
यह अध्याय दिव्य अधिकार के साथ आरम्भ होता है। स्कन्द कहते हैं कि यह प्रश्न अत्यन्त गूढ़ है, केवल तर्क से नहीं सुलझता; वासुदेव की कृपा से ही यह वचन में आ सकता है। फिर महाभारत-युद्ध के बाद युधिष्ठिर अच्युत-ध्यान में स्थित भीष्म से पूछते हैं—चारों पुरुषार्थों की सिद्धि के लिए सभी वर्ण-आश्रमों को किस देव की उपासना करनी चाहिए, अल्प समय में निर्विघ्न सफलता कैसे मिले, और थोड़े से पुण्य से भी महान पद कैसे प्राप्त हो। कृष्ण की प्रेरणा से भीष्म “श्री-वासुदेव-माहात्म्य” का उपदेश देते हैं, जिसे नारद कुरुक्षेत्र और कैलास के माध्यम से परम्परा में स्थापित करते हैं। सिद्धान्त यह है कि वासुदेव/कृष्ण ही परब्रह्म हैं; निष्काम और सकाम—दोनों प्रकार के साधकों के लिए वे उपास्य हैं, और अपने-अपने धर्म में स्थित रहकर भी सभी भक्तिभाव से उन्हें प्रसन्न कर सकते हैं। अध्याय बताता है कि वेदिक, पितृ तथा लौकिक कर्म यदि कृष्ण-संबंध के बिना किए जाएँ तो नश्वर, सीमित और दोष-विघ्नों से ग्रस्त होते हैं; परन्तु कृष्ण-प्रीति के लिए किए गए कर्म प्रभाव में ‘निर्गुण’ होकर महान और अक्षय फल देते हैं, तथा भगवान की शक्ति से विघ्न शांत हो जाते हैं। अंत में एक इतिहासनुमा प्रसंग आता है—नारद का बदरीआश्रम में नरा-नारायण के पास जाना, उनके सूक्ष्म नित्यकर्म देखकर विस्मित होना और प्रश्न करना, जिससे आगे का संवाद आरम्भ होता है।
No shlokas available for this adhyaya yet.