Turiyateeta
samnyasaAtharva1 Verses

Turiyateeta

samnyasaAtharva

तुरीयातीत उपनिषद् अथर्ववेद से संबद्ध संन्यासोपनिषदों में गिनी जाती है। यह माण्डूक्य उपनिषद् के ‘तुरीय’ सिद्धान्त को और सूक्ष्म बनाकर ‘तुरीयातीत’—अर्थात् तुरीय की संकल्पना से भी परे—अद्वैत ब्रह्म का संकेत करती है। इसका आशय यह है कि परम सत्य कोई ‘चौथी अवस्था’ नहीं, बल्कि जाग्रत्‑स्वप्न‑सुषुप्ति तीनों का साक्षी, स्वयंप्रकाश और अविषय (वस्तु न बनने वाला) चैतन्य है। ऐतिहासिक रूप से यह पाठ मध्यकालीन संन्यास परम्परा और अद्वैत वेदान्त की परिपक्व व्याख्याओं के वातावरण में समझा जाता है, जहाँ जीवन्मुक्ति और आन्तरिक वैराग्य को संन्यास का सार माना गया। एक ही पद/सूत्र में संक्षेप इसकी शिक्षण-शैली को दिखाता है: स्मरणीय वाक्य के रूप में ध्यान (निदिध्यासन) के लिए। मुख्य विषय ‘नेति नेति’ द्वारा सूक्ष्म आसक्ति का भी निरसन, कर्ता‑भोक्ता भाव का क्षय, द्वन्द्वातीत समता, और आत्मा‑ब्रह्म की अभिन्नता का प्रत्यक्ष बोध है। संन्यासी का आदर्श बाह्य त्याग से अधिक उस स्थिति में है जहाँ चेतना स्वयं को किसी अनुभव या अवस्था के रूप में नहीं, बल्कि सभी अवस्थाओं के आधार के रूप में जानती है।

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Key Teachings

- Turīyātīta: the Absolute is “beyond even turīya

” i.e.

beyond any conceptualized ‘fourth state’

- Ātman/Brahman as sākṣin: the ever-present witness of waking

dream

and deep sleep

- Non-objectifiability (aviṣayatva): reality cannot be grasped as an experience or mental content

- Neti neti and apophatic pedagogy: negation as a method to dissolve subtle reification

- Asaṅga (non-attachment): freedom as disidentification from body–mind and social roles

- Jīvanmukti ideal: liberation as present knowledge

not a post-mortem attainment

- Transcendence of dualities: beyond doer/enjoyer

merit/demerit

praise/blame

pleasure/pain

- Saṃnyāsa as inner renunciation: external abandonment is secondary to abidance in non-dual awareness

Verses of the Turiyateeta

1 verses with Sanskrit text, transliteration, and translation.

Verse 0

अथ तुरीयातीतावधूतानां कोऽयं मार्गस्तेषां का स्थितिरिति पितामहो भगवन्तं पितरमादिनारायणं परिसमेत्योवाच। तमाह भगवन्नारायणो योऽयमवधूतमार्गस्थो लोके दुर्लभतरो न तु बाहुल्यो यद्येको भवति स एव नित्यपूतः स एव...

तब पितामह ने भगवान् पिता आदिनारायण के पास जाकर पूछा—“तुरीयातीत अवधूतों का मार्ग क्या है और उनकी स्थिति कैसी है?” भगवान् नारायण बोले—“जो अवधूत-मार्ग में स्थित है वह संसार में अत्यन्त दुर्लभ है, सामान्य नहीं। यदि ऐसा कोई एक भी हो, वही सदा शुद्ध है; वही वैराग्य की मूर्ति है; वही ज्ञान-स्वरूप है; वही वेद-पुरुष है—ऐसा ज्ञानी मानते हैं। जिस महापुरुष का चित्त केवल मुझमें टिकता है, मैं भी उसी में स्थित रहता हूँ। वह पहले क्रम से कुटीचक, फिर बहूदक, फिर हंस, और फिर परमहंस होता है। अपने स्वरूप की खोज से समस्त प्रपंच को जानकर वह दण्ड, कमण्डलु, कटिसूत्र, कौपीन, आच्छादन तथा विधि-विहित कर्मों को जल में त्याग देता है; दिगम्बर होकर जीर्ण-विवर्ण वल्कल और अजिन का भी परिग्रह छोड़ देता है। आगे वह मानो मन्त्ररहित आचरण करता हुआ क्षौर, अभ्यंग, स्नान, ऊर्ध्वपुण्ड्र आदि छोड़ देता है; लौकिक और वैदिक कर्मों का भी संकोच कर देता है। वह सर्वत्र पुण्य-पाप से रहित होकर ज्ञान-अज्ञान तक का त्याग करता है; शीत-उष्ण, सुख-दुःख, मान-अपमान को जीत लेता है। तीन वासनाओं सहित निन्दा-प्रशंसा, गर्व, मत्सर, दम्भ, दर्प, द्वेष, काम, क्रोध, लोभ, मोह, हर्ष, अमर्ष, असूया, आत्म-रक्षा आदि को जला देता है; अपने शरीर को मानो शव के समान देखता है। बिना प्रयास और बिना नियम लाभ-हानि को समान मानकर ‘गोवृत्ति’ से प्राण धारण करता है; जो मिल जाए उसी से निर्लोभ रहता है। समस्त विद्या-पाण्डित्य के प्रदर्शन को भस्म कर अपने स्वरूप को गोपनीय रखता है; ज्येष्ठ-अज्येष्ठ का दावा नहीं करता; सर्वोत्कृष्टता और सर्वात्मभाव के रूप में अद्वैत का निश्चय कर लेता है कि “मुझसे भिन्न कोई दूसरा नहीं।” देव-गुह्य आदि धन को अपने भीतर समेट लेता है। दुःख से विचलित नहीं होता, सुख से उछलता नहीं; राग में निःस्पृह रहता है; शुभ-अशुभ में आसक्ति नहीं; इन्द्रियाँ शान्त रहती हैं। पूर्व आश्रम, आचार, विद्या और धर्म की महिमा का स्मरण नहीं करता; वर्णाश्रम-आचार त्याग देता है; दिन-रात सम, निद्रारहित; सदा विचरणशील; केवल देह-मात्र शेष; जल-स्थल में उपयोगी कमण्डलु; उन्मत्त नहीं, फिर भी बालक/उन्मत्त/पिशाच-सा एकाकी घूमता है; संवाद से विरक्त रहता है। स्वरूप-ध्यान से निरालम्ब का आश्रय लेकर आत्मनिष्ठा के अनुरूप सब कुछ विस्मृत कर तुरीयातीत अवधूत-वेष में अद्वैत-निष्ठा परायण होकर प्रणव (ॐ) स्वरूप से देह का त्याग करता है—वही अवधूत है; वही कृतकृत्य होता है—यही उपनिषद् है।

Moksha (jīvanmukti) through Turīyātīta-Avadhūta nondual abidance (Advaita) and total renunciation of upādhis