Adhyaya 21
Vishnu KhandaVenkatachala MahatmyaAdhyaya 21

Adhyaya 21

इस अध्याय में श्रीसूत नैमिषारण्य के ऋषियों से कहते हैं कि आकाशगंगा-तीर्थ के तट पर रामानुज नामक शास्त्रज्ञ, जितेन्द्रिय, वैखानस-धर्मनिष्ठ ब्राह्मण ने दीर्घ तप किया। वह ऋतु-क्रम से तप करता है—ग्रीष्म में पंचाग्नि, वर्षा में खुले आकाश के नीचे निवास, शीत में जल-शयन; साथ ही अष्टाक्षर मंत्र-जप और जनार्दन का अंतर्ध्यान करता रहता है। तप से प्रसन्न होकर वेङ्कटेश/श्रीनिवास शंख-चक्र-गदा धारण किए, दिव्य पार्षदों सहित, नारद के गान और दिव्य वाद्यों के बीच, वक्षस्थल पर लक्ष्मी के साथ प्रकट होते हैं। रामानुज की स्तुति सुनकर भगवान उसे आलिंगन देते हैं और वर मांगने को कहते हैं; वह अचल भक्ति मांगता है और दर्शन को ही परम सिद्धि मानता है। यहाँ भगवान के नाम और दर्शन की मोक्षदायिनी शक्ति प्रतिपादित होती है। फिर भगवान आकाशगंगा में स्नान का विशेष पुण्यकाल बताते हैं—मेष-संक्रांति पर, चित्रा नक्षत्रयुक्त पूर्णिमा में स्नान करने से परम धाम की प्राप्ति और पुनर्जन्म-निवृत्ति होती है। इसके बाद ‘भागवत’ की पहचान पूछने पर अहिंसा, अद्वेष, संयम, सत्य, माता-पिता/ब्राह्मण/गौ-सेवा, हरिकथा-श्रवण, तीर्थ-रुचि, जल-अन्न दान, एकादशी-व्रत, हरिनाम-रस, तुलसी-पूजन तथा तालाब-कूप-उद्यान-देवालय जैसे लोकहित कार्य—इन लक्षणों से भागवत-श्रेष्ठ का वर्णन किया जाता है। अंत में सूत वृषाद्रि (वेङ्कटाद्रि) की वियद्गंगा के इस ‘उत्तम’ माहात्म्य का उपसंहार करते हैं।

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