Skanda Purana Adhyaya 16
Vishnu KhandaVenkatachala MahatmyaAdhyaya 16

Adhyaya 16

इस अध्याय में वेङ्कटाद्रि पर जलदान (पानी का दान/प्यासों को जल उपलब्ध कराना) को अत्यन्त निर्णायक धर्मकर्म बताया गया है। श्रीसूत कहते हैं कि विशेषतः प्यासे जनों के प्रति जलदान की उपेक्षा भारी पाप का कारण बनती है और दुष्ट योनियों में जन्म दिलाती है; वेङ्कटाचल पर किया गया जलदान अनेकगुणित फल देता है। उदाहरण-रूप इतिहासन में इक्ष्वाकुवंशी राजा हेमाङ्ग गोदान, धनदान और यज्ञ-सेवा में उदार था, पर “जल तो सहज मिलता है” ऐसा तर्क करके जलदान को तुच्छ मानता रहा। उसने अपात्रों का सम्मान किया और विद्वान, संयमी ब्राह्मणों की उपेक्षा की—पात्र-विवेक का दोष। फलतः वह क्रमशः नीच योनियों में गिरकर मिथिला में गृह-गोधिका (छिपकली) बना। एक दिन मुनि श्रुतदेव का आगमन हुआ; स्थानीय राजा ने उनका पूजन किया। चरण-प्रक्षालन का पादोदक उछलकर छिपकली पर पड़ा, जिससे उसे पूर्वजन्म-स्मृति हुई। हेमाङ्ग ने अपना अपराध स्वीकार किया। श्रुतदेव ने बताया कि वेङ्कटाद्रि पर जलदान न करना और अपात्र-दान ही उसके पतन का कारण है। मुनि ने पुण्य-स्थानान्तरण और जल-स्पर्श की पवित्रता से उसे पशुयोनि से मुक्त किया; वह स्वर्गारोहण, फिर राजजन्म और अन्ततः विष्णु-सायुज्य को प्राप्त हुआ। अध्याय अंत में वेङ्कटाद्रि की शुद्धिकारिणी महिमा और जलदान के विष्णुलोक-प्रद होने की पुनः पुष्टि करता है।

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