
अध्याय 28 में वासुदेव-पूजा की क्रमबद्ध विधि बताई गई है। पहले आचमन और प्राणायाम द्वारा शुद्धि, फिर मन की स्थिरता, देश-काल का संकीर्तन और इष्टदेव को प्रणाम किया जाता है। धर्म में एकाग्र सिद्धि हेतु संकल्प लेकर वैष्णव मन्त्रों से न्यास किया जाता है; पात्रता के अनुसार द्विजों के लिए अलग मन्त्र-समूह और अन्य लोगों के लिए त्रय-मन्त्रों का विकल्प बताया गया है, जो न्यास और होम—दोनों में मान्य हैं। इसके बाद प्रतिमा तथा अपने शरीर पर न्यास, अर्चा-शोधन, वाम भाग में कलश-स्थापन, तीर्थों का आवाहन, गन्ध-पुष्पादि उपचार, प्रोक्षण, शंख-घण्टा का पूजन और भूतशुद्धि का विधान आता है। अंतर्मुख होकर साधक अग्नि और वायु की भावना से पापमय देह-भाव को ‘दग्ध’ कर शुद्धि करता है और ब्रह्मैक्य का चिंतन करता है। फिर ध्यान-प्रकरण में हृदय-कमल में स्थापना, ऊर्ध्वगति से शक्तियों का आरोह, श्रीकृष्ण (राधिकापति) का सविस्तार रूप-ध्यान, तत्पश्चात श्रीराधा का ध्यान, और अंत में दोनों सहित भगवान का पूजन वर्णित है।
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