai resi yang tanpa noda—di tiga dunia, apakah yang dinyatakan sungguh menyucikan? Dengan senantiasa memuji atau melafalkan apa, seorang manusia fana dapat meraih kebajikan yang tertinggi?”

Verse 4

भीष्म उवाच तस्मै प्रोवाच वचन प्रणताय हित॑ तदा । गवामुपनिषद्धिद्वान्‌ नमस्कृत्य गवां शुचि:,भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! अपने चरणोंमें पड़े हुए राजा सौदाससे गवोपनिषद्‌ (गौओंकी महिमाके गूढ़ रहस्यको प्रकट करनेवाली विद्या) के विद्वान्‌ पवित्र महर्षि वसिष्ठने गौओंको नमस्कार करके इस प्रकार कहना आरम्भ किया--

Bhishma berkata: Saat itu, demi kebaikan raja yang bersujud penuh tunduk, resi suci Vasiṣṭha—yang menguasai ajaran rahasia tentang sapi (Gavām Upaniṣad)—lebih dahulu memberi hormat kepada sapi-sapi, lalu mulai mengucapkan wejangan yang membawa kesejahteraan bagi sang raja.

Verse 5

गाव: सुरभिगन्धिन्यस्तथा गुग्गुलुगन्धय: । गाव: प्रतिष्ठा भूतानां गाव: स्वस्त्ययनं महत्‌,“राजन! गौओंके शरीरसे अनेक प्रकारकी मनोरम सुगन्ध निकलती रहती है तथा बहुतेरी गौएँ गुग्गुलके समान गन्धवाली होती हैं। गौएँ समस्त प्राणियोंकी प्रतिष्ठा (आधार) हैं और गौएँ ही उनके लिये महान्‌ मंगलकी निधि हैं

Wahai Raja, dari tubuh sapi terpancar beragam keharuman yang menawan; banyak pula sapi yang semerbak seperti guggulu. Sapi adalah penopang semua makhluk, dan bagi mereka sapi merupakan sumber besar kesejahteraan serta pertanda baik.

Verse 6

गावो भूतं च भव्यं च गाव: पुष्टि: सनातनी | गावो लक्ष्म्यास्तथा मूलं गोषु दत्त न नश्यति,गौएँ ही भूत और भविष्य हैं। गौएँ ही सदा रहनेवाली पुष्टिका कारण तथा लक्ष्मीकी जड़ हैं। गौओंको जो कुछ दिया जाता है, उसका पुण्य कभी नष्ट नहीं होता

Sapi mencakup yang telah lampau dan yang akan datang. Sapi adalah sumber abadi pemeliharaan dan kekuatan hidup, serta akar kemakmuran (Lakṣmī). Apa pun yang didermakan kepada sapi, pahalanya tidak pernah lenyap.

Verse 7

अन्न हि परमं गावो देवानां परमं हवि: । स्वाहाकारवषट्कारीौ गोषु नित्यं प्रतिक्ठिती,'गौएँ ही सर्वोत्तम अन्नकी प्राप्तिमें कारण हैं। वे ही देवताओंको उत्तम हविष्य प्रदान करती हैं। स्वाहाकार (देवयज्ञ) और वषट्कार (इन्द्रयाग)--ये दोनों कर्म सदा गौओंपर ही अवलम्बित हैं

Sapi adalah sebab diperolehnya pangan yang utama, dan bagi para dewa sapi pula yang menjadi havis terbaik. Ucapan dan tata laku yajña ‘svāhā’ serta ‘vaṣaṭ’ senantiasa berlandaskan pada sapi.

Verse 8

गावो यज्ञस्य हि फल गोषु यज्ञा: प्रतिष्ठिता: । गावो भविष्यं भूतं च गोषु यज्ञा: प्रतिष्ठिता:,“गौएँ ही यज्ञका फल देनेवाली हैं। उन्हींमें यज्ञोंकी प्रतिष्ठा है। गौएँ ही भूत और भविष्य हैं। उन्हींमें यज्ञ प्रतिष्ठित हैं, अर्थात्‌ यज्ञ गौओंपर ही निर्भर है

Sapi adalah pemberi buah yajña; pada sapi yajña berdiri teguh. Sapi mencakup yang telah lampau dan yang akan datang; pada sapi yajña ditegakkan—artinya keberhasilan dan kelangsungan yajña pada akhirnya bergantung pada sapi.

Verse 9

सायं प्रातश्न सततं होमकाले महाद्युते । गावो ददति वै हौम्यमृषिभ्य: पुरुषर्षभ,“महातेजस्वी पुरुषप्रवर! प्रातः:काल और सायंकाल सदा होमके समय ऋषियोंको गौएँ ही हवनीय पदार्थ (घृत आदि) देती हैं

Bhīṣma berkata: “Wahai yang bercahaya agung, wahai banteng di antara manusia! Pada waktu persembahan pagi dan petang—yakni pada saat homa yang semestinya—sapi-sapi sendirilah yang menyediakan bahan persembahan (seperti ghee dan sejenisnya) bagi para resi.”

Verse 10

यानि कानि च दुर्गाणि दुष्कृतानि कृतानि च । तरन्ति चैव पाप्मानं धेनुं ये ददति प्रभो,'प्रभो! जो लोग (नवप्रसूतिका दूध देनेवाली) गौका दान करते हैं, वे जो कोई भी दुर्गम संकट आनेवाले होते हैं, उन सबसे अपने किये हुए दुष्कर्मोंस तथा समस्त पापसमूहसे भी तर जाते हैं

Bhīṣma berkata: “Wahai tuan, mereka yang mendermakan seekor sapi (dhenu) menyeberangi segala bahaya yang sukar dilalui; dan mereka pun melampaui noda dosa—mengatasi akibat dari perbuatan buruknya sendiri serta timbunan kesalahan yang menggunung.”

Verse 11

एकां च दशगुर्दद्याद्‌ दश दद्याच्च गोशती । शतं सहस्गुर्दद्यात्‌ सर्वे तुल्यफला हि ते,“जिसके पास दस गौएँ हों, वह एक गौका दान करे। जो सौ गायें रखता हो, वह दस गौओंका दान करे और जिसके पास एक हजार गौएँ मौजूद हों, वह सौ गौएँ दानमें दे दे तो इन सबको बराबर ही फल मिलता है

Bhīṣma berkata: “Orang yang memiliki sepuluh ekor sapi hendaknya mendermakan satu; yang memiliki seratus hendaknya mendermakan sepuluh; dan yang memiliki seribu hendaknya mendermakan seratus. Sebab semuanya berbuah sama, bila pemberian diukur menurut kadar kemampuan.”

Verse 12

अनाहिताग्नि: शतगुरयज्वा च सहस्रगुः । समृद्धों यश्व॒ कीनाशो नार्घ्यमर्हन्ति ते त्रयः,“जो सौ गौओंका स्वामी होकर भी अग्निहोत्र नहीं करता, जो हजार गौएँ रखकर भी यज्ञ नहीं करता तथा जो धनी होकर भी कृपणता नहीं छोड़ता--ये तीनों मनुष्य अर्घ्य (सम्मान) पानेके अधिकारी नहीं हैं

Bhīṣma berkata: “Tiga macam orang tidak layak menerima arghya—penghormatan dan persembahan hormat: (1) yang memiliki seratus sapi namun tidak menegakkan api suci (agnihotra), (2) yang memiliki seribu sapi namun tidak melakukan yajña, dan (3) yang makmur namun tetap kikir.”

Verse 13

कपिलां ये प्रयच्छन्ति सवत्सां कांस्यदोहनाम्‌ । सुव्रतां वस्त्रसंवीतामुभी लोकौ जयन्ति ते,'जो उत्तम लक्षणोंसे युक्त कपिला गौको वस्त्र ओढ़ाकर बछड़ेसहित उसका दान करते हैं और उसके साथ दूध दुहनेके लिये एक कॉँस्यका पात्र भी देते हैं, वे इहलोक और परलोक दोनोंपर विजय पाते हैं

Bhīṣma berkata: “Mereka yang menghadiahkan seekor sapi kapilā (berwarna keemasan) beserta anaknya—dihias dan diselubungi kain—serta menyertakan bejana perunggu untuk memerah susu, meraih kemenangan di kedua alam: dunia ini dan dunia sana.”

Verse 14

महर्षि वशिष्ठका राजा सौदाससे गौओंका माहात्म्य-कथन युवानमिन्द्रियोपेतं शतेन शतयूथपम्‌ । गवेन्द्रं ब्राह्मणेन्द्राय भूरिशंगमलड्कृतम्‌,'शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! जो लोग जवान, सभी इन्द्रियोंसे सम्पन्न, सौ गायोंके यूथपति, बड़ी-बड़ी सींगोंवाले गवेन्द्र वृषभ (साँड़) को सुसज्जित करके सौ गायोंसहित उसे श्रोत्रिय ब्राह्मणको दान करते हैं, वे जब-जब इस संसारमें जन्म लेते हैं, तब-तब महान्‌ ऐश्वर्यके भागी होते हैं

Bhishma berkata: “Wahai raja penakluk musuh! Mereka yang menghias dan menghadiahkan kepada brahmana śrotriya—yang menguasai Weda—seekor lembu jantan agung, muda dan sempurna pancaindranya, pemimpin seratus kawanan, bertanduk besar, beserta seratus ekor sapi, akan meraih kemakmuran besar. Setiap kali mereka terlahir kembali di dunia ini, berulang kali mereka menjadi pemilik bagian dari kejayaan dan kekayaan yang melimpah.”

Verse 15

वृषभ ये प्रयच्छन्ति श्रोत्रियाय परंतप । ऐश्वर्य तेडधिगच्छन्ति जायमाना: पुनः पुन:,'शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! जो लोग जवान, सभी इन्द्रियोंसे सम्पन्न, सौ गायोंके यूथपति, बड़ी-बड़ी सींगोंवाले गवेन्द्र वृषभ (साँड़) को सुसज्जित करके सौ गायोंसहित उसे श्रोत्रिय ब्राह्मणको दान करते हैं, वे जब-जब इस संसारमें जन्म लेते हैं, तब-तब महान्‌ ऐश्वर्यके भागी होते हैं

Wahai penakluk musuh! Mereka yang menghadiahkan seekor lembu jantan kepada brahmana śrotriya memperoleh kemakmuran; dan ketika terlahir kembali berulang kali di dunia ini, mereka pun berulang kali menjadi pemilik bagian dari kejayaan besar.

Verse 16

नाकीर्तयित्वा गा: सुप्यात्‌ तासां संस्मृत्य चोत्पतेत्‌ । सायंप्रातर्नमस्येच्च गास्ततः पुष्टिमाप्तुयात्‌,“गौओंका नाम-कीर्तन किये बिना न सोये। उनका स्मरण करके ही उठे और सबेरे- शाम उन्हें नमस्कार करे। इससे मनुष्यको बल एवं पुष्टि प्राप्त होती है

Janganlah tidur tanpa melantunkan nama-nama (pujian) sapi. Bangunlah dengan mengingat mereka, dan pagi serta petang bersujud hormat kepada sapi. Dengan demikian, seseorang memperoleh kekuatan dan keteguhan tubuh—kesejahteraan yang menyehatkan.

Verse 17

गवां मूत्रपुरीषस्य नोद्विजेत कथंचन । न चासां मांसमश्रीयाद्‌ गवां पुष्टिं तथाप्लुयात्‌,“गौओंके मूत्र और गोबरसे किसी प्रकार उद्विग्न न हो--घृणा न करे और उनका मांस न खाय। इससे मनुष्यको पुष्टि प्राप्त होती है

Jangan sekali-kali merasa jijik terhadap air kencing dan kotoran sapi, dan jangan pula memakan dagingnya. Dengan sikap demikian, seseorang memperoleh pemeliharaan, kesehatan, dan kesejahteraan.

Verse 18

गाक्ष संकीर्तयेन्नित्यं नावमन्येत तास्तथा । अनिष्टं स्वप्रमालक्ष्य गां नर: सम्प्रकीर्तयेत्‌,“प्रतिदिन गौओंका नाम ले। उनका कभी अपमान न करे। यदि बुरे स्वप्न दिखायी दें तो मनुष्य गोमाताका नाम ले

Setiap hari hendaknya melantunkan dan mengingat nama-nama sapi, serta jangan pernah merendahkan mereka. Bila melihat mimpi yang tidak baik, seseorang harus segera menyebut nama sapi itu dengan hormat—sebagai seruan perlindungan dan ingatan suci.

Verse 19

गोमयेन सदा स्नायात्‌ करीषे चापि संविशेत्‌ । श्लेष्ममूत्रपुरीषाणि प्रतिघातं च वर्जयेत्‌,“प्रतिदिन शरीरमें गोबर लगाकर स्नान करे। सूखे हुए गोबरपर बैठे। उसपर थूक न फेंके, मल-मूत्र न छोड़े तथा गौओंके तिरस्कारसे बचता रहे

Hendaknya seseorang setiap hari mandi setelah mengoleskan kotoran sapi, dan juga duduk atau berbaring di atas kotoran sapi yang telah kering. Jangan meludah atau membuang dahak di atasnya, jangan buang air kecil atau besar di sana, dan jauhilah segala perbuatan yang menghina atau melukai sapi.

Verse 20

सादे चर्मणि भुञज्जीत निरीक्षेद्‌ वारुणीं दिशम्‌ । वाग्यत: सर्पिषा भूमौ गवां पुष्टिं सदाश्नुते,'भीगे हुए गोचर्मपर बैठकर भोजन करे। पश्चिम दिशाकी ओर देखे और मौन हो भूमिपर बैठकर घीका भक्षण करे। इससे सदा गौओंकी वृद्धि एवं पुष्टि होती है

Hendaknya seseorang makan sambil duduk di atas kulit sapi yang dibasahi, menghadap ke arah barat. Dalam keheningan, duduklah di tanah dan santaplah ghee. Dengan laku ini, kemakmuran serta pemeliharaan ternak sapi senantiasa ditingkatkan.

Verse 21

घृतेन जुहुयादग्निं घृतेन स्वस्ति वाचयेत्‌ । घृतं दद्याद्‌ घृतं प्राशेद्‌ गवां पुष्टिं सदाश्षुते,“अग्निमें घृतसे हवन करे। घृतसे ही स्वस्तिवाचन कराये। घृतका दान करे और स्वयं भी गौका घृत ही खाय। इससे मनुष्य सदा गौओंकी पुष्टि वृद्धिका अनुभव करता है

Hendaknya seseorang mempersembahkan oblation ke dalam api suci dengan ghee, dan benediksi keberuntungan pun dibacakan dengan ghee. Berikanlah ghee sebagai sedekah, dan santaplah ghee sendiri. Dengan demikian, pemeliharaan dan pertumbuhan sapi senantiasa diperoleh.

Verse 22

गोमत्या विद्यया धेनुं तिलानामभिमन्त्रय यः । सर्वरत्नमयीं दद्यान्न स शोचेत्‌ कृताकृते,“जो मनुष्य सब प्रकारके रत्नोंसे युक्त तिलकी धेनुको “गोमाँ अग्नेविमाँ अश्रि' इत्यादि गोमती-मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके उसका ब्राह्मणको दान करता है, वह किये हुए शुभाशुभ कर्मके लिये शोक नहीं करता

Barangsiapa mengonsekrasi ‘sapi’ ritual dari biji wijen (tila-dhenu) dengan Vidya Gomati (mantra suci), lalu mendermakannya kepada seorang Brahmana sebagai persembahan yang dipandang berhias segala ratna, ia tidak lagi berduka atas kebajikan atau keburukan—baik yang telah dilakukan maupun yang terlewat—sebab pahala dana itu melenyapkan sesal.

Verse 23

गावो मामुपतिष्ठन्तु हेमशूड्ग्य: पयोमुच: । सुरभ्य: सौरभेय्यश्व सरित: सागरं यथा,“जैसे नदियाँ समुद्रके पास जाती हैं, उसी तरह सोनेसे मढ़ी हुई सींगोंवाली, दूध देनेवाली सुरभी और सौरभेयी गौएँ मेरे निकट आयें

Sebagaimana sungai-sungai mengalir menuju samudra dan mencapainya, demikian pula semoga sapi-sapi—bertanduk berselubung emas, memancurkan susu, dari garis Surabhi dan Saurabheya—datang mendekat dan berdiri di sisiku.

Verse 24

गा वै पश्याम्यहं नित्यं गाव: पश्यन्तु मां सदा । गावो<स्माकं वयं तासां यतो गावस्ततो वयम्‌,“मैं सदा गौओंका दर्शन करूँ और गौएँ मुझपर कृपा-दृष्टि करें। गौएँ हमारी हैं और हम गौओंके हैं। जहाँ गौएँ रहें, वहीं हम रहें

Semoga aku memandang sapi-sapi suci setiap hari, dan semoga sapi-sapi itu senantiasa menatapku dengan pandangan penuh anugerah. Sapi-sapi itu milik kita, dan kita pun milik mereka; di mana sapi-sapi itu berdiam, di sanalah kita juga patut berdiam.

Verse 25

एवं रात्रौ दिवा चापि समेषु विषमेषु च । महाभयेषु च नर: कीर्तयन्‌ मुच्यते भयात्‌,“जो मनुष्य इस प्रकार रातमें या दिनमें, सम अवस्थामें या विषम अवस्थामें तथा बड़े- से-बड़े भय आनेपर भी गोमाताका नामकीर्तन करता है, वह भयसे मुक्त हो जाता है!

Demikianlah, baik malam maupun siang, dalam keadaan menguntungkan ataupun merugikan, bahkan ketika berhadapan dengan ketakutan besar, orang yang terus melantunkan pujian dan menyebut nama Gomātā terbebas dari rasa takut.

Verse 77

इस प्रकार श्रीमह्ााभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गौओंकी उत्पत्तिका वर्णनविषयक सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata, pada Anuśāsana Parva—dalam bagian Dāna-dharma—bab ketujuh puluh tujuh yang menguraikan asal-usul sapi dinyatakan selesai.

Verse 78

इति श्रीमहा भारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोप्रदानिके अष्टसप्ततितमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानविषयक अठठठत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata, pada Anuśāsana Parva, dalam bagian Dāna-dharma, bab ketujuh puluh delapan yang membahas pemberian sapi (go-pradāna) dinyatakan berakhir.

Frequently Asked Questions

Yudhiṣṭhira questions how cow-dung can be described as ‘associated with Śrī’ (prosperity/auspiciousness), requesting an authoritative rationale rather than relying on hearsay.

Prosperity is portrayed as powerful yet unstable; dharma manages it by assigning it an appropriate, bounded locus and practice. The episode frames auspiciousness as something to be hosted with discernment rather than pursued without regulation.

Yes in functional form: Bhīṣma explicitly labels the account as the ‘māhātmya’ (greatness) of cow-dung and transitions to further praise of cows, marking the narrative as an authoritative etiological explanation intended to ground later merit/purity discussions.