
इस अध्याय में सूत के मुख से धरणी का प्रश्न आता है और वराह भगवान उत्तर देते हुए बताते हैं कि आकाशराज ने पृथ्वी से उत्पन्न कन्या का नाम “पद्मिनी” रखा। आगे पद्मावती के उद्यान-आश्रम के निकट देवर्षि नारद अकस्मात् आते हैं; पद्मावती के आग्रह पर वे शुभ देह-लक्षणों का विस्तृत वर्णन करते हैं और अंत में कहते हैं कि उसका स्वरूप “विष्णु-योग्य” है तथा लक्ष्मी के समान है। नारद के अंतर्धान के बाद पद्मिनी/पद्मावती सखियों सहित वसंत के फूल चुनने पुष्पाटवी में प्रवेश करती है; अनेक पुष्पों का वर्णन होता है और वन एक पवित्र, अनुष्ठान-रम्य स्थल के रूप में उभरता है। तभी एक उग्र हाथी दिखाई देता है और भय फैलता है, पर उसी क्षण अश्वारूढ़ धनुर्धर तेजस्वी पुरुष प्रकट होता है—वेङ्कटाद्रि-निवासी श्रीनिवास, जो इस प्रसंग में स्वयं को सूर्यवंशी “कृष्ण” बताते हैं। स्त्रियाँ कहती हैं कि ‘ईहामृग’ नहीं देखा, यह राज-रक्षित वन है, और वे उसका परिचय पूछती हैं; वह शिकार हेतु आया बताकर पद्मावती को देखकर आकर्षित होने की बात स्वीकार करता है, फिर सखियों द्वारा राज-दण्ड की चेतावनी मिलने पर सेवकों सहित शीघ्र पर्वत की ओर चला जाता है।
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