Vamana's Three Steps
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Adhyaya 65: Vamana’s Three Steps and the Binding of Bali

वामन-त्रिविक्रम-चरितम् (Vāmana–Trivikrama-Caritam)

Binding of Bali

पुलस्त्य–नारद संवाद के अंतर्गत यह अध्याय बताता है कि भगवान विष्णु वामन रूप में बलि के यज्ञ-वाट में आते हैं और दान को यज्ञ-धर्म का बाध्यकारी संकल्प मानकर उसकी विधि-न्याय-परंपरा स्थापित करते हैं। असुर-धर्म में स्थित, पर अटल दानशील बलि ‘तीन पग’ का वर देता है; उदक-दान होते ही वामन त्रिविक्रम बनकर विराट् रूप धारण करते हैं, जिनके अंगों में लोक, देवता, वेद, दिशाएँ और समस्त ब्रह्माण्ड-व्यवस्था का वर्णन किया गया है। पहले दो चरणों से पृथ्वी और उच्च लोक व्याप जाते हैं; तीसरे चरण के लिए स्थान शेष रहने पर नैतिक तनाव उत्पन्न होता है और बलि समर्पण कर अपना मस्तक/पीठ अर्पित करता है। तब उसे सुतल लोक में भेजा जाता है—यह केवल दंड नहीं, दिव्य व्यवस्था है; साथ ही भविष्य में एक मन्वंतर में इन्द्रत्व का आश्वासन और बलि-संबंधी व्रत/उत्सवों की परंपरा का संकेत मिलता है। दान के लिए कुरुक्षेत्र को विशेष पुण्य-देश कहा गया है, और श्रुति, यज्ञाचार तथा विष्णु-भक्ति का समन्वय दिखाया गया है।

Divine Beings

वामन/त्रिविक्रम (Vāmana/Trivikrama)विष्णु/जनार्दन/मुरारि/चक्रपाणि (Viṣṇu/Janārdana/Murāri/Cakrapāṇi)ब्रह्मा (Brahmā)लक्ष्मी (Lakṣmī)अदिति (Aditi)अश्विनौ (Aśvinau)मरुतः (Maruts)विश्वेदेवाः (Viśvedevāḥ)वसवः (Vasus)रुद्राः (Rudrāḥ)प्रजापतिः (Prajāpati)सरस्वती (Sarasvatī)चन्द्र (Candra)सूर्य (Sūrya)ध्रुव (Dhruva)मन्मथ (Manmatha)

Sacred Geography

कुरुक्षेत्र (Kurukṣetra)सुतल (Sutala, Pātāla-loka)रसातल (Rasātala)स्वर्ग/त्रिविष्टप (Svarga/Triviṣṭapa)विष्णुपदी/सुरनदी (Viṣṇupadī/Suranadī—name given to the celestial river in this narrative)

Mortal & Asura Figures

पुलस्त्य (Pulastya)भरद्वाज (Bharadvāja)बलि (Bali)बाण (Bāṇa)शाल्व (Śālva)मय (Maya)तारकाक्ष (Tārakākṣa)वैद्युत (Vaidyuta)

Key Content Points

  • Vāmana arrives at Bali’s yajña-vāṭa; Bali ritually receives him and offers a boon, foregrounding dāna as a binding sacrificial contract (yajña-orthopraxy and asura-dharma).
  • Vāmana requests only ‘three steps’; upon the water-gift (udaka-dāna), he manifests as Trivikrama and performs a cosmic expansion with detailed iconographic descriptions of the universe located in his limbs and organs.
  • The third step remains to be ‘completed’; Bali is compelled toward submission and is assigned Sutala, with prophetic assurances (future Indra-hood in a later Manvantara) and the institution of later observances/festivals connected to Bali.

Shlokas in Adhyaya 65

Verse 6

ततो ऽब्रवीत् सुरश्रेष्ठो दैत्यराजानमव्ययः विहस्य सुचिरं कालं भरद्वाजमवेक्ष्य च

तब देवों में श्रेष्ठ अव्यय प्रभु ने बहुत देर तक मुस्कराकर और भरद्वाज की ओर दृष्टि डालकर दैत्यराज से कहा।

Verse 7

गुरोर्मदीयस्य गुरुस्तस्यास्त्यग्निपरिग्रहः न स धारयते भूम्यां पारक्यां जातवेदसम्

मेरे गुरु के गुरु ने अग्नियों का परिग्रह (पालन) किया है; वह पराई भूमि पर जातवेदस—यज्ञाग्नि—को धारण नहीं करते।

Verse 8

तदर्थमभियाच्ऽहं मम दानवपार्थिव मच्छरीरप्रमाणेन देहि राजन् पदत्रयम्

इसी हेतु, हे दानव-नरेश, मैं आपसे याचना करता हूँ—हे राजन्, मेरे शरीर के प्रमाण से नापकर मुझे तीन पग भूमि दीजिए।

Verse 9

सुरारेर्वचनं श्रुत्वा बलिर्भार्यामवेक्ष्य च बाणं च तनयं वीक्ष्य इदं वचनमब्रवीत्

देवों के शत्रु के वचन सुनकर बलि ने अपनी पत्नी की ओर देखा, और पुत्र बाण को भी देखकर यह वचन कहा।

Verse 10

न केवलं प्रमाणेन वामनो ऽयं लघुः प्रिये येन क्रमत्रयं मौर्ख्याद् याचते बुद्धितो ऽपि च

प्रिये, यह वामन केवल शरीर-प्रमाण से ही ‘छोटा’ नहीं है; क्योंकि वह तीन पग माँगता है—चाहे मूर्खता से या फिर बुद्धि से जान-बूझकर।

Verse 11

प्रयो विधाताल्पधियां नराणां बहिष्कृतानां च महानुभाग्यैः धनादिकं भूरि न वै ददाति यथेह विष्णोर्न बहुप्रयासः

सामान्यतः विधाता (भाग्य) अल्पबुद्धि मनुष्यों को, तथा जिनका सौभाग्य छिन गया है, उन्हें धन आदि बहुत नहीं देता; महान् सौभाग्य वालों को ही बड़ी समृद्धि मिलती है—जैसे यहाँ विष्णु को अधिक परिश्रम नहीं करना पड़ता।

Verse 12

न ददाति विधिस्तस्य यस्य भाग्यविपर्ययः मयि दातरि यश्चायमद्य याचेत् पदत्रयम्

जिसका भाग्य विपरीत हो गया हो, उसे विधि (दैव) सफलता नहीं देता; विशेषतः जब मैं दाता हूँ और यह आज तीन पग माँग रहा है।

Verse 13

इत्येवमुक्त्वा वचनं महात्मा भूयो ऽप्युवाचाथ हरिं दनूजः याचस्व विष्णो गजवाजिभूमिं दासीहिरण्यं यदभीप्सितं च

ऐसा कहकर उस महात्मा दानव ने फिर हरि से कहा—“हे विष्णु! भूमि, हाथी-घोड़े, दासियाँ और स्वर्ण—जो भी तुम्हें अभिप्रेत हो, माँग लो।”

Verse 14

भवान् याचयिता विष्णो अहं दाता जगत्पतिः दातुर्याचयितुर्लज्जा कथं न स्यात् पदत्रये

हे विष्णु! आप याचक हैं, और मैं दाता हूँ, हे जगत्पति। केवल तीन पग के दान में दाता या याचक—किसे लज्जा न होगी?

Verse 15

रसातलं वा वृथिवीं भुवं नाकमथापि वा एतभ्यः कतमं दद्यां स्थानं याचस्व वामन

रसातल हो या पृथ्वी, भुवर्लोक हो या स्वर्ग—इनमें से कौन-सा स्थान मैं दूँ? हे वामन! कोई राज्य/स्थान माँगिए।

Verse 16

वामन उवाच गजाश्वभूहिरण्यादि तदर्थिभ्यः प्रदीयताम् एतावता त्वहं चार्थी देहि राजन् पदत्रयम्

वामन बोले—हाथी, घोड़े, भूमि, स्वर्ण आदि जिनको चाहिए उन्हें दे दिए जाएँ। मैं तो केवल इतना ही चाहता हूँ—हे राजन्, मुझे तीन पग भूमि दान दीजिए।

Verse 17

इत्येवमुक्ते वचने वामनेन महासुरः बलिर्भृङ्गारमादाय ददौ विष्णोः क्रमत्रयम्

वामन के ऐसा कहने पर, महाअसुर बलि ने भृङ्गार (दान-जल का पात्र) उठाकर विष्णु को तीन पग (तीन चरण) दान कर दिए।

Verse 18

पाणौ तु पतिते तोये दिव्यं रूपं चकार ह त्रैलोक्यक्रमणार्थाय बहुरूपं जगन्मयम्

परन्तु जब जल (दान-जल) उसके हाथ पर गिरा, तब उसने त्रैलोक्य को नापने के लिए दिव्य रूप धारण किया—अनेक रूपों वाला, जगत् से व्याप्त।

Verse 19

पद्भ्यां भूमिस्तथा जङ्घे नभस्त्रैलोक्यवन्दितः सत्यं तपो जानुयुग्मे ऊरुभ्यां मेरुमन्दरौ

उसके चरणों से पृथ्वी, जंघाओं से (स्थूल) लोक, और जाँघों से त्रैलोक्य-वन्दित आकाश प्रकट हुआ। दोनों घुटनों में सत्य और तप स्थित हैं; और दोनों ऊरुओं से मेरु तथा मन्दर प्रकट हुए।

Verse 20

विश्वेदेवा कटीभागे मरुतो वस्तिशीर्षगाः लिङ्गे स्थितो मन्मथश्च वृषणाभ्यां प्रजापतिः

कटि-प्रदेश में विश्वेदेव स्थित हैं; वस्ति-शीर्ष में मरुत् देवता। लिङ्ग में मन्मथ (कामदेव) निवास करता है; और वृषण-द्वय में प्रजापति स्थित/प्रकट हैं।

Verse 21

कुक्षिभ्यामर्णवाः सप्त जठरे भुवनानि च वलिषु त्रिषु नद्यश्च यज्ञास्तु जठरे स्थिताः

उसके दोनों कुक्षियों से सात समुद्र हैं; उदर में समस्त भुवन स्थित हैं। उदर की तीन वलियों में नदियाँ हैं, और यज्ञ भी उदर में प्रतिष्ठित हैं।

Verse 22

इष्टापूर्तादयः सर्वाः क्रियास्तत्र तु संस्थिताः पृष्ठस्था वसवो देवाः स्कन्धौ रुद्रैरधिषठितौ

इष्ट‑पूर्त आदि समस्त क्रियाएँ वहीं प्रतिष्ठित हैं। पीठ में वसु देवता निवास करते हैं, और दोनों स्कन्ध रुद्रों द्वारा अधिष्ठित हैं।

Verse 23

बाहवश्च दिशः सर्वा वसवो ऽष्टौ करे स्मृताः हृदये संस्थितो ब्रह्मा कुलिशो हृदयास्थिषु

The arms are all the directions. The eight Vasus are remembered as being in the hands. Brahmā is stationed in the heart; and the thunderbolt (vajra) is in the bones of the heart.

Verse 28

शिखायां देवदेवस्य ध्रुवो राजा न्यषीदत तारका रोमकूपेभ्यो रोमाणि च महर्षयः

[{"question": "Why is the wife called “tapasvinī” if she is in a house (gṛha)?", "answer": "In Purāṇic idiom, tapas is not restricted to forest renunciation; it can denote disciplined, dharmic living, vows, and purity maintained by a householder woman."}, {"question": "What does the wife’s fear indicate in this narrative pattern?", "answer": "Fear commonly marks the onset of an adbhuta (marvel). It signals that what is being encountered exceeds ordinary experience—often a divine sign, boon, or karmic consequence."}, {"question": "Is the infant already identified as divine here?", "answer": "No. The verse only states that the brāhmaṇa sees the infant; identification (as a boon-born child, a sage, or a divine manifestation) typically unfolds in subsequent verses."}]

Verse āviśya: having entered/possessed; dharmiṣṭha: most righteous, exemplary in dharma; bhāvyaṃ: what is to be effected/what must happen; bhūta: a being (spirit/entity; also ‘elemental being’), here implying an occult agent; sāmpratam: now, at present; chalayitum: to deceive, delude, trick; surūpī: handsome, fair-formed; bhuvi saṃsthitaḥ: established/standing on the earth (in the human realm)

भूमिं विक्रममाणस्य महारूपस्य तस्य वै दक्षिणो ऽभूत् स्तनश्चन्द्रः सूर्यो ऽभूदथ चोत्तरः नक्षश्चाक्रमतो नाभिं सूर्येन्दू सव्यदक्षिणौ

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Verse 31

द्वितीयेन क्रमेणाथ स्वर्महर्जनतापसाः क्रान्तार्धार्धेन वैराजं मध्येनापूर्यताम्बरम्

तब दूसरे पग से उसने स्वर्ग, महर्लोक और तपोलोक को पार किया; और उस पग के आधे भाग से विराट्-विराजा विस्तार को लाँघकर मध्यलोक और आकाश को भर दिया।

Verse 32

ततः प्रतापिना ब्रह्मन् बृहद्विष्ण्वङ्घ्रिणाम्बरे ब्रह्माण्डोदरमाहत्य निरालोकं जगाम ह

Having drunk the nectar of Hari’s words with purified vessels of hearing (i.e., pure ears and attentive receptivity), those whose minds rejoice—such people cross beyond misfortunes and evil conditions.

Verse 33

विश्वाङ्घ्रिणा प्रसरता कटाहो भेदितो बलान् कुटिला विष्णुपादे तु समेत्य कुटिला ततः

सर्वव्यापी चरण के फैलते ही बलपूर्वक ‘कटाह’ फट गया; और ‘कुटिला’ नदी विष्णु-पाद से मिलकर तत्पश्चात् ‘कुटिला’ नाम से ही प्रसिद्ध हुई।

Verse 34

तस्या विष्णुपदीत्येवं नामाख्यातमभून्मुने तथा सुरनदीत्येवं तामसेवन्त तापसाः भगवानप्यसंपूर्णे तृतीये तु क्रमे विभुः

हे मुनि, उसका नाम इस प्रकार ‘विष्णुपदी’ प्रसिद्ध हुआ; और ‘सुरनदी’ भी कहलायी। तपस्वी उसके तटों का आश्रय लेकर साधना करते थे। और सर्वव्यापी भगवान् तीसरे पग की ओर बढ़े, यद्यपि वह अभी पूर्ण न हुआ था।

Verse 35

समभ्येत्य बलिं प्राह ईषत् प्रस्फुरिताधरः ऋमाद् भवति दैत्येन्द्र बन्धनं घोरदर्शनम् त्वं पूरय पदं तन्मे नो चेद् बन्धं प्रतीच्छ भोः

बलि के पास जाकर, अधर थोड़ा-सा काँपता हुआ, (भगवान्) बोले— “हे दैत्येन्द्र! इस ऋण-भंग से भयंकर, डरावना बंधन उत्पन्न होगा। मेरे उस पग को पूरा कर; नहीं तो, हे महोदय, बंधन स्वीकार कर।”

Verse 36

तन्मुरारिवचः श्रुत्वा विहस्याथ बलेः सुतः बाणः प्राहामरपतिं वचनं हेतुसंयुतम्

मुरारि (विष्णु) के वे वचन सुनकर बलि-पुत्र बाण हँसा और अमरों के स्वामी से कारणयुक्त वचन बोला।

Verse 38

बाण उवाच कृत्वा महीमल्पतरां जगत्पते स्वायंभुवादिभुवनानि वै षट् कथं बलिं प्रार्थयसे सुविस्तृतां यां प्राग्भवान् नो विपुलामथाकरोत् // वम्प्_65.37 विभो सही यावतीयं त्वयाद्य सृष्टचा समेता भुवनान्तरालैः दत्ता च तातेन हि तावतीयं किं वाक्छलेनैष निबध्यते ऽद्य

बाण बोला— हे जगत्पते! स्वायम्भुव आदि छह भुवनों के होते हुए भी आपने पृथ्वी को इतना छोटा कर दिया; फिर आप बलि से उस अत्यन्त विस्तृत दान की याचना कैसे करते हैं, जिसे पहले आपने ही अपार बनाया था? हे विभो! आज आपने जितना सृष्टि-समेत, लोकों के बीच के अन्तराल सहित, रचा है—उतना ही मेरे पिता ने दे दिया है। फिर वह आज वाक्-छल से क्यों बाँधा जा रहा है?

Verse 39

या नैव शक्य भवता हि पूरितुं कथं वितन्याद् दितिजेश्वरो ऽसौ शक्तस्तु संपूजयितुं मुरारे प्रसीद मा बन्धनमादिशस्व

जिस दान को आप भी पूर्णतः भर नहीं सकते, उसे वह दितिज-नरेश (बलि) कैसे विस्तृत कर सकेगा? फिर भी वह, हे मुरारि, आपकी सम्यक् पूजा करने में समर्थ है। प्रसन्न हों; उसके बन्धन की आज्ञा न दें।

Verse 40

प्रोक्तं श्रुतौ भवतापीश वाक्यं दानं पात्रे भवते सौख्यदायि देशे सुपुण्ये वरदे यच्च काले तच्चाशेषं दृश्यते चक्रपाणे

हे ईश! आपने ही श्रुति में यह वचन कहा है कि योग्य पात्र को दिया गया दान सुखदायक होता है; और जो दान अत्यन्त पुण्य देश में तथा उचित काल में दिया जाए, वह वर प्रदान करता है। हे चक्रपाणि! यह सब यहाँ आप में पूर्णतः विद्यमान है।

Verse 41

दानं भूमिः सर्वकामप्रदेयं भवान् पात्रं देवदेवो जितात्मा कालो ज्येष्ठामूलयोगे मृगाङ्गः कुरुक्षेत्रं पुण्यदेशं प्रसिद्धम्

भूमि-दान सर्वकामप्रद है। आप पात्र हैं—देवों के देव, जितेन्द्रिय। ज्येष्ठा-मूल नक्षत्र-योग सहित काल और चन्द्रमा (मृगाङ्क) भी अनुकूल हैं। कुरुक्षेत्र प्रसिद्ध पुण्यदेश है।

Verse 42

किं वा देवो ऽस्मद्विधैर्बुद्धिहीनैः शिक्षापनीयः साधु वासाधु चैव स्वयं श्रुतीनामपि चादिकर्त्ता व्याप्य स्थितः सदसद् यो जगद् वै

हम जैसे बुद्धिहीन जन भला देव को क्या शिक्षा दे सकते हैं—क्या अच्छा है, क्या बुरा है? वही तो वेदों के भी आदिकर्ता हैं; सबमें व्याप्त होकर वही यह जगत् हैं, सत् और असत् दोनों रूपों में।

Verse 43

कृत्वा प्रमाणं स्वयसेव हीनं पदत्रयं याचितवान् भुवश्च किं त्वं न गृह्णासि जगत्त्रयं भो रूपेण लोकत्रयवन्दितेन

तुमने मानो अपनी ही शक्ति को घटाकर छोटा-सा प्रमाण धारण किया और पृथ्वी के तीन पग माँगे। फिर हे प्रभो, तीनों लोकों द्वारा वन्दित उसी रूप से तुम तीनों जगत् क्यों नहीं ले लेते?

Verse 44

नात्राश्चर्यं यज्जगद् वै समग्रं क्रमत्रयं नैव पूर्णं तवाद्य क्रमेण त्वं लङ्घयितुं समर्थो लीलामेतां कृतवान् लोकनाथ

इसमें आश्चर्य नहीं कि आज तुम्हारे तीन पगों से समग्र जगत् पूरा नहीं घिर सका। हे लोकनाथ, तुम तो एक ही पग में उसे लाँघने में समर्थ हो; यह त्रिविक्रम-लीला तुमने केवल क्रीड़ा रूप से की है।

Verse 45

प्रमाणहीनां स्वयमेव कृत्वा वसुंधरां माधव पद्मनाभ विष्णो न बध्नासि बलिं न दूरे प्रभुर्यदेवेच्छति तत्करोति

हे माधव, हे पद्मनाभ, हे विष्णु—तुमने स्वयं पृथ्वी को ‘प्रमाणहीन’ (अपरिमेय) कर दिया, फिर भी न तुम बलि को बाँधते हो, न उसे दूर रखते हो। प्रभु वही करता है जो वह चाहता है।

Verse 46

पुलस्त्य उवाच इत्येवमुक्ते वचने बाणेन बलिसूनुना प्रोवाच भगवान् वाक्यमादिकर्त्ता जनार्दनः

पुलस्त्य बोले—बलि के पुत्र बाण द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, तब आदिकर्ता भगवान् जनार्दन ने प्रत्युत्तर में वचन कहा।

Verse 47

त्रिविक्रम उवाच यान्युक्तानि वचांसीत्थं त्वया बालेय साम्प्रतम् तेषां वैच हेतुसंयुक्तं शृणु प्रत्युत्तरं मम

त्रिविक्रम बोले—हे बलि के वंशज, तुमने अभी जो वचन कहे हैं, उनके उचित कारणों से युक्त मेरा प्रत्युत्तर अब सुनो।

Verse 48

पूर्वमुक्तस्तव पिता मया राजन् पदत्रयम् देहि मह्यं प्रमाणेन तदेतत् समनुष्ठितम्

हे राजन्, पहले मैंने तुम्हारे पिता से कहा था—‘उचित प्रमाण के अनुसार मुझे तीन पग भूमि दो।’ वही याचना विधिपूर्वक पूरी की गई।

Verse 49

किं न वेत्ति प्रमाणं मे बलिस्तव पितासुर प्रायच्छद् येन निःशङ्कं ममानन्तं क्रमत्रयम्

क्या तुम्हारे पिता असुर बलि मेरे वास्तविक प्रमाण को नहीं जानते? उन्हीं ने तो निःशंक होकर मेरे अनन्त तीन पग प्रदान किए।

Verse 50

सत्यं क्रमेण चैकेन क्रमेयं भूर्भुवादिकम् बलेरपि हितार्थाय कृतमेतत् क्रमत्रयम्

सत्य है, एक ही पग से भूः-भुवः आदि लोकों को नापा जा सकता था; फिर भी बलि के हित के लिए यह तीन पगों का क्रम किया गया।

Verse 51

तस्माद् यन्मम बालेय त्वत्पित्राम्बु करे महत् दत्तं तेनायुरेतस्य कल्पं यावद् भविष्यति

इसलिए, हे बालेय, तुम्हारे पिता ने जल सहित जो महान दान मेरे हाथ में दिया, उस कर्म से उसकी आयु कल्प-पर्यन्त बनी रहेगी।

Verse 52

गते मन्वन्तरे बाण श्राद्धदेवस्य साम्प्रतम् सावर्णिके च संप्राप्ते बलिरिन्द्रो भविष्यति

हे बाण! जब श्राद्धदेव का वर्तमान मन्वन्तर बीत जाएगा और सावर्णिक मन्वन्तर आ पहुँचेगा, तब बलि इन्द्र होगा।

Verse 53

इत्थं प्रोक्त्वा बलिसुतं बाणं देवस्त्रिविक्रमः प्रोवाच बलिमभ्येत्य वचनं मधुराक्षरम्

इस प्रकार बलि-पुत्र बाण से कहकर देव त्रिविक्रम ने बलि के पास जाकर मधुर अक्षरों वाले (कोमल) वचन कहे।

Verse 54

श्रीभगवानुवाच आपूरणाद् दक्षिणाया गच्छ राजन् महाफलम् सुतलं नाम पातालं वस तत्र निरामयः

श्रीभगवान बोले—हे राजन्! आपूरण से दक्षिण दिशा की ओर जाओ; वहाँ महान फल (प्रतिफल) है। ‘सुतल’ नामक पाताल में निवास करो; वहाँ तुम निरामय रहोगे।

Verse 55

बलिरुवाच सुतले वसतो नाथ मम भोगाः कुतो ऽव्ययाः भविष्यन्ति तु येनाहं निवत्स्यामि निरामयः

बलि ने कहा—हे नाथ! सुतल में रहते हुए मेरे भोग और साधन कहाँ से अव्यय (अक्षय) होंगे, जिनके द्वारा मैं निरामय होकर निवास कर सकूँ?

Verse 56

त्रिविक्रम उवाच सुतलस्थस्य दैत्येन्द्र यानि भोगानि ते ऽधुना भिवष्यन्ति महार्हाणि तानि वक्ष्यामि सर्वशः

त्रिविक्रम बोले—हे दैत्येन्द्र! सुतल में स्थित तुम्हारे जो भोग अब अत्यन्त मूल्यवान होंगे, उन्हें मैं विस्तार से कहूँगा।

Verse 57

दानान्यविधित्तानि श्राद्धान्यश्रोत्रियाणि च तथाधीतान्यव्रतिभिर्दास्यन्ति भवतः फलम्

विधि के बिना किए गए दान, अश्रोत्रिय के लिए किए गए श्राद्ध, और व्रतहीन व्यक्तियों द्वारा किए गए पाठ/कर्म—ये सब भी आपके लिए अपना फल अवश्य देंगे।

Verse 58

तथान्यमुत्सवं पुण्यं वृत्ते शक्रमहोत्सवे द्वारप्रतिपदा नाम तव भावी महोत्सवः

इसी प्रकार एक और पुण्य उत्सव होगा। शक्र के महोत्सव के समय ‘द्वारप्रतिपदा’ नाम से तुम्हारा महान उत्सव भी होने वाला है।

Verse 59

तत्र त्वां नरशार्दूला हृष्टाः पुष्टाः स्वलङ्कृताः पुष्पदीपप्रदानेन अर्जयिष्यन्ति यत्नतः

वहाँ, हे नरशार्दूल, हर्षित, समृद्ध और सुसज्जित लोग पुष्प और दीप अर्पित करके प्रयत्नपूर्वक तुम्हारा सम्मान/पूजन करेंगे।

Verse 61

तत्रोत्सवो सुख्यतमो भविष्यति दिवानिशं हृष्टजनाभिरामम् यथैव राज्ये भवतस्तु साम्प्रतं तथैव सा भाव्यथ कौमुदी च // वम्प्_65.60 इत्येवमुक्त्वा मधुहा दितीश्वरं विसर्जयित्वा सुतलं सभार्यम् यज्ञं समादाय जगाम तूर्णं स शक्रसद्भामरसंघजुष्टम्

["viṣṇu-tatpara", "hari-vacana", "māmakī tanuḥ", "brāhmaṇa-arcana", "bhakti"]

Verse 63

स्वर्गं गते धातरि वासुदेवे शाल्वो ऽसुराणां महता बलेन कृत्वा पुरं सौभमिति प्रसिद्धं तदान्तरिक्षे विचचार कामात्

धाता (स्रष्टा) के स्वर्ग चले जाने पर, असुरों के महान् बल से युक्त शाल्व ने ‘सौभ’ नाम से प्रसिद्ध एक नगर बनाया और अपनी इच्छा से उसे आकाश-मध्य में विचराया।

Frequently Asked Questions

This chapter is overtly Vaiṣṇava (Vāmana–Trivikrama), yet it advances syncretic theology by grounding devotion in shared Vedic-sacrificial cosmology: śruti, yajña, and the deva-gaṇas are portrayed as integrated within Viṣṇu’s cosmic body. The effect is not polemical supremacy but a unifying metaphysics in which sectarian forms participate in one cosmic order (ṛta/dharma) expressed through ritual and iconography.

Kurukṣetra is explicitly cited as the renowned puṇya-deśa where dāna becomes maximally efficacious (a model setting defined by deśa–kāla–pātra). While the narrative is not a full tīrtha-catalogue here, it uses Kurukṣetra as topographical sanctification—an authoritative pilgrimage landscape that legitimizes the ritual act (udaka-dāna) and frames the myth in the Sarasvatī-basin sacred imagination.

The Adhyāya reaches the decisive phase: Bali grants the three steps, Vāmana becomes Trivikrama, the first two strides encompass the worlds, and the unresolved third step forces Bali’s surrender. Bali is then assigned Sutala with boons and a future prophecy (Indra-hood in a later Manvantara), presenting the episode as moral theology of dāna—binding, transformative, and ultimately salvific even for an asura-king.