Adhyaya 2
Vishnu KhandaVenkatachala MahatmyaAdhyaya 2

Adhyaya 2

इस अध्याय में सूत एक प्राचीन प्रसंग सुनाते हैं—वैवस्वत मन्वन्तर के कृतयुग में नारायणाद्रि पर धरणी देवी वराह भगवान् के पास जाकर पूछती हैं कि कौन-सा मंत्र उन्हें प्रसन्न करता है और जिससे समस्त फल—समृद्धि, राज्य-ऐश्वर्य, संतान तथा नियमशील साधकों को अंततः भगवत्पद—प्राप्त होते हैं। वराह भगवान् एक ‘परम गोपनीय’ मंत्र बताते हैं और कहते हैं कि इसका उपदेश केवल भक्त और संयमी को ही किया जाए। फिर मंत्र-शास्त्रीय विवरण दिया जाता है—मंत्र: “ॐ नमः श्रीवराहाय धरण्युद्धरणाय च”; ऋषि: संकर्षण, देवता: वराह, छंद: पंक्ति, बीज: श्री-बीज। सद्गुरु से प्राप्त साधक के लिए चार लाख जप का विधान है, और उसके बाद मधु-घृतयुक्त पायस से होम बताया गया है। ध्यान में वराह का स्फटिक-सा तेज, कमल-लाल नेत्र, वराहमुख पर सौम्यता, चार भुजाएँ—चक्र, शंख, अभय-मुद्रा और कमल—लाल-सुनहरे वस्त्राभूषण तथा शेष आदि विश्वाधार-चिह्नों सहित रूप वर्णित है। फलश्रुति में कहा गया है कि नित्य 108 बार जप से अभीष्ट सिद्धियाँ मिलती हैं और अंत में मोक्ष प्राप्त होता है। आगे उदाहरण आते हैं—धर्म नामक मनु ने देवतुल्य अवस्था पाई, शाप से गिरा इन्द्र स्वर्ग पुनः प्राप्त कर सका, ऋषियों ने उच्च गति पाई, और श्वेतद्वीप में जप से अनन्त पृथ्वी का आधार बने। अंत में धरणी श्रीनिवास के वेङ्कट पर आगमन और वहाँ स्थायी निवास के विषय में पूछती हैं।

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