
इस अध्याय में नदी-रहित प्रदेश के कल्याण हेतु एक पुण्यनदी के प्राकट्य और मार्ग-निर्धारण का कारण-प्रसंग बताया गया है। भारद्वाज कहते हैं कि प्रातःकर्म और देवपूजा के बाद अगस्त्य मुनि आकाशवाणी सुनते हैं—“जहाँ नदी नहीं, वहाँ यज्ञ-संस्कारों की शोभा नहीं रहती; गहन अधर्मजन्य भय को हरने वाली हितकारी नदी प्रवर्तित करो।” वे एकत्र ऋषियों से परामर्श करते हैं; ऋषिगण उनके पूर्व अद्भुत कार्यों की प्रशंसा कर स्नान-शुद्धि के लिए महानदी लाने की प्रार्थना करते हैं। तब अगस्त्य कठोर ऋतुओं में नियम बढ़ाकर तीव्र तप करते हैं। उनके तप से जगत में क्षोभ और प्राणियों में भय उत्पन्न होता है। देवता ब्रह्मा की शरण जाते हैं; ब्रह्मा अगस्त्याश्रम में प्रकट होकर वर देते हैं। अगस्त्य देश को पवित्र और सुरक्षित करने हेतु एक महान नदी की याचना करते हैं। ब्रह्मा गंगा को बुलाकर आदेश देते हैं कि वह अपने स्वांश से उतरकर ऐसी नदी बने जो जनसमुदाय को पवित्र करे और ऋषि-देवों द्वारा निरंतर सेवित हो। गंगा अपने अंश से उत्पन्न तेजस्वी रूप प्रकट कर सिद्धि का वचन देती हैं; अगस्त्य मार्ग बताते हैं। अंत में अगस्त्य पर्वत-शिखरों से उस नदी-रूप को इच्छित पथ पर ले जाकर सुवर्णमुखरी की पावनता की आधार-कथा स्थापित करते हैं।
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