
इस आठवें अध्याय में श्रीवराह के कथनानुसार श्रीनिवास लक्ष्मी को बुलाकर विवाह की समस्त तैयारियाँ सँभालने का आदेश देते हैं। तब श्रुति, स्मृति, धृति, शान्ति, ह्री, कीर्ति आदि वेद-तत्त्व मानो साकार होकर आते हैं और सुगन्धित तेल, वस्त्र, आभूषण, दर्पण, कस्तूरी तथा राजचिह्न जैसी पूजन-सामग्री लाते हैं—धर्मानुसार मंगल अलंकरण की पूरी व्यवस्था प्रकट होती है। लक्ष्मी दिव्य लोकों और तीर्थों से लाए गए सुगन्धित जल से अभ्यंग-स्नान कराकर प्रभु को वस्त्र-भूषणों से सजाती हैं; भगवान ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण कर गरुड़ पर आरूढ़ होकर नारायणपुरी/आकाशराज की नगरी की ओर उत्सव-यात्रा करते हैं, जहाँ देव, ऋषि, गन्धर्व और अप्सराएँ मंगल-पाठ के साथ स्वागत करते हैं। पद्मावती के साथ त्रिवार जयमाला-विनिमय, शुभ गृह-प्रवेश, माङ्गल्यसूत्र-बन्धन और लाजा-होम आदि विवाह-विधियाँ पूर्ण होती हैं। इसके बाद प्राभृत (उपहार) का विस्तृत वर्णन है—अन्न, घी, दुग्ध-पदार्थ, फल, वस्त्र, स्वर्ण-रत्न, पशु, घोड़े, हाथी और सेवक-समूह तक—जिससे राजदान धर्मार्पण के रूप में प्रतिष्ठित होता है। अंत में श्रीनिवास आकाशराज को वर देते हैं कि उसकी भक्ति अचल रहे और मन सदा प्रभु के चरणों में स्थित हो; देवगण अपने-अपने धाम लौटते हैं और भगवान स्वामिपुष्करिणी के समीप निवास कर निरंतर पूजा स्वीकार करते हैं।
No shlokas available for this adhyaya yet.
Read Skanda Purana in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with audio, word-by-word meanings, and more.