Adhyaya 112
Anushasana ParvaAdhyaya 11224 Verses

Adhyaya 112

Anuśāsana-parva Adhyāya 112: Dharma as the sole companion; karmic witnesses; rebirth sequences (Bṛhaspati–Yudhiṣṭhira Saṃvāda)

Upa-parva: Bṛhaspati–Yudhiṣṭhira Saṃvāda (Discourse on saṃsāra, dharma as the companion after death, and karmic rebirth)

Yudhiṣṭhira inquires into the operative law of human destiny: which conduct leads to higher worlds, and who follows a person after death when the body is abandoned like wood or clay. Bhīṣma announces the arrival of Bṛhaspati and identifies him as uniquely qualified to disclose the ancient, confidential doctrine. After formal reception, Yudhiṣṭhira asks who truly supports a mortal—parents, kin, teacher, or others—beyond death. Bṛhaspati answers that one is born and dies alone; relatives remain only briefly, while dharma alone accompanies the departed. He explains that dharmic alignment leads to svarga and adharmic alignment to naraka, and that dharma should be practiced with justly obtained wealth; he also notes how greed, delusion, fear, and misplaced compassion can prompt wrongful acts. In response to questions about how dharma ‘follows’ an unseen, subtle being, Bṛhaspati describes the five elements, mind/intellect, and the self as constant witnesses. He then outlines a physiology of conception (elements and mind culminating in semen, then embryo) and proceeds to an extensive karmic catalogue: specific transgressions (e.g., betraying trust, theft of various goods, disrespect to parents/elders, violations involving the teacher’s household) correspond to particular rebirths and durations, with eventual return to human birth after demerit is exhausted. The chapter closes by reaffirming that these teachings were heard from Brahmā and urging sustained commitment to dharma.

Chapter Arc: युधिष्ठिर पितामह भीष्म से पूछते हैं—सभी तीर्थों में कौन-सा तीर्थ श्रेष्ठ है, जहाँ परम शौच (पवित्रता) प्राप्त होती है; बाह्य तीर्थ-यात्रा के पार कौन-सा आन्तरिक मार्ग है जो मनुष्य को सचमुच शुद्ध करे। → भीष्म उत्तर देते हैं कि पृथ्वी के तीर्थ गुणवान हैं, पर उनसे भी सूक्ष्म ‘तीर्थ’ मन के भीतर है। वे ‘मानस-तीर्थ’ का स्वरूप खोलते हैं—धृति का कुण्ड, सत्य का जल, अगाध-निर्मल-शुद्ध सरोवर; और फिर शौच के घटक गिनाते हैं: अकामता/अयाचना, आर्जव, सत्य, मार्दव, अहिंसा, दया/अनृशंस्य, दम-शम आदि। बाह्य स्नान बनाम आन्तरिक स्नान का प्रश्न तीखा होता जाता है—क्या केवल जल से पाप धुलता है, या वृत्ति-शुद्धि ही वास्तविक स्नान है? → भीष्म निर्णायक वाणी में ‘मानसे तीर्थे स्नातव्यं’ का विधान करते हैं—सत्त्व का आलम्बन लेकर शाश्वत मानस-तीर्थ में स्नान ही परम है। वे कहते हैं कि जिनके भीतर के रज-तम (और अंततः त्रिगुण-आवरण) धुल चुके, जो समदर्शी, सर्वत्यागी, सर्वज्ञ-भावी, वृत्तिशौच से शुद्ध हैं—वही ‘तीर्थ’ हैं और वही ‘शुचि’। शौचाचार में स्थित, भावसमाहित, केवल गुणसम्पन्न मनुष्य सदा शुद्ध है—यह अध्याय का शिखर-निर्णय है। → अध्याय बाह्य और आन्तरिक—दोनों प्रकार के तीर्थों को स्वीकारते हुए उनका क्रम निर्धारित करता है: पृथ्वी पर पुण्य तीर्थ हैं और मन में भी; जो दोनों में स्नान करता है वह शीघ्र सिद्धि पाता है। अंत में शौच का सार ‘प्रज्ञान’ (विवेक), शरीर की विशेष पवित्रता, निष्किंचनत्व और मन की प्रसन्नता के रूप में स्थिर होता है—तीर्थ-यात्रा का फल चरित्र-यात्रा में परिणत हो जाता है।

Shlokas

Verse 1

नफमशा (0) आज अन+- अष्टाधिकशततमोब<् ध्याय: मानस तथा पार्थिव तीर्थकी महत्ता युधिछिर उवाच यद्‌ वरं सर्वतीर्थानां तन्मे ब्रूहि पितामह । यत्र चैव परं शौचं तन्मे व्याख्यातुमहसि,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! जो सब तीथेंमें श्रेष्ठ हो तथा जहाँ जानेसे परम शुद्धि हो जाती हो, उस तीर्थको मुझे विस्तारपूर्वक बताइये

Yudhiṣṭhira berkata: “Kakek agung, katakan kepadaku manakah yang terbaik di antara semua tīrtha. Dan jelaskan kepadaku tīrtha itu—yang dengan mendatanginya seseorang meraih kemurnian tertinggi.”

Verse 2

भीष्म उवाच सर्वाणि खलु तीर्थानि गुणवन्ति मनीषिण: । यत्तु तीर्थ च शौचं च तन्मे शूणु समाहित:,भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! इस पृथ्वीपर जितने तीर्थ हैं, वे सब मनीषी पुरुषोंके लिए गुणकारी होते हैं; किंतु उन सबमें जो परम पवित्र और प्रधान तीर्थ हैं, उसका वर्णन करता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो

Bhīṣma berkata: “Sesungguhnya semua tīrtha bermanfaat bagi orang bijak. Namun, dengarkan dariku dengan pikiran yang terhimpun: tentang tīrtha yang sungguh utama itu, dan tentang kemurnian yang tertinggi.”

Verse 3

अगाधे विमले शुद्धे सत्यतोये धृतिहदे । स्नातव्यं मानसे तीर्थे सत्त्वमालम्ब्य शाश्वतम्‌,जिसमें धैर्यरूप कुण्ड और सत्यरूप जल भरा हुआ है तथा जो अगाध, निर्मल एवं अत्यन्त शुद्ध है, उस मानस तीर्थमें सदा परमात्माका आश्रय लेकर स्नान करना चाहिये

Di tīrtha batin itu—tak terukur, tanpa noda, dan sepenuhnya suci—yang telaganya adalah keteguhan dan airnya adalah kebenaran, hendaknya seseorang senantiasa ‘mandi’, bersandar pada Sang Diri Tertinggi yang Kekal.

Verse 4

तीर्थशौचमनर्थित्वमार्जवं सत्यमार्दवम्‌ अहिंसा सर्वभूतानामानृशंस्यं दम: शम:,कामना और याचनाका अभाव, सरलता, सत्य, मृदुता, अहिंसा, समस्त प्राणियोंके प्रति क्रूरताका अभाव--दया, इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह--ये ही इस मानस तीर्थके सेवनसे प्राप्त होनेवाली पवित्रताके लक्षण हैं

Kemurnian di tīrtha itu tampak sebagai: bebas dari hasrat dan kebiasaan meminta-minta, kelurusan hati, kebenaran, kelembutan, tanpa kekerasan terhadap semua makhluk, welas asih (tiadanya kekejaman), pengendalian indria, dan penaklukan batin. Inilah tanda-tanda kesucian yang diperoleh dengan menempuh ‘tīrtha batin’ itu.

Verse 5

निर्ममा निरहंकारा निर्दधन्धा निष्परिग्रहा: | शुचयस्तीर्थभूतास्ते ये भैक्ष्यमुपभुज्जते,जो ममता, अहंकार, राग-द्वेषादि द्वद्ध और परिग्रहसे रहित एवं भिक्षासे जीवन निर्वाह करते हैं, वे विशुद्ध अन्तःकरणवाले साधु पुरुष तीर्थस्वरूप हैं

Mereka yang bebas dari rasa memiliki dan keakuan, melampaui pasangan-pasangan pertentangan, serta tanpa penimbunan dan keterikatan pada harta—mereka yang berhati suci dan hidup dari sedekah—merekalah sendiri laksana tempat ziarah suci (tīrtha).

Verse 6

तत्त्ववित्त्वनहंबुद्धिस्तीर्थप्रवरमुच्यते । (नारायणे<5थ रुद्रे वा भक्तिस्तीर्थ परं॑ मता ।) शौचलक्षणमेतत्‌ ते सर्वत्रैवान्ववेक्षत:,किंतु जिसकी बुद्धिमें अहंकारका नाम भी नहीं है, वह तत्त्वज्ञानी पुरुष श्रेष्ठ तीर्थ कहलाता है। भगवान्‌ नारायण अथवा भगवान्‌ शिवमें जो भक्ति होती है, वह भी उत्तम तीर्थ मानी गयी है। पवित्रताका यह लक्षण तुम्हें विचार करनेपर सर्वत्र ही दृष्टिगोचर होगा

Orang yang mengetahui hakikat dan pada dirinya bahkan gagasan “aku” tidak muncul, dialah yang disebut tīrtha yang paling utama. Demikian pula, bhakti yang tertuju kepada Bhagavān Nārāyaṇa atau Bhagavān Rudra juga dipandang sebagai ziarah tertinggi. Inilah tanda kemurnian sejati: bila direnungkan, hal itu tampak di mana-mana.

Verse 7

रजस्तम: सत्त्वमथो येषां निर्धौतमात्मन: । शौचाशौचसमायुक्ता: स्वकार्यपरिमार्गिण:,जिनके अन्त:करणसे तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुण धुल गये हैं अर्थात्‌ जो तीनों गुणोंसे रहित है, जो बाह्य पवित्रता और अपवित्रतासे युक्त रहकर भी अपने कर्तव्य (तत्त्वविचार, ध्यान, उपासना आदि) का ही अनुसंधान करते हैं। जो सर्वस्वके त्यागमें ही अभिरुचि रखते हैं, सर्वज्ञ और समदर्शी होकर शौचाचारके पालनद्वारा आत्मशुद्धिका सम्पादन करते हैं, वे सत्पुरुष ही परम पवित्र तीर्थस्वरूप हैं

Mereka yang batinnya telah dibersihkan dari rajas, tamas, bahkan sattva—hingga melampaui tiga guṇa—dan yang, meski bergerak di dunia luar di tengah keadaan suci dan tidak suci, tetap menelusuri hanya tugas sejatinya (penyelidikan hakikat, meditasi, pemujaan, dan sejenisnya): merekalah, dengan keteguhan pada disiplin kemurnian, mencapai penyucian diri dan menjadi tīrtha yang tertinggi.

Verse 8

सर्वत्यागेष्वभिरता: सर्वज्ञा: समदर्शिन: । शौचेन वृत्तशौचार्थास्ति तीर्था: शुचयश्च ये,जिनके अन्त:करणसे तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुण धुल गये हैं अर्थात्‌ जो तीनों गुणोंसे रहित है, जो बाह्य पवित्रता और अपवित्रतासे युक्त रहकर भी अपने कर्तव्य (तत्त्वविचार, ध्यान, उपासना आदि) का ही अनुसंधान करते हैं। जो सर्वस्वके त्यागमें ही अभिरुचि रखते हैं, सर्वज्ञ और समदर्शी होकर शौचाचारके पालनद्वारा आत्मशुद्धिका सम्पादन करते हैं, वे सत्पुरुष ही परम पवित्र तीर्थस्वरूप हैं

Mereka yang bersukacita dalam pelepasan total, yang bijaksana dan memandang semua dengan pandangan setara—yang hidup dalam disiplin kemurnian demi pembersihan batin—merekalah orang-orang berhati suci yang menjadi tīrtha tertinggi.

Verse 9

नोदकक्लिन्नगात्रस्तु स्‍नात इत्यभिधीयते । स स्नातो यो दमस्नात: स बाह्याभ्यन्तर: शुचि:,शरीरको केवल पानीसे भिगो लेना ही स्नान नहीं कहलाता है। सच्चा स्नान तो उसीने किया है, जिसने मन-इन्द्रियके संयमरूपी जलमें गोता लगाया है। वही बाहर और भीतरसे भी पवित्र माना गया है

Membasahi tubuh dengan air saja tidak disebut mandi suci. Mandi yang sejati ialah milik orang yang “mandi” dalam dama—pengendalian batin dan indria; dialah yang suci lahir dan batin.

Verse 10

अतीतेष्वनपेक्षा ये प्राप्तेष्वर्थेषु निर्ममा: । शौचमेव पर तेषां येषां नोत्पद्यते स्पृहा,जो बीते या नष्ट हुए विषयोंकी अपेक्षा नहीं रखते, प्राप्त हुए पदार्थोमें ममताशून्य होते हैं तथा जिनके मनमें कोई इच्छा पैदा ही नहीं होती, उन्हींमें परम पवित्रता होती है

Mereka yang tidak menaruh harap pada hal-hal yang telah berlalu, tidak melekat pada apa yang telah diperoleh, dan pada siapa pun hasrat tidak juga bangkit—pada merekalah kesucian tertinggi bersemayam.

Verse 11

इस जगतमें प्रज्ञान ही शरीर-शुद्धिका विशेष साधन है। इसी प्रकार अकिंचनता और मनकी प्रसन्नता भी शरीरको शुद्ध करनेवाले हैं

Di dunia ini, kebijaksanaan yang jernih (prajñāna) adalah sarana utama penyucian diri yang berjasad; demikian pula hidup tanpa kepemilikan (akiñcanatā) dan ketenteraman hati turut memurnikan tubuh.

Verse 12

वृत्तशौचं मन:शौचं तीर्थशौचमत: परम्‌ । ज्ञानोत्पन्नं च यच्छौचं तच्छौचं परमं स्मृतम्‌,शुद्धि चार प्रकारकी मानी गयी है--आचारशुद्धि, मनःशुद्धि, तीर्थशुद्धि और ज्ञानशुद्धि; इनमें ज्ञानसे प्राप्त होनेवाली शुद्धि ही सबसे श्रेष्ठ मानी गयी है

Kesucian dipandang empat macam: kesucian perilaku, kesucian batin, kesucian melalui tirtha (tempat suci); namun melampaui semuanya ada kesucian yang lahir dari pengetahuan sejati—itulah yang dikenang sebagai kesucian tertinggi.

Verse 13

मनसा च प्रदीप्तेन ब्रह्मज्ञानजलेन च । स्नाति यो मानसे तीर्थे तत्स्नानं तत्त्वदर्शिन:,जो प्रसन्न एवं शुद्ध मनसे ब्रह्मज्ञानरूपी जलके द्वारा मानसतीर्थमें स्नान करता है, उसका वह स्नान ही तत्त्वदर्शी ज्ञानीका स्नान माना गया है

Ia yang dengan batin yang bercahaya dan tenteram, dengan air berupa pengetahuan Brahman, mandi di tirtha batin—mandi itulah yang oleh para penyingkap kebenaran dipandang sebagai mandi yang sejati.

Verse 14

समारोपितशौचस्तु नित्यं भावसमाहित: । केवलं गुणसम्पन्न: शुचिरेव नर: सदा,जो सदा शौचाचारसे सम्पन्न, विशुद्ध भावसे युक्त और केवल सदगुणोंसे विभूषित है, उस मनुष्यको सदा शुद्ध ही समझना चाहिये

Seseorang yang menegakkan kesucian sebagai laku yang tetap, senantiasa berbatin jernih dan terhimpun, serta berhias semata oleh kebajikan—orang demikian patut selalu dipandang sebagai yang suci.

Verse 15

शरीरस्थानि तीर्थानि प्रोक्तान्येतानि भारत । पृथिव्यां यानि तीर्थानि पुण्यानि शृणु तान्यपि,भारत! यह मैंने शरीरमें स्थित तीर्थोंका वर्णन किया; अब पृथ्वीपर जो पुण्यतीर्थ हैं, उनका महत्त्व भी सुनो

Bhishma berkata: “Wahai Bharata, demikian telah kuuraikan tīrtha-tīrtha suci yang berada di dalam tubuh. Kini dengarkan pula tīrtha-tīrtha pembersih dosa yang ada di bumi dan kemuliaannya.”

Verse 16

शरीरस्य यथोद्देशा: शुचय: परिकीर्तिता: । तथा पृथिव्या भागाश्च पुण्यानि सलिलानि च,जैसे शरीरके विभिन्न स्थान पवित्र बताये गये हैं, उसी प्रकार पृथ्वीके भिन्न-भिन्न भाग भी पवित्र तीर्थ हैं और वहाँका जल पुण्यदायक है

Bhishma berkata: “Sebagaimana bagian-bagian tertentu dari tubuh manusia dipandang suci, demikian pula berbagai wilayah di bumi adalah tīrtha yang penuh kebajikan; dan air yang ada di sana pun menganugerahkan pahala.”

Verse 17

कीर्तनाश्चैव तीर्थस्य स्नानाश्न पितृतर्पणात्‌ । धुनन्ति पापं तीर्थेषु ते प्रयान्ति सुखं दिवम्‌,जो लोग तीर्थोंके नाम लेकर तीर्थोमें स्नान करके तथा उनमें पितरोंका तर्पण करके अपने पाप धो डालते हैं, वे बड़े सुखसे स्वर्गमें जाते हैं

Bhishma berkata: “Mereka yang melantunkan nama dan kemuliaan tīrtha, lalu mandi di sana serta mempersembahkan tarpaṇa bagi para leluhur, akan menggugurkan dosa-dosanya; dan dengan bahagia mereka berangkat menuju surga.”

Verse 18

परिग्रहाच्च साधूनां पृथिव्याश्वैव तेजसा । अतीव पुण्यभागास्ते सलिलस्य च तेजसा,पृथ्वीके कुछ भाग साधु पुरुषोंके निवाससे तथा स्वयं पृथ्वी और जलके तेजसे अत्यन्त पवित्र माने गये हैं

Bhishma berkata: “Sebagian wilayah di bumi dipandang amat suci—disucikan oleh kediaman dan pergaulan orang-orang saleh, serta oleh daya pembersih (tejas) yang melekat pada bumi sendiri dan pada air.”

Verse 19

मनसश्न पृथिव्याश्व पुण्यास्तीर्थास्तथापरे । उभयोरेव यः स्नायात्‌ स सिद्धि शीघ्रमाप्तुयात्‌,इस प्रकार पृथ्वीपर और मनमें भी अनेक पुण्यमय तीर्थ हैं। जो इन दोनों प्रकारके तीर्थोर्में स्नान करता है, वह शीघ्र ही परमात्मप्राप्तिरूप सिद्धि प्राप्त कर लेता है

Bhishma berkata: “Demikian pula, ada tīrtha-tīrtha yang penuh kebajikan di bumi, dan ada pula di dalam batin (manas). Barangsiapa ‘mandi’ pada keduanya, ia segera meraih siddhi.”

Verse 20

यथा बल क्रियाहीनं क्रिया वा बलवर्जिता । नेह साधयते कार्य समायुक्ता तु सिध्यति

Bhīṣma berkata: sebagaimana kekuatan tanpa tindakan yang efektif, atau tindakan tanpa kekuatan, tidak dapat menyelesaikan suatu pekerjaan di dunia ini, demikian pula suatu karya berhasil hanya bila keduanya dipersatukan dengan tepat.

Verse 21

एवं शरीरशौचेन तीर्थशौचेन चान्वित: । शुचि: सिद्धिमवाप्रोति द्विविधं शौचमुत्तमम्‌

Bhīṣma berkata: orang yang dianugerahi kesucian tubuh dan kesucian yang diperoleh melalui tempat-tempat suci, menjadi benar-benar suci dan mencapai siddhi; kesucian yang dua macam inilah yang dinyatakan paling utama.

Verse 107

इस प्रकार श्रीमह्ाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उपवासकी विधिनामक एक सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir bab ke-107 yang berjudul “Tata Cara Berpuasa,” dalam bagian Dāna-dharma pada Anuśāsana Parva dari Śrī Mahābhārata.

Verse 108

जैसे क्रियाहीन बल अथवा बलरहित क्रिया इस जगतूमें कार्यका साधन नहीं कर सकती। बल और क्रिया दोनोंके संयुक्त होनेपर ही कार्यकी सिद्धि होती है, इसी प्रकार शरीरशुद्धि और तीर्थशुद्धिसे युक्त पुरुष ही पवित्र होकर परमात्मप्राप्तिरूप सिद्धि प्राप्त करता है। अतः दोनों प्रकारकी शुद्धि ही उत्तम मानी गयी है ।। इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि शौचानुपृच्छा नामाष्टाधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें शुद्धिकी जिज्ञासानामक एक सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ

Bhīṣma berkata: sebagaimana kekuatan tanpa tindakan, atau tindakan tanpa kekuatan, tidak mampu menyelesaikan pekerjaan di dunia ini—dan keberhasilan lahir hanya ketika kekuatan dan tindakan berpadu—demikian pula hanya orang yang memiliki kemurnian jasmani dan kemurnian yang diperoleh melalui tempat-tempat suci menjadi sungguh-sungguh suci dan mencapai siddhi berupa perwujudan Sang Diri Tertinggi. Karena itu, kemurnian yang dua macam inilah yang dipandang paling utama. Demikian berakhir bab ke-108 yang bernama “Penyelidikan tentang Kemurnian,” dalam bagian Dāna-dharma pada Anuśāsana Parva dari Śrī Mahābhārata.

Verse 131

प्रज्ञानं शौचमेवेह शरीरस्य विशेषत: । तथा निष्किंचनत्वं च मनसक्षु प्रसन्नता

Bhīṣma berkata: di sini, kebijaksanaan (discernment) dan kemurnian—terutama kemurnian tubuh—serta sikap tanpa kepemilikan, dan kejernihan hati, hendaknya dipupuk sebagai tanda-tanda laku yang benar.

Frequently Asked Questions

The dilemma is existential and ethical: when social supports (family, kin, teacher) cannot accompany a person beyond death, what should guide action—immediate advantage or sustained dharma that determines post-mortem fate.

Dharma is treated as an objective, accompanying force: practice righteousness consistently (including with just means of wealth), avoid greed-driven wrongdoing, and understand that actions generate traceable consequences across embodied states.

Yes. Bṛhaspati frames the doctrine as ancient and ‘guhya,’ and the chapter concludes by stating it was heard from Brahmā among divine seers, reinforcing lineage-based authority and urging Yudhiṣṭhira to keep his mind fixed on dharma.