Adhyaya 5
Vishnu KhandaVenkatachala MahatmyaAdhyaya 5

Adhyaya 5

इस अध्याय में दिव्य आगमन के बाद कथा का रुख भीतर की तड़प और विरह-भाव की ओर मुड़ता है। श्रीनिवास रत्नजटित मंडप में प्रवेश कर पद्मावती के सौंदर्य-स्मरण में डूब जाते हैं और मोह से ग्रस्त-से तन्मय अवस्था में चले जाते हैं। तब बकुलमालिका सुसज्जित अर्घ्य-उपहार लेकर आती है, उनके शरीर और मन के लक्षण देखकर प्रश्न करती है और उनकी दशा का अर्थ समझाती है। श्रीनिवास उत्तर में पद्मावती का पूर्वकाल से संबंध बताते हैं—वेदवती/सीता की कथा और पूर्व में किया गया वह वचन कि अगले युग में मिलन होगा—जिससे वर्तमान प्रेम धर्म-प्रतिज्ञा और दैवी योजना की निरंतरता सिद्ध होता है। फिर वे बकुलमालिका को यात्रा-मार्ग बताते हैं: नृसिंह-गुहा, अगस्त्य-आश्रम और सुवर्णमुखरी तट पर अगस्त्येश-लिंग, आगे वन-सरिताओं और सरोवरों से होते हुए नारायणपुरी/आकाशराज की नगरी। मार्ग में वृक्षों, पक्षियों और पशुओं का वर्णन एक पवित्र मानचित्र-सा बनता है। अंत में बकुलमालिका यात्रा आरंभ करती है और पद्मावती की सखियों से मिलकर अगले संवाद का सूत्रपात करती है।

Shlokas

No shlokas available for this adhyaya yet.