Adhyaya 7
Anushasana ParvaAdhyaya 730 Verses

Adhyaya 7

Karma-Phala Rahasya and the Ethics of Dāna (कर्मफल-रहस्यं दानधर्मश्च)

Upa-parva: Dāna-Dharma and Karma-Phala Anuśāsana (Instruction on Gifts and the Results of Action)

Yudhiṣṭhira requests Bhīṣma to explain the outcomes of auspicious actions. Bhīṣma responds with a ṛṣi-derived principle: karma does not perish; the agent experiences results through the same instrumentality by which actions are done, and deeds performed in particular life-states recur as corresponding experiences across births. The five senses are described as continual witnesses, with the self as a sixth, reinforcing moral accountability. The chapter then catalogs exemplary gifts and disciplines: ‘five-fee sacrifice’ analogies tied to offering one’s faculties (vision, mind, truthful speech), hospitality to travelers and strangers, and provisions for ascetics (shelter, bedding, clothing, conveyance). It further associates specific restraints (withdrawal from tastes, abstention from meat), austerities (fasting, vows, silence, continence), and truthfulness with defined benefits (well-being, social esteem, prosperity, desired posthumous destinations). A closing ethical hierarchy elevates honoring father, mother, and teacher as foundational; neglecting these renders other rites fruitless. Vaiśaṃpāyana notes the audience’s approval, and the unit ends with a caution that misapplied sacred speech renders ritual effort ineffective, inviting further questions on auspicious/inauspicious fruition.

Chapter Arc: युधिष्ठिर कर्मों के फल और उनकी अटलता का रहस्य पूछते हैं—क्या किया हुआ कर्म नष्ट होता है, और वह किस प्रकार जीव का पीछा करता है? → भीष्म ऋषियों के ‘रहस्य’ का उद्घाटन करते हैं: मनुष्य जिस-जिस शरीर/अवस्था (स्थूल-सूक्ष्म) से कर्म करता है, उसी-उसी स्तर पर उसका फल भोगता है; इन्द्रियाँ और आत्मा सदा साक्षी हैं, इसलिए कर्म का लेखा मिटता नहीं। दान-धर्म के सूक्ष्म भेद भी सामने आते हैं—थके, अपरिचित पथिक को अन्न देना महापुण्य है; पर मंत्र, सोम, अग्नि आदि का ‘वृथोपयोग’ (अर्थहीन/दिखावटी प्रयोग) निष्फल हो जाता है। → भीष्म का निर्णायक रूपक: जैसे हजारों गायों में बछड़ा अपनी माता को ढूँढ़ लेता है, वैसे ही पूर्वकृत कर्म अपने कर्ता को ढूँढ़कर ही फल देता है—कर्म का अनुगमन अचूक है। → भीष्म निष्कर्ष देते हैं कि शुभ-अशुभ फल-प्राप्ति कर्म-निष्ठ है; दान और आचरण का मूल्य ‘भाव’ और ‘उचित पात्र/समय’ से बढ़ता है, जबकि दिखावटी यज्ञ-क्रिया व्यर्थ हो जाती है। आगे सुनने की जिज्ञासा के लिए वे द्वार खोलते हैं—‘अब और क्या सुनना चाहते हो?’ → भीष्म का प्रश्न—‘शुभाशुभ फल-प्राप्ति के बाद अब क्या सुनना चाहते हो?’—अगले उपदेश (दान, आचार, गुरु/पितृ-तृप्ति आदि) की ओर ले जाता है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ५१ श्लोक हैं) ऑपन--#रात< बक। ] अत्शऑशाए:<ह सप्तमो<्ध्याय: कर्मोके फलका वर्णन युधिछिर उवाच कर्मणां च समस्तानां शुभानां भरतर्षभ । फलानि महतां श्रेष्ठ प्रब्रूहि परिपृच्छत:,युधिष्ठिरने पूछा-महापुरुषोंमें प्रधान भरतश्रेष्ठ! अब मैं समस्त शुभ कर्मोके फल क्या हैं? यह पूछ रहा हूँ, अत: यही बताइये

Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai yang termulia di antara Bharata, wahai yang terbaik di antara para agung—katakanlah kepadaku, karena aku bertanya, buah apakah yang lahir dari segala perbuatan yang baik.”

Verse 2

भीष्म उवाच हन्त ते कथयिष्यामि यन्मां पृच्छसि भारत । रहस्यं यदृषीणां तु तच्छृणुष्व युधिष्ठिर । या गति: प्राप्यते येन प्रेत्यभावे चिरेप्सिता,भीष्मजीने कहा--भरतनन्दन युधिष्ठिर! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, यह ऋषियोंके लिये भी रहस्यका विषय है; किंतु मैं तुम्हें बतला रहा हूँ। सुनो, मरनेके बाद जिस मनुष्यको जैसी चिर अभिलषित गति मिलती है, उसका भी वर्णन करता हूँ

Bhishma berkata: “Baiklah, wahai Bharata, akan kukatakan apa yang engkau tanyakan. Ini sungguh perkara yang bahkan di kalangan para resi pun dianggap rahasia; namun dengarkan, wahai Yudhiṣṭhira. Akan kuuraikan tujuan yang lama didambakan yang dicapai seseorang setelah kematian, beserta jalan untuk meraihnya.”

Verse 3

येन येन शरीरेण यद्‌ यत्‌ कर्म करोति यः । तेन तेन शरीरेण तत्‌ तत्‌ फलमुपाश्चुते,मनुष्य जिस-जिस (स्थूल या सूक्ष्म) शरीरसे जो-जो कर्म करता है उसी-उसी शरीरसे उस-उस कर्मका फल भोगता है

Bhishma berkata: Perbuatan apa pun yang dilakukan seseorang melalui tubuh apa pun—kasar ataupun halus—melalui tubuh itulah ia mengalami buah yang sepadan.

Verse 4

यस्यां यस्यामवस्थायां यत्‌ करोति शुभाशुभम्‌ | तस्यां तस्यामवस्थायां भुद्धक्ते जन्मनि जन्मनि,जिस-जिस अवस्थामें वह जो-जो शुभ या अशुभ कर्म करता है, प्रत्येक जन्मकी उसी- उसी अवस्थामें वह उसका फल भोगता है

Bhishma berkata: Dalam keadaan atau tahap hidup apa pun seseorang melakukan perbuatan baik atau buruk, dalam kelahiran demi kelahiran ia mengalami buahnya dalam keadaan yang sejenis dengan itu.

Verse 5

न नश्यति कृतं कर्म सदा पज्चेन्द्रियैरिह । ते हास्य साक्षिणो नित्यं पष्ठ आत्मा तथैव च,पाँचों इन्द्रियोंद्रारा किया हुआ कर्म कभी नष्ट नहीं होता है। वे पाँचों इन्द्रियाँ और छठा मन--ये उस कर्मके साक्षी होते हैं

Bhishma bersabda: Perbuatan yang dilakukan di dunia ini melalui lima indra tidak pernah benar-benar lenyap. Kelima indra itu menjadi saksi yang senantiasa hadir, dan demikian pula yang keenam—batin, yakni pikiran/kesadaran dalam—yang selalu mengamatinya.

Verse 6

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें दैव और पुरुषार्थका निर्देशविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ,चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद्‌ वाचं दद्याच्च सूनृताम्‌ । अनुव्रजेदुपासीत स यज्ञ: पञ्चदक्षिण: अतः मनुष्यको उचित है कि यदि कोई अतिथि घरपर आ जाय तो उसको प्रसन्न दृष्टिसे देखे। उसकी सेवामें मन लगावे। मीठी बोली बोलकर उसे संतुष्ट करे। जब वह जाने लगे तो उसके पीछे-पीछे कुछ दूरतक जाय और जबतक वह रहे उसके स्वागत-सत्कारमें लगा रहे >-ये पाँच काम करना गृहस्थके लिये पाँच प्रकारकी दक्षिणाओंसे युक्त यज्ञ कहलाता है

Bhishma bersabda: “Tataplah tamu dengan pandangan yang ramah; curahkan pikiran dalam pelayanan; ucapkan kata-kata yang lembut dan benar. Antarkan ia beberapa langkah saat berpamitan, dan selama ia tinggal, tekunlah memuliakannya. Lima perbuatan ini, bagi seorang grihastha, adalah yajña dengan lima dakṣiṇā.”

Verse 7

यो दद्यादपरिक्लिष्टमन्नमध्वनि वर्तते | श्रान्तायादृष्टपूर्वाय तस्य पुण्यफलं महत्‌,जो थके-माँदे अपरिचित पथिकको प्रसन्नतापूर्वक अन्न दान करता है, उसे महान्‌ पुण्यफलकी प्राप्ति होती है राजन! शुभ और अशुभ फलकी प्राप्तिके विषयमें महर्षि व्यासने ये सब बातें बतायी थीं, जिन्हें मैंने इस समय तुमसे कहा है। अब और क्या सुनना चाहते हो? ।। इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि कर्मफलिकोपाख्याने सप्तमो<थध्याय:

Bhishma bersabda: Siapa pun yang di perjalanan memberi makanan yang baik tanpa merasa terbebani kepada seorang musafir yang letih dan belum pernah ia jumpai—besar buah kebajikannya.

Verse 8

स्थण्डिलेषु शयानानां गृहाणि शयनानि च । चीरवल्कलसंवीते वासांस्याभरणानि च,जो वानप्रस्थी वेदीपर शयन करते हैं उन्हें जन्मान्तरमें उत्तम गृह और शग्याकी प्राप्ति होती है। जो चीर और वल्कल वस्त्र पहनते हैं उन्हें दूसरे जन्ममें उत्तम वस्त्र और उत्तम आभूषणोंकी प्राप्ति होती है

Bhishma bersabda: Para pertapa penghuni rimba yang tidur di tanah gundul akan memperoleh, pada kelahiran berikutnya, rumah-rumah yang baik dan ranjang yang nyaman. Dan mereka yang mengenakan kain kasar serta kulit kayu akan meraih, di kehidupan lain, busana yang indah dan perhiasan yang pantas.

Verse 9

वाहनानि च यानानि योगात्मनि तपोधने । अग्नीनुपशयानस्य राज्ञ: पौरुषमेव च,जिसका चित्त योगयुक्त होता है उस तपोधन पुरुषको दूसरे जन्ममें अच्छे-अच्छे वाहन और यान उपलब्ध होते हैं तथा अग्निकी उपासना करनेवाले राजाको जन्मान्तरमें पौरुषकी प्राप्ति होती है

Bhishma bersabda: Bagi pertapa kaya tapa yang batinnya teguh dalam yoga, pada kelahiran berikutnya tersedia kendaraan-kendaraan dan tunggangan yang baik. Dan bagi raja yang tekun memuja serta merawat api suci, pada kehidupan lain dianugerahkan pawuṛuṣa—daya keperkasaan dan keberanian.

Verse 10

रसानां प्रतिसंहारे सौभाग्यमनुगच्छति । आमिषप्रतिसंहारे पशून्‌ पुत्रांश्व विन्दति,रसोंका परित्याग करनेसे सौभाग्यकी और मांसका त्याग करनेसे पशुओं तथा पुत्रोंकी प्राप्ति होती है

Dengan menahan diri dan meninggalkan kenikmatan rasa, keberuntungan akan mengikuti. Dengan menahan diri dan meninggalkan daging, seseorang memperoleh ternak dan juga putra.

Verse 11

अवाक्शिरास्तु यो लम्बेदुदवासं च यो वसेत्‌ । सततं चैकशायी य: स लभेतेप्सितां गतिम्‌,जो तपस्वी नीचे सिर करके लटकता है अथवा जलमें निवास करता है; तथा जो सदा ही अकेला सोता (तब्रह्मचर्यका पालन करता) है, वह मनोवांछित गतिको प्राप्त होता है

Seorang pertapa yang bergantung dengan kepala di bawah, atau yang tinggal di dalam air, dan yang selalu tidur seorang diri—menjalani brahmacarya—ia mencapai tujuan yang diidamkan.

Verse 12

पाद्यमासनमेवाथ दीपमन्नं प्रतिश्रयम्‌ । दद्यादतिथिपूजार्थ स यज्ञ: पजचदक्षिण:,जो अतिथिको पैर धोनेके लिये जल, बैठनेके लिये आसन, प्रकाशके लिये दीपक, खानेके लिये अन्न और ठहरनेके लिये घर देता है, इस प्रकार अतिथिका सत्कार करनेके लिये इन पाँच वस्तुओंका दान 'पंचदक्षिण यज्ञ” कहलाता है

Demi memuliakan tamu, hendaknya diberikan air untuk membasuh kaki, tempat duduk, pelita untuk penerangan, makanan, dan tempat bernaung. Persembahan lima macam dalam keramahtamahan ini disebut “yajña dengan lima daksina” (pañca-dakṣiṇā-yajña).

Verse 13

वीरासनं वीरशय्यां वीरस्थानमुपागत: । अक्षयास्तस्य वै लोका: सर्वकामगमास्तथा,जो वीरासन रणभूमिमें जाकर वीरशय्या (मृत्यु)-को प्राप्त हो वीरस्थान (स्वर्गलोक) में जाता है, उसे अक्षय लोकोंकी प्राप्ति होती है। वे लोक सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करानेवाले होते हैं

Ia yang duduk dalam sikap ksatria (vīrāsana), lalu di medan perang mencapai “ranjang ksatria” (kematian), dan sampai ke “tempat para ksatria” (surga), baginya tersedia alam-alam yang tak binasa, yang menganugerahkan terpenuhinya segala hasrat.

Verse 14

धनं लभेत दानेन मौनेनाज्ञां विशाम्पते । उपभोगांश्व तपसा ब्रद्मचर्येण जीवितम्‌,प्रजानाथ! मनुष्य दानसे धन पाता है, मौन-व्रतके पालनसे दूसरोंद्वारा आज्ञापालन करानेकी शक्ति प्राप्त करता है, तपस्यासे भोग और ब्रह्मचर्य-पालनसे जीवन (आयु)-की उपलब्धि होती है

Wahai pelindung rakyat, kekayaan diperoleh melalui memberi; melalui kaul diam seseorang meraih wibawa agar perintahnya ditaati; melalui tapa ia memperoleh kenikmatan; dan melalui brahmacarya ia meneguhkan hidup—panjang umur dan daya vital.

Verse 15

रूपमैश्वर्यमारोग्यमहिंसाफलम श्षुते । फलमूलाशिनो राज्यं स्वर्ग: पर्णाशिनां भवेत्‌,अहिंसा धर्मके आचरणसे रूप, ऐश्वर्य और आरोग्यरूपी फलकी प्राप्ति होती है। फल- मूल खानेवालेको राज्य और पत्ते चबाकर रहनेवालेको स्वर्गकी प्राप्ति होती है

Bhīṣma berkata—dari ahiṁsā (tanpa kekerasan) diperoleh buah berupa keelokan, kemakmuran, dan kesehatan. Yang hidup dari buah dan umbi meraih kedaulatan; yang bertahan dengan daun meraih surga.

Verse 16

प्रायोपवेशिनो राजन्‌ सर्वत्र सुखमुच्यते । गवाढ्य: शाकदीक्षायां स्वर्गगामी तृणाशन:,राजन! जो आमरण अनशनका व्रत लेकर बैठता है उसके लिये सर्वत्र सुख बताया गया है। शाकाहारकी दीक्षा लेनेपर गोधनकी प्राप्ति होती है और तृण खाकर रहनेवाला पुरुष स्वर्गलोकमें जाता है

Wahai raja, bagi orang yang menjalani prāyopaveśa (puasa sampai akhir hayat) dikatakan ada kebahagiaan di mana-mana. Dengan dīkṣā pola makan sayur-sayuran diperoleh kekayaan ternak; dan yang hidup dari rumput menuju surga.

Verse 17

स्त्रियस्त्रिषवर्णं स्नात्वा वायुं पीत्वा क्रतुं लभेत्‌ । स्वर्ग सत्येन लभते दीक्षया कुलमुत्तमम्‌,स्त्री-सम्बन्धी भोगोंका परित्याग करके त्रिकाल स्नान करते हुए वायु पीकर रहनेसे यज्ञका फल प्राप्त होता है। सत्यसे मनुष्य स्वर्गको और दीक्षासे उत्तम कुलको पाता है

Dengan meninggalkan kenikmatan yang berkaitan dengan perempuan, mandi pada tiga waktu yang ditetapkan, dan hidup dalam pengekangan ekstrem seakan ‘meminum angin’, seseorang memperoleh pahala yajña. Dengan kebenaran orang meraih surga, dan dengan dīkṣā ia memperoleh kemuliaan garis keturunan.

Verse 18

सलिलाशी भवेद्‌ यस्तु सदाग्नि: संस्कृतो द्विज: । मनुं साधयतो राज्यं नाकपृष्ठमनाशके,जो ब्राह्मण सदा जल पीकर रहता है, अग्निहोत्र करता है और मन्त्र-साधनामें संलग्न रहता है, उसे राज्य मिलता है और निराहारखरत करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है

Seorang dvija yang terlatih, yang hidup dengan air, yang senantiasa memelihara api suci (agnihotra), dan tekun dalam laku mantra, memperoleh kedaulatan sambil menegakkan titah Manu; dan dengan nazar nirāhāra (berpantang makanan) seseorang mencapai alam surga.

Verse 19

उपवासं च दीक्षायामभिषेकं च पार्थिव । कृत्वा द्वादश वर्षाणि वीरस्थानाद्‌ विशिष्यते,पृथ्वीनाथ! जो पुरुष बारह वर्षोतकके लिये व्रतकी दीक्षा लेकर अन्नका त्याग करता और तीर्थोमें स्नान करता रहता है, उसे रणभूमिमें प्राण त्यागनेवाले वीरसे भी बढ़कर उत्तम लोककी प्राप्ति होती है

Wahai raja, seseorang yang menjalani inisiasi nazar (dīkṣā), tekun berpuasa, dan melakukan pemandian suci (abhiṣeka-snāna) selama dua belas tahun, mencapai keadaan yang lebih tinggi daripada bahkan kesatria yang gugur di medan perang.

Verse 20

अधीत्य सर्ववेदान्‌ वै सद्यो दुःखादू विमुच्यते । मानसं हि चरन्‌ धर्म स्वर्गलोकमुपाश्ुते,जो सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन कर लेता है, वह तत्काल दु:ःखसे मुक्त हो जाता है तथा जो मनसे धर्मका आचरण करता है, उसे स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है

Bhishma berkata: “Barangsiapa menguasai seluruh Weda melalui pembelajaran yang tuntas, seketika terbebas dari duka. Dan barangsiapa menegakkan dharma di dalam batin—dengan disiplin pikiran—ia mencapai alam surga.”

Verse 21

या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्य॑ति जीर्यत: । योडसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजत: सुखम्‌,खोटी बुद्धिवाले पुरुषोंके लिये जिसका त्याग करना कठिन है, जो मनुष्यके जीर्ण हो जानेपर भी स्वयं जीर्ण नहीं होती तथा जो प्राणनाशक रोगके समान सदा कष्ट देती रहती है, उस तृष्णाका त्याग कर देनेवाले पुरुषको ही सुख मिलता है

Bhishma berkata: “Keinginan yang sulit ditinggalkan oleh orang yang sesat budi, yang tidak menua meski manusia menua, dan yang terus menyiksa laksana penyakit mematikan—hanya dia yang menanggalkan dahaga itu memperoleh kebahagiaan sejati.”

Verse 22

यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम्‌ | एवं पूर्वकृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति,जैसे बछड़ा हजारों गौओंके बीचमें अपनी माताको ढूँढ़ लेता है, उसी प्रकार पहलेका किया हुआ कर्म भी कर्ताको पहचानकर उसका अनुसरण करता है

Bhishma berkata: “Sebagaimana anak sapi, di tengah seribu sapi, menemukan induknya sendiri, demikian pula perbuatan yang telah dilakukan dahulu mengenali pelakunya dan mengikutinya.”

Verse 23

अचोटद्यमानानि यथा पुष्पाणि च फलानि च । स्वकाल नातिवर्तन्ते तथा कर्म पुरा कृतम्‌,जैसे फूल और फल किसीकी प्रेरणा न होनेपर भी अपने समयका उल्लंघन नहीं करते --ठीक समयपर फूलने-फलने लग जाते हैं, वैसे ही पहलेका किया हुआ कर्म भी समयपर फल देता ही है

Bhishma berkata: “Sebagaimana bunga dan buah, tanpa didorong siapa pun, tidak melampaui musimnya dan mekar serta masak pada waktunya; demikian pula perbuatan yang dilakukan dahulu niscaya berbuah ketika saatnya tiba.”

Verse 24

जीर्यन्ति जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यत: । चक्षु:श्रोत्रे च जीर्येते तृष्णैका न तु जीर्यते,मनुष्यके जीर्ण (जराग्रस्त) होनेपर उसके केश जीर्ण होकर झड़ जाते हैं, वृद्ध पुरुषके दाँत भी टूट जाते हैं, नेत्र और कान भी जीर्ण होकर अन्धे-बहरे हो जाते हैं। केवल तृष्णा ही जीर्ण नहीं होती है (वह सदा नयी-नवेली बनी रहती है)

Bhishma berkata: “Ketika manusia menua, rambut menipis dan rontok; gigi pun lapuk dimakan usia. Mata dan telinga juga melemah. Namun hanya dahaga keinginan yang tidak menua—ia tetap selalu terasa baru.”

Verse 25

येन प्रीणाति पितरं तेन प्रीत: प्रजापति: । प्रीणाति मातरं येन पृथिवी तेन पूजिता

Dengan perilaku apa pun seseorang menyenangkan ayahnya, dengan itu pula Prajāpati berkenan. Dan dengan perilaku apa pun seseorang menyenangkan ibunya, dengan itu pula Ibu Pertiwi sendiri dimuliakan.

Verse 26

सर्वे तस्यादृता धर्मा यस्यैते त्रय आदृता: । अनादूृतास्तु यस्यैते सर्वास्तस्याफला: क्रिया:,जिसने इन तीनोंका आदर किया, उसके द्वारा सभी धर्मोका आदर हो गया और जिसने इन तीनोंका अनादर कर दिया, उसकी सम्पूर्ण यज्ञादिक क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं

Barangsiapa menghormati ketiganya, seakan-akan ia telah menghormati segala dharma. Tetapi barangsiapa mengabaikan ketiganya, maka semua perbuatannya—seperti yajña dan upacara lainnya—menjadi tanpa buah.

Verse 27

वैशम्पायन उवाच भीष्मस्यैतद्‌ वचःश्रुत्वा विस्मिता: कुरुपुड्रवा: । आसन प्रहृष्टमनस: प्रीतिमन्तो5भवंस्तदा,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भीष्मजीकी यह बात सुनकर समस्त श्रेष्ठ कुरुवंशी आश्वर्यचकित हो उठे। सबके मनमें हर्षजनित उल्लास भर गया। उस समय सभी बड़े प्रसन्न हुए

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Janamejaya, mendengar kata-kata Bhīṣma itu, para utama dari wangsa Kuru tertegun oleh keajaiban. Hati mereka meluap oleh kegembiraan, dan pada saat itu semuanya menjadi sangat berkenan.”

Verse 28

भीष्म उवाच यन्मन्त्रे भवति वृथोपयुज्यमाने यत्‌ सोमे भवति वृथाभिषूयमाणे । यच्चाग्नौ भवति वृथाभिटृ्‌यमाने तत्‌ सर्व भवति वृथाभिधीयमाने,भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! वेदमन्त्रोंका व्यर्थ (अशुद्ध) उपयोग (उच्चारण) करनेपर जो पाप लगता है, सोमयागको दक्षिणा आदि न देनेके कारण व्यर्थ कर देनेपर जो दोष लगता है तथा विधि और मन्त्रके बिना अग्निमें निरर्थक आहुति देनेपर जो पाप होता है; वह सारा पाप मिथ्या भाषण करनेसे प्राप्त होता है

Bhīṣma berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, dosa yang timbul karena menyalahgunakan mantra-mantra Weda, cela yang timbul ketika Soma-yajña dibuat sia-sia karena pelaksanaan yang keliru dan kelalaian memberi dāna-dakṣiṇā, serta dosa yang timbul karena mempersembahkan āhuti ke dalam api tanpa tata cara dan mantra—semua keburukan itu juga menimpa orang yang berkata dusta.”

Verse 29

इत्येतदृषिणा प्रोक्तमुक्तवानस्मि यद्‌ विभो । शुभाशुभफलप्राप्ती किमत: श्रोतुमिच्छसि

“Demikianlah, wahai yang perkasa, apa yang diucapkan sang resi telah kusampaikan kepadamu. Tentang perolehan buah yang baik dan yang buruk, apa lagi yang hendak engkau dengar?”

Verse 253

येन प्रीणात्युपाध्यायं तेन स्याद्‌ ब्रह्म पूजितम्‌ । मनुष्य जिस व्यवहारसे पिताको प्रसन्न करता है, उससे भगवान्‌ प्रजापति प्रसन्न होते हैं। जिस बर्तावसे वह माताको सन्तुष्ट करता है, उससे पृथ्वी देवीकी भी पूजा हो जाती है तथा जिससे वह उपाध्यायको तृप्त करता है, उसके द्वारा परब्रह्म परमात्माकी पूजा सम्पन्न हो जाती है

Dengan perilaku apa pun seseorang menyenangkan upādhyāya (guru), dengan perilaku itu pula Parabrahman dipuja. Dengan sikap yang membuat ayah berkenan, Prajāpati pun berkenan; dengan sikap yang menenteramkan ibu, Dewi Pṛthivī seakan dipuja; dan dengan cara yang memuaskan sang guru, terlaksanalah pemujaan tertinggi kepada Paramātmā.

Frequently Asked Questions

That karma is conserved: actions performed through particular faculties and in particular conditions inevitably mature into corresponding experiences for the same agent, across successive births.

Prioritize disciplined speech and senses, practice structured hospitality (pādya, āsana, dīpa, anna, shelter), and align austerity with non-injury and truthfulness, treating these as measurable causes of social and personal well-being.

Yes: it asserts that misapplied or “vainly uttered” sacred speech can render mantra, soma, and fire offerings ineffective, framing correct intention and articulation as integral to ritual outcome.