Adhyaya 9
Mahesvara KhandaKedara KhandaAdhyaya 9

Adhyaya 9

इस अध्याय में लोमश स्वर्गसभा का वर्णन करते हैं, जहाँ इन्द्र लोकपालों, देवों, ऋषियों, अप्सराओं और गन्धर्वों से घिरे हैं। तभी देवगुरु बृहस्पति आते हैं, परन्तु राजमद और अहंकार से ग्रस्त इन्द्र उन्हें न आमंत्रण देते हैं, न आसन, न उचित विदाई। इसे गुरु-अवज्ञा मानकर बृहस्पति तिरोहित हो जाते हैं और देवगण शोकाकुल हो उठते हैं। नारद बताते हैं कि गुरु का तिरस्कार होते ही इन्द्र का ऐश्वर्य ढलने लगता है; इन्द्र बृहस्पति को खोजते हैं, तारा से पूछते हैं, पर वह उनका स्थान नहीं बताती। इसी बीच अशुभ संकेतों के साथ पाताल से बलि दैत्यों सहित चढ़ आता है; देव पराजित होते हैं और अनेक रत्न-सम्पदाएँ समुद्र में जा गिरती हैं। बलि शुक्राचार्य से परामर्श करता है; वे सुर-राज्य प्राप्ति हेतु कठोर यज्ञ-नियम, विशेषतः अश्वमेध, का संकेत देते हैं। उधर असहाय इन्द्र ब्रह्मा की शरण लेते हैं और देवों सहित क्षीरसागर तट पर विष्णु के पास जाते हैं। विष्णु इस संकट को इन्द्र की गुरु-अवज्ञा का तात्कालिक कर्मफल बताते हैं और दैत्यों से सन्धि करने की नीति देते हैं। इन्द्र सुतल में बलि के पास शरणागत होकर जाते हैं; नारद शरणागत-पालन को महान धर्म बताते हैं, और बलि इन्द्र का सत्कार कर संधि स्थापित करता है। फिर समुद्र में गिरे रत्नों की पुनर्प्राप्ति हेतु क्षीरसागर-मन्थन का निश्चय होता है—मन्दराचल मथनी और वासुकि रस्सी बनते हैं। आरम्भ में पर्वत डूबकर विफलता और पीड़ा होती है; तब विष्णु मन्दर को उठाकर स्थापित करते हैं, कूर्म रूप धारण कर आधार बनते हैं और मन्थन को संभालते हैं। मन्थन तीव्र होने पर भयंकर हालाहल/कालकूट विष निकलता है, जो तीनों लोकों को ग्रसने लगता है। नारद तत्काल शिव को परम शरण मानकर उनकी ओर जाने का आग्रह करते हैं, पर सुर-असुर मोहवश प्रयत्न में लगे रहते हैं। विष का विस्तार इतना बताया गया है कि वह ब्रह्मलोक और वैकुण्ठ तक पहुँचता-सा प्रतीत होता है; शिव-कोप से प्रलय-सदृश स्थिति का चित्र खींचकर आगे शिव के उद्धारक हस्तक्षेप की आवश्यकता स्थापित की जाती है।

Shlokas

Verse 1

लोमश उवाच । एकदा तु सभामध्य आस्थितो देवराट् स्वयम् । लोकपालैः परिवृतो देवैश्च ऋषिभिस्तथा

लोमश बोले—एक बार देवों के राजा स्वयं सभा के मध्य विराजमान थे; दिक्पालों, देवताओं और ऋषियों से घिरे हुए।

Verse 2

अप्सरोगणसंवीतो गंधर्वैश्च पुरस्कृतः । उपगीयमानविजयः सिद्धविद्याधरैरपि

वे अप्सराओं के समूह से सेवित थे, गन्धर्वों द्वारा अग्रभाग में सम्मानित थे; सिद्ध और विद्याधर भी उनके विजय-यश का गान कर रहे थे।

Verse 3

तदा शिष्यैः परिवृतो देवराजगुरुः सुधीः । आगतोऽसौ महाभागो बृहस्पति रुदारधीः

तब शिष्यों से घिरे हुए, देव-राज के बुद्धिमान गुरु—महाभाग बृहस्पति—रुद्र-भक्ति में दृढ़ होकर वहाँ आए।

Verse 4

तं दृष्ट्वा सहसा देवाः प्रणेमुः समुपस्थिताः । इंद्रोपि ददृशे तत्र प्राप्तं वाचस्पतिं तदा

उन्हें देखकर वहाँ उपस्थित देवता तुरंत प्रणाम करने लगे; तब इन्द्र ने भी वाचस्पति (बृहस्पति) को वहाँ आया हुआ देखा।

Verse 5

नोवाच किंचिद्दुर्मेधावचो मानुपुरःसरम् । नाह्वानं नासनं तस्य न विसर्जनमेव च

परंतु वह दुर्मति एक भी मधुर स्वागत-वचन न बोला; न उसने बुलाया, न आसन दिया, और न ही उचित विदाई की।

Verse 6

शक्रं प्रमत्तं ज्ञात्वाथ मदाद्राज्यस्य दुर्मतिम् । तिरोधानमनुप्राप्तो बृहस्पती रुषान्वितः

शक्र को प्रमत्त और राज्य-मद से दूषित बुद्धि वाला जानकर, क्रोध से भरे बृहस्पति तिरोभाव में चले गए।

Verse 7

गते देवगुरौ तस्मिन्विमनस्काऽभवन्सुराः । यक्षा नागाः सगंधर्वा ऋषयोऽपि तथा द्विजाः

देवगुरु के चले जाने पर देवता उदास हो गए; यक्ष, नाग, गंधर्व तथा ऋषि और द्विज भी वैसे ही व्याकुल हुए।

Verse 8

गांधर्वस्या वसाने तु लब्धसंज्ञो हरिः सुरान् । पप्रच्छ त्वरितेनवै क्व गतो हि महातपाः

गंधर्व-गान के समाप्त होते ही हरि (इन्द्र) को होश आया और उसने शीघ्र देवों से पूछा—“वह महातपस्वी कहाँ गया?”

Verse 9

तदैव नारदेनोक्तः शक्रो देवाधिपस्तथा । त्वया कृता ह्यवज्ञा च गुरोर्नस्त्यत्र संशयः

तभी नारद ने देवाधिप शक्र से कहा—“तुमने गुरु का अपमान किया है; इसमें कोई संशय नहीं।”

Verse 10

गुरोरवज्ञया राज्यं गतं ते बलसूदन । तस्मात्क्षमापनीयोऽसौ सर्वभावेन हि त्वया

हे बलसूदन! गुरु की अवज्ञा से तुम्हारा राज्य हाथ से निकल गया; इसलिए सम्पूर्ण भाव से तुम्हें उनसे क्षमा याचना करनी चाहिए।

Verse 11

एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य नारदस्य महात्मनः । आसनात्सहसोत्थाय तैः सर्वैः परिवारितः । आगच्छत्त्वरया शक्रो गुरोर्गेहमतंद्रितः

महात्मा नारद के ये वचन सुनकर शक्र तुरंत आसन से उठ खड़ा हुआ। अपने समस्त पार्षदों से घिरा हुआ वह बिना विलंब के वेग से गुरु के गृह की ओर चला गया।

Verse 12

पृष्ट्वा तारां प्रणम्यादौ क्व गतो हि महातपाः । न जानामीत्युवाचेदं तारा शक्रं निरीक्षती

पहले तारा को प्रणाम करके शक्र ने पूछा— “वह महातपस्वी कहाँ गए?” तारा ने शक्र की ओर देखकर कहा— “मैं नहीं जानती।”

Verse 13

तदा चिंतान्वितो भूत्वा शक्रः स्वगृहमाव्रजत् । एतस्मिन्नंतरे स्वर्गे ह्यनिष्टान्द्भुतानि च

तब शक्र चिंता से भरकर अपने भवन को लौट आया। इसी बीच स्वर्ग में अशुभ और अप्रिय अद्भुत लक्षण प्रकट होने लगे।

Verse 14

अभवन्सर्वदुःखार्थे शक्रस्य च महात्मनः । पातालस्थेन बलिना ज्ञातं शक्रस्य चेष्टितम्

वे अपशकुन महात्मा शक्र के लिए सर्वथा दुःख का कारण बने। पाताल में स्थित बलि ने भी शक्र की चेष्टाओं को जान लिया।

Verse 15

ययौ दैत्यैः परिवृतः पातालादमरावतीम् । तदा युद्धमतीवासीद्देवानां दानवैः सह

वह दैत्यों से घिरा हुआ पाताल से अमरावती की ओर चला। तब देवों और दानवों के बीच अत्यंत भयंकर युद्ध छिड़ गया।

Verse 16

देवाः पराजिता दैत्यै राज्यं शक्रस्य तत्क्षणात् । संप्राप्तं सकलं तस्य मूढस्य च दुरात्मनः

देव दैत्यों से पराजित हुए; उसी क्षण शक्र (इन्द्र) का समस्त राज्य उस मोहित दुरात्मा के अधिकार में चला गया।

Verse 17

नीतं सर्वप्रयत्नेन पातालं त्वरितं गताः । शुक्रप्रसादात्ते सर्वे तथा विजयिनोऽभवन्

सर्व प्रयत्न से उसे ले जाकर वे शीघ्र पाताल लौट गए; शुक्राचार्य की कृपा से वे सब निश्चय ही विजयी हुए।

Verse 18

शक्रोऽपि निःश्रिको जातो देवैस्त्यक्तस्ततो भृशम् । देवी तिरोधानगता बभूव कमलेक्षणा

शक्र भी श्रीहीन हो गया, देवों द्वारा अत्यन्त त्याग दिया गया; कमल-नेत्री देवी श्री उससे तिरोहित होकर अदृश्य हो गई।

Verse 19

ऐरावतो महानागस्तथैवोच्चैःश्रवा हयः । एवमादीनि रत्नानि अनेकानि बहून्यपि । नीतानि सहसा दैत्यैर्लोभादसाधुवृत्तिभिः

ऐरावत महान गज और उच्चैःश्रवा दिव्य अश्व—ऐसे ही अनेक बहुमूल्य रत्न—लोभ से प्रेरित असाधु-वृत्ति दैत्यों ने सहसा हर लिए।

Verse 20

पुण्यभांजि च तान्येव पतितानि च सागरे । तदा स विस्मयाविष्टो बलिराह गुरुं प्रति

वे ही पुण्य-प्रद रत्न तब समुद्र में गिर पड़े; तब विस्मय से आविष्ट बलि ने अपने गुरु से कहा।

Verse 21

देवान्निर्जित्य चास्माभिरानीतानि बहूनि च । रत्नानि तु समुद्रेऽथ पतितानि तदद्भुतम्

देवताओं को जीतकर हम बहुत-से रत्न-खजाने ले आए थे; पर वे रत्न अब समुद्र में गिर पड़े—यह कितना अद्भुत है!

Verse 22

बलेस्तद्वचनं श्रुत्वा उशना प्रत्युवाच तम् । अश्वमेधशतेनैव सुरराज्यं भविष्यति । दीक्षितस्य न संदेहस्तस्माद्भोक्त स एव च

बलि के वचन सुनकर उशना (शुक्राचार्य) ने कहा—‘सौ अश्वमेध यज्ञ करने से ही देव-राज्य अवश्य प्राप्त होगा। जो विधिवत् दीक्षित है, उसके लिए संदेह नहीं; इसलिए वही उसका भोग करेगा।’

Verse 23

अश्वमेधं विना किंचित्स्वर्गं भोक्तं न पार्यते

अश्वमेध यज्ञ के बिना स्वर्ग का किंचित् भी भोग या प्राप्ति संभव नहीं।

Verse 24

गुरोर्वचनमाज्ञाय तूष्णींभूतो बलिस्ततः । बभूव देवैः सार्द्धं च यथोचितमकारयत्

गुरु की आज्ञा समझकर बलि मौन हो गया; फिर देवताओं के साथ मिलकर उसने जो उचित था, उसे विधिपूर्वक करवाया।

Verse 25

इन्द्रोपि शोच्यतां प्राप्तो जगाम परमेष्ठिनम् । विज्ञापयामास तथा सर्वं राज्यभयादिकम्

इन्द्र भी दयनीय दशा को प्राप्त होकर परमेष्ठी (ब्रह्मा) के पास गया और राज्य-भय आदि सब कुछ यथावत् निवेदित किया।

Verse 26

शक्रस्य वचनं श्रुत्वा परमेष्ठी उवाच ह

शक्र के वचन सुनकर परमेष्ठी ने तब कहा।

Verse 27

संमिलित्वा सुरान्सर्वांस्त्वया साकं त्वरान्विताः । आराधनार्थं गच्छामो विष्णुं सर्वेश्वरेश्वरम्

सब देवताओं को एकत्र करके, और तुम्हारे साथ शीघ्र ही, हम आराधना हेतु विष्णु—सब ईश्वरों के ईश्वर—के पास चलें।

Verse 28

तथेति गत्वा ते सर्वे शक्राद्या लोकपालकाः । ब्रह्माणं च पुरस्कृत्य तटं क्षीरार्णवस्य च । प्राप्योपविश्य ते सर्वे हरिं स्तोतुं प्रचक्रमुः

‘तथास्तु’ कहकर शक्र आदि सभी लोकपाल चले। ब्रह्मा को अग्र में रखकर वे क्षीरसागर के तट पर पहुँचे; वहाँ बैठकर सबने हरि की स्तुति आरम्भ की।

Verse 29

ब्रह्मोवाच । देवदेव जगान्नाथ सुरासुरनमस्कृत । पुण्यश्लोकाव्ययानंत परमात्मन्नमोऽस्तु ते

ब्रह्मा बोले—हे देवों के देव, जगन्नाथ, देव-दानवों से नमस्कृत! हे पुण्यश्लोकों से स्तुत, अव्यय, अनन्त परमात्मन्! आपको नमस्कार है।

Verse 30

यज्ञोऽसि यज्ञरूपोऽसि यज्ञांगोऽसि रमापते । ततोऽद्य कृपया विष्णो देवानां वरदो भव

आप ही यज्ञ हैं, आप ही यज्ञस्वरूप हैं, हे रमापति, आप ही यज्ञ के अंग हैं। इसलिए आज, हे विष्णु, कृपा करके देवों को वर देने वाले बनिए।

Verse 31

गुरोरवज्ञया चाद्य भ्रष्टराज्यः शतक्रतुः । जातः सुरर्षिभिः साकं तस्मादेनं समुद्धर

गुरु की अवज्ञा से आज शतक्रतु (इन्द्र) देवर्षियों सहित अपने राज्य से गिर पड़ा है; इसलिए इसे इस पतन से उठाइए।

Verse 32

श्रीभगवानुवाच । दुकोकलज्ञया सर्वं नस्यतीति किमद्भुतम् । ये पापिनो ह्यधर्मिष्ठाः केवलं विषयात्मकाः । पितरौ निंदितौ यैश्च निर्दैवात्वेन संशयः

श्रीभगवान बोले—दुष्कर्मों के विपाक से सब कुछ नष्ट हो जाए, इसमें आश्चर्य ही क्या? जो पापी, अत्यन्त अधर्मी, केवल विषयों में आसक्त हैं और जो माता-पिता की भी निन्दा करते हैं, वे दैव-व्यवस्था के अस्तित्व में संदेह कर बैठते हैं।

Verse 33

अनेन यत्कृतं ब्रह्मन्सद्यस्तत्फलमागतम् । कर्मणा चास्य शक्रस्य सर्वेषां संकटागमः

हे ब्रह्मन्, इसने जो किया उसका फल तत्काल आ पहुँचा है। शक्र (इन्द्र) के इस कर्म से सब पर संकट आ गया है।

Verse 34

विपरीतो यदा कालः पुरुषस्य भवेत्तदा । भूतमैत्रीं प्रकुर्वंति सर्वकार्यार्थसिद्धये

जब किसी पुरुष का काल विपरीत हो जाता है, तब हर कार्य-सिद्धि के लिए लोग पूर्व शत्रुओं से भी मित्रता कर लेते हैं।

Verse 35

तेन वै कारणेनेंद्र मदीयं वचनं कुरु । कार्यहेतोस्त्वया कार्यो दैत्यैः सह समागमः

इसी कारण, हे इन्द्र, मेरे वचन का पालन करो। कार्य-सिद्धि के लिए तुम्हें दैत्यों के साथ मिलन और संधि करनी होगी।

Verse 36

एवं भगवतादिष्टः शक्रः परमबुद्धिमान् । अमरावतीं ययौ हित्वा सुतलं दैवतैः सह

भगवान् के आदेश से परम बुद्धिमान् शक्र (इन्द्र) देवताओं सहित सुतल को छोड़कर अमरावती को चले गए।

Verse 37

इन्द्रं समागतं श्रुत्वा इंद्रसेनो रुषान्वितः । बभूव सह सैन्येन हंतुकामः पुरंदरम्

इन्द्र के आगमन का समाचार सुनकर इन्द्रसेन क्रोध से भर उठा और सेना सहित पुरंदर (इन्द्र) का वध करने को उद्यत हुआ।

Verse 38

नारदेन तदा दैत्या बलिश्च बलिनां वरः । निवारितस्तद्वधाच्च वाक्यैरुच्चावचैस्तथा

तब नारद ने दैत्यों को और बलवानों में श्रेष्ठ बलि को, अवसरानुकूल ऊँचे-नीचे अनेक वचनों से, उसके वध से रोक दिया।

Verse 39

ऋषेस्तस्यैव वचनात्त्यक्तमन्युर्बलिस्तदा । बभूव सह सैन्येन आगतो हि शतक्रतुः

उसी ऋषि के वचन से बलि ने तब अपना क्रोध त्याग दिया; और सचमुच शतक्रतु (इन्द्र) सेना सहित वहाँ आ पहुँचे।

Verse 40

इन्द्रसेनेन दृष्टोऽसौ लोकपालैः समावृतः । उवाच त्वरया युक्तः प्रहसन्निव दैत्यराट्

इन्द्र की सेना ने उसे देखा; वह लोकपालों से घिरा था। तब दैत्यराज (बलि) शीघ्रता से, मानो मुस्कराते हुए, बोला।

Verse 41

कस्मादिहागतः शक्र सुतलं प्रति कथ्यताम् । तस्यैतद्वचनं श्रुत्वा स्मयमान उवाचतम्

हे शक्र! तुम यहाँ किस कारण से आए हो? सुतल की ओर जाने का प्रयोजन बताओ। यह वचन सुनकर इन्द्र ने हल्की मुस्कान के साथ उत्तर दिया।

Verse 42

वयं कश्यपदायादा यूयं सर्वे तथैव च । यथा वयं तथा यूयं विग्रहो हि निरर्थकः

हम कश्यप के वंशज हैं और तुम सब भी वैसे ही हो। जैसे हम हैं वैसे ही तुम हो; इसलिए हमारे बीच वैर वास्तव में निरर्थक है।

Verse 43

मम राज्यं क्षणेनैव नीतं दैववशात्तवया । तथा ह्येतानि तान्येन रत्नानि सुबहून्यपि । गतानि तत्क्षणादेव यत्नानीतानि वै त्वया

दैववश तुमने क्षणभर में मेरा राज्य छीन लिया। वैसे ही अनेक बहुमूल्य रत्न भी, जिन्हें बड़े यत्न से संचित किया गया था, उसी क्षण तुमने उठा लिए।

Verse 44

तस्माद्विमर्शः कर्तव्यः पुरुषेण विपश्चिता । विमर्शज्जायते ज्ञानं ज्ञानान्मोक्षो भविष्यति

इसलिए विवेकी पुरुष को आत्मचिन्तन करना चाहिए। चिन्तन से ज्ञान उत्पन्न होता है और ज्ञान से मोक्ष प्राप्त होता है।

Verse 45

किं तु मे बत उक्तेन जाने न च तवाग्रतः । शरणार्थी ह्यहं प्राप्तः सुरैः सह तवांतिकम्

परन्तु हाय! मेरे कहने से क्या होगा? तुम्हारे सामने मैं क्या करूँ, यह नहीं जानता। मैं देवताओं सहित शरण की इच्छा से तुम्हारे पास आया हूँ।

Verse 46

एतच्छ्रुत्वा तु शक्रस्य वाक्यं वाक्यविदां वरः । प्रहस्योवाच मतिमाञ्छक्रं प्रति विदां वरः

शक्र के वचन सुनकर वाक्य-विद्या में श्रेष्ठ, बुद्धिमान् पुरुष ने मंद हास्य किया और शक्र से प्रत्युत्तर में कहा।

Verse 47

त्वमागतोसि देवेंद्र किमर्थं तन्न वेद्मयहम्

हे देवेंद्र! आप आए हैं; पर किस प्रयोजन से—यह मैं नहीं जानता।

Verse 48

शक्रस्तद्वचनं श्रुत्वा ह्यश्रुपूर्णाकुलेक्षणः । किंचिन्नोवाच तत्रैनं नारदो वाक्यमब्रवीत्

वे वचन सुनकर शक्र की आँखें आँसुओं से भरकर व्याकुल हो गईं। वह कुछ भी न बोला; तब नारद ने उसे संबोधित करके कहा।

Verse 49

बले त्वं किं न जानासि कार्याकार्यविचारणाम् । धर्मो हि महतामेष शरणागतपालनम्

हे बलि! क्या तुम कार्य और अकार्य का विचार नहीं जानते? महान् जनों का यही धर्म है—शरणागत की रक्षा करना।

Verse 50

शरणागतं च विप्रं च रोगिणं वृद्धमेव च । यएतान्न च रक्षंति ते वै ब्रह्महणो नराः

शरणागत, ब्राह्मण, रोगी और वृद्ध—जो इनकी रक्षा नहीं करते, वे मनुष्य निश्चय ही ब्रह्महन्ता कहे जाते हैं।

Verse 51

शरणागतशब्देन आगतस्तव सन्निधौ । संरक्षणाय योग्यश्च त्वया नास्त्यत्र संशयः । एवमुक्तो नारदेन तदा दैत्यपतिः स्वयम्

‘शरणागत’ शब्द से ही वह आपकी शरण में आया है। वह आपके द्वारा रक्षित होने योग्य है—इसमें कोई संदेह नहीं।’ नारद के ऐसा कहने पर तब दैत्यों के स्वामी बलि स्वयं…

Verse 52

विमृश्य परया बुद्ध्या कार्याकार्यविचारणाम् । शक्रं प्रपूजयामास बहुमानपुरःसरम् । लोकपालैः समेतं च तथा सुरगणैः सह

तीक्ष्ण बुद्धि से क्या करना चाहिए और क्या नहीं—यह विचार कर उसने बड़े सम्मान सहित शक्र (इन्द्र) का पूजन-सत्कार किया। शक्र लोकपालों तथा देवगणों के साथ उपस्थित थे।

Verse 53

प्रत्ययार्थं च सत्त्वानि ह्यनेकानि व्रतानि वै । बलिप्रत्ययभूतानि स चकारः पुरंदरः

और विश्वास व प्रमाण के लिए पुरंदर (इन्द्र) ने अनेक सत्यनिष्ठ व्रत और प्रतिज्ञाएँ कीं, जो बलि के लिए आश्वासन-रूप थीं।

Verse 54

एवं स समयं कृत्वा शक्रः स्वार्थपरायणः । बलिना सह चावासीदर्थशास्त्रपरो महान्

इस प्रकार संधि करके, अपने प्रयोजन में तत्पर शक्र (इन्द्र) बलि के साथ रहने लगा—वह महान् बलि नीति-शास्त्र में निपुण था।

Verse 55

एवं निवसतस्तस्य सुतलेऽपि शतक्रतोः । वत्सरा बहवो ह्यासंस्तदा बुद्धिमकल्पयत् । संस्मृत्य वचनं विष्णोर्विमृश्य च पुनःपुनः

इस प्रकार सुतल में भी रहते हुए शतक्रतु (इन्द्र) के अनेक वर्ष बीत गए। तब उसने एक उपाय सोचा—विष्णु के वचन को स्मरण कर, उसे बार-बार मन में विचारते हुए।

Verse 56

एकदा तु सभामध्य आसीनो देवराट्स्वयम् । उवाच प्रहसन्वाक्यं बलिमुद्दिश्य नीतिमान्

एक बार सभा के मध्य स्वयं देवों के राजा इन्द्र बैठे थे। नीति-निपुण होकर वे मुस्कराते हुए बलि को लक्ष्य करके वचन बोले।

Verse 57

प्राप्तव्यानि त्वया वीर अस्माकं च त्वया बले । गजादीनि बहून्येव रत्नानि विविधानि च

हे वीर बलि! तुम्हारे द्वारा और हमारे द्वारा भी बहुत-सी वस्तुएँ प्राप्त की जा सकती हैं—अनेक हाथी आदि तथा नाना प्रकार के रत्न।

Verse 58

गतानि तत्क्षणादेव सागरे पतितानि वै । प्रयत्नो हि प्रकर्तव्यो ह्यस्माभिस्त्वयान्वितैः

वे उसी क्षण चले गए और सचमुच सागर में गिर पड़े। इसलिए तुम्हारे साथ मिलकर हमें अवश्य प्रयत्न करना चाहिए।

Verse 59

तेषां चोद्धरणे दैत्य रत्नानामिह सागरात् । तर्हि निर्मथनं कार्यं भवता कार्यसिद्धये

हे दैत्य! यदि उन रत्नों को यहाँ सागर से निकालना है, तो कार्यसिद्धि के लिए तुम्हें अवश्य मंथन करना चाहिए।

Verse 60

बलिः प्रवर्तितस्तेन शक्रेण सुरसूदनः । उवाच शक्रं त्वरितः केनेदं मथनं भवेत्

शक्र इन्द्र द्वारा प्रेरित होकर, देवों का संहारक बलि शीघ्र ही शक्र से बोला—“यह मंथन किस उपाय से होगा?”

Verse 61

तदा नभोगता वाणी मेघगंभीरनिःस्वना । उवाच देवा दैत्याश्च मंथध्वं क्षीरसागरम्

तब आकाश में मेघ-गर्जन-सी गंभीर वाणी गूँजी— “हे देवो और दैत्यों, क्षीरसागर का मंथन करो!”

Verse 62

भवतां बलवृद्धिश्च भविष्यति न संशयः

तुम्हारी शक्ति में वृद्धि होगी— इसमें कोई संदेह नहीं।

Verse 63

मंदरं चैव मंथानं रज्जुं कुरुत वासुकिम् । पश्चाद्देवाश्च दैत्याश्च मेलयित्वा विमथ्यताम्

मंदर पर्वत को मंथन-दंड बनाओ और वासुकि को रस्सी बनाओ। फिर देव और दैत्य मिलकर, एक साथ होकर, मंथन करें।

Verse 64

नभोगतां च तां वाणीं निशम्याथ तदाःसुराः । दैत्यैः सार्द्धं ततः सर्व उद्यमं चक्रुरुद्यताः

उस आकाशस्थ वाणी को सुनकर, तब असुर दैत्यों के साथ— सबके सब तत्पर होकर— उस कार्य में जुट गए।

Verse 65

पातालान्निर्गताः सर्वे तदा तेऽथ सुरासुराः । आजग्मुरतुलं सर्वे मंदरं पर्वतोत्तमम्

तब वे सब देव और असुर पाताल से निकलकर, साथ-साथ, अतुलनीय मंदर— उस श्रेष्ठ पर्वत— के पास पहुँचे।

Verse 66

दैत्याश्च कोटिसंख्याकास्तथा देवा न संशयः । उद्युक्ताः सहसा प्राऽयुर्मंदरं कनकप्रभम्

कोटि-कोटि दैत्य और वैसे ही देवगण—निःसंदेह—तत्क्षण पूर्णतः उद्यत होकर स्वर्ण-प्रभा से दीप्त मन्दर पर्वत की ओर बढ़ चले।

Verse 67

सरत्नं वर्तुलाकारं स्थूलं चैव महाप्रभम् । अनेकरत्नसंवीतं नानाद्रुमनिषेवितम्

वह रत्नों से जटित, वर्तुलाकार, विशाल और अत्यन्त तेजस्वी था; नाना प्रकार के रत्नों से अलंकृत और विविध वृक्षों से सेवित था।

Verse 68

चंदनैः पारिजातैश्च नागपुन्नागचंपकैः । नानामृगगणाकीर्णं सिंहशार्दूलसेवितम्

वह चन्दन और पारिजात, नाग, पुन्नाग तथा चम्पक के पुष्पों से सुशोभित था; नाना मृग-समूहों से परिपूर्ण और सिंह तथा व्याघ्रों द्वारा सेवित था।

Verse 69

महाशैलं दृष्ट्वा ते सुरसत्तमाः । ऊचुः प्रांजलयः सर्वे तदा ते सुरसत्तमाः

उस महान् पर्वत को देखकर वे देवश्रेष्ठ, सबके सब हाथ जोड़कर, तब उस देवश्रेष्ठ पर्वत से बोले।

Verse 70

देवा ऊचुः । अद्रे सुरा वयं सर्वे विज्ञप्तुमिह चागताः । तच्छृणुष्व महाशैल परेषामुपकारकः

देव बोले—हे अद्रे! हम सब देवगण यहाँ निवेदन करने आए हैं। हे महाशैल, दूसरों के उपकारक! हमारी बात सुनो।

Verse 71

एवमुक्तस्तदा शैलो दवैर्दैत्यैः स मंदरः । उवाच निःसृतो भूत्वा परं विग्रहवान्वचः

देवों और दैत्यों द्वारा ऐसा कहे जाने पर वह मंदर पर्वत तब प्रकट हुआ और मानो साकार होकर अत्यन्त प्रभावशाली वचन बोला।

Verse 72

तेन रूपेण रूपी स पर्वतो मंदराचलः । किमर्थमागताः सर्वे मत्समीपं तदुच्यताम्

उस रूप को धारण कर साकार मंदराचल पर्वत बोला—“तुम सब मेरे समीप किस प्रयोजन से आए हो? वह कहा जाए।”

Verse 73

तदा बलिरुवाचेदं प्रस्तावसदृशं वचः । इंद्रोपि त्वरया युक्तो बभाषे सूनृतं वचः

तब बलि ने अवसर के अनुरूप वचन कहा; और इन्द्र ने भी शीघ्रता से प्रेरित होकर सत्य और मधुर वाणी में उत्तर दिया।

Verse 74

अस्माभिः सह कार्यार्थे भव त्वं मंदराचल । अमृतोत्पादनार्थे त्वं मंथानं भव सुव्रत

“हे मंदराचल! इस कार्य की सिद्धि के लिए हमारे साथ रहो। अमृत-उत्पादन हेतु तुम मंथन-दण्ड बनो, हे सुव्रत!”

Verse 75

तथेति मत्वा तद्वाक्यं देवानां कार्यसिद्धये । ऊचे देवासुरांश्चेदमिन्द्रं प्रति विशेषतः

“तथास्तु” ऐसा मानकर, देवों के कार्य की सिद्धि हेतु उसने देवों और असुरों से ये वचन कहे—विशेषतः इन्द्र से।

Verse 76

छेदितौ च त्वया पक्षौ वज्रेण शतपर्वणा । गंतुं कथं समर्थोऽहं भवतां कार्यसिद्धये

हे देव! तुम्हारे शतपर्व वज्र से मेरे दोनों पंख कट गए हैं; फिर तुम्हारे कार्य की सिद्धि के लिए मैं कैसे जा सकूँ?

Verse 77

तदा देवासुराः सर्वे स्तूयमाना महाचलम् । उत्पाटयेयुरतुलं मंदरं च ततोद्भुतम्

तब सभी देव और असुर उस महापर्वत की स्तुति करते हुए, अतुल और अद्भुत मंदराचल को उखाड़ ले गए।

Verse 78

क्षीरार्णवं नेतुकामा ह्यशक्तास्ते ततोऽभवन् । पर्वतः पतितः सद्यो देवदैत्योपरि ध्रुवम्

क्षीरसागर तक ले जाने की इच्छा रखते हुए भी वे असमर्थ हो गए; और वह पर्वत तुरंत ही निश्चय ही देवों और दैत्यों पर गिर पड़ा।

Verse 79

केचिद्भग्ना मृताः केचित्केचिन्मूर्छापरा भवन् । परीवादरताः केचित्केचित्क्लेशत्वमागताः

कुछ कुचले जाकर टूट गए, कुछ तो मर भी गए; कुछ गहरी मूर्छा में पड़ गए। कुछ निंदा-परिवाद में लग गए और कुछ घोर क्लेश में डूब गए।

Verse 80

ेवं भग्नोद्यमा जाता असुराःसुरदानवाः । चेतनां परमां प्राप्तास्तुष्टुवुर्जगदीश्वरम्

इस प्रकार उनके प्रयत्न टूट गए; असुर, सुर और दानव चेतना में लौट आए। परम प्रबोध पाकर उन्होंने जगदीश्वर की स्तुति की।

Verse 81

रक्षरक्ष महाविष्णो शरणागतवत्सल । त्वया ततमिदं सर्वं जंगमाजंगमं च यत्

हे महाविष्णु, हे शरणागतवत्सल! हमारी रक्षा करो, रक्षा करो। तुम्हीं से यह समस्त जगत्—चर और अचर—व्याप्त है।

Verse 82

देवानां कार्यसिद्ध्यर्थं प्रादुर्भूतो हरिस्तदा । तान्दृष्ट्वा सहसा विष्णुर्गरुडोपरि संस्थितः

देवताओं के कार्य की सिद्धि के लिए तब हरि प्रकट हुए। उन्हें देखकर विष्णु तुरंत गरुड़ पर आरूढ़ होकर प्रकट हो गए।

Verse 83

लीलया पर्वतश्रेष्ठमुत्तभ्यारोपयत्क्षणात् । गरुत्मति तदा देवः सर्वेषामभयं ददौ

लीला से उन्होंने क्षणभर में श्रेष्ठ पर्वत को उठाकर गरुड़ पर रख दिया; तब उस देव ने सबको अभय प्रदान किया।

Verse 84

तत उत्थाय तान्देवान्क्षीरोस्योत्तरं तटम् । नीत्वा तं पर्वतं वृद्धं निक्षिप्याप्सु ततो ययौ

फिर उठकर वे उन देवों को क्षीरसागर के उत्तरी तट पर ले गए; उस विशाल पर्वत को जल में रखकर वे वहाँ से चले गए।

Verse 85

तदा सर्वे सुरगणाः स्वागत्य असुरैः सह । वासुकिं च समादाय चक्रिरे समयंच तम्

तब सभी देवगण असुरों के साथ एकत्र हुए; वासुकि को लेकर उन्होंने आपस में वह संधि (समय) कर ली।

Verse 86

मंथानं मंदरं चैव वासुकिं रज्जुमेव च । कृत्वा सुराऽसुराः सर्वे ममंथुः श्रीरसागरम्

मंदराचल को मथनी और वासुकि को रस्सी बनाकर, सब देवता और असुर मिलकर श्रीक्षीरसागर का मंथन करने लगे।

Verse 87

क्षीराब्धेर्मथ्यमानस्य पर्वतो हि रसातलम् । गतः स तत्क्षणादेव कूर्मो भूत्वा रमापतिः । उद्धृतस्तत्क्षणादेव तदद्भुतमिवाभवत्

क्षीरसागर के मथने पर पर्वत तुरंत रसातल में धँस गया। उसी क्षण रमापति भगवान् कूर्म रूप धारण कर उसे तत्काल उठा लाए; वह घटना अद्भुत-सी प्रतीत हुई।

Verse 88

भ्राम्यमाणस्ततः शैलो नोदितः सुरदानवैः । भ्रममाणो निराधारो बोधश्चेव गुरुं विना

फिर देवों और दानवों के उकसाने से वह पर्वत घूमने लगा; आधार के बिना उसका घूमना वैसा था जैसे गुरु के बिना ज्ञान भ्रमित होकर डोलता है।

Verse 89

परमात्मा तदा विष्णुराधारो मंदरस्य च । दोर्भिश्चतुर्भिः संगृह्य ममंथाब्धिं सुखावहम्

तब परमात्मा विष्णु मंदर के आधार बने; अपने चार भुजाओं से उसे थामकर उन्होंने कल्याण और आनंद देने वाले क्षीरसागर का मंथन किया।

Verse 90

तदा सुरासुराः सर्वे ममंथुः क्षीरसागरम् । एकीभूत्वा बलेनैवमतिमात्रं बलोत्कटाः

तब सब देवता और असुर क्षीरसागर का मंथन करने लगे; बल के द्वारा एक होकर वे अत्यंत प्रबल पराक्रम वाले हो गए।

Verse 91

पृष्ठकंठोरुजान्वंतः कमठस्य महात्मनः । तथासौ पर्वतश्रेष्ठो वज्रसारमयो दृढः । उभयोर्घर्षणादेव वडवाग्निः समुत्थितः

महात्मा कच्छप की पीठ, कंठ, जंघाओं और घुटनों पर वह पर्वतश्रेष्ठ—वज्रसार और अति दृढ़—घिसता रहा; उन दोनों के घर्षण से ही समुद्र में वडवाग्नि प्रकट हुई।

Verse 92

हलाहलं च संजातं तदॄष्ट्वा नारदेन हि । ततो देवानुवाचेदं देवर्षिरमितद्युतिः

हलाहल विष उत्पन्न हुआ—यह देखकर नारद ने; तब वह अमित तेज वाले देवर्षि ने देवताओं से यह वचन कहा।

Verse 93

न कार्यं मथनं चाब्धेर्भवद्भिरधुनाऽखिलैः । प्रार्थयध्वं शिवं देवाः सर्वे दक्षस्य याजनम् । तद्विस्मृतिं च वोयातं वीरभद्रेण यत्कृतम्

अब आप सबको समुद्र-मंथन नहीं करना चाहिए। हे देवो, दक्ष के यज्ञ का स्मरण करके शिव की प्रार्थना करो; वीरभद्र के कृत्य से जो विस्मृति तुम पर छा गई है, वह दूर हो जाए।

Verse 94

तस्माच्छिवः स्मर्यतां चाशु देवाः परः पराणामपि वा परश्च । परात्परः परमानंदरूपो योगिध्येयो निष्प्रपंचो ह्यरूपः

इसलिए, हे देवो, शीघ्र ही शिव का स्मरण करो—जो उच्च से भी उच्च, परे से भी परे; परात्पर, परम आनंदस्वरूप; योगियों के ध्येय, निष्प्रपंच और निराकार हैं।

Verse 95

ते मथ्यमानास्त्वरिता देवाः स्वात्मार्थसाधकाः । अभिलाषपराः सर्वे न श्रृण्वंति यतो जडाः

पर वे देवता मंथन में लगे हुए, शीघ्रता करते, अपने ही स्वार्थ की सिद्धि में तत्पर थे; सब कामना-परायण होकर जड़ हो गए, इसलिए सुनते नहीं थे।

Verse 96

उपदेशैश्च बहुभिर्नोपदेश्याः कदाचन । ते रागद्वेषसंघाताः सर्वे शिवपराङ्मुखाः

बहुत-से उपदेश देने पर भी वे कभी उपदेश ग्रहण न कर सके; क्योंकि वे राग-द्वेष के पुंज थे और सब शिव से विमुख थे।

Verse 97

केवलोद्यमसंवीता ममंथुः क्षीरसागरम् । अतिनिर्मथनाज्जातं क्षीराब्धेश्चहलाहलम्

केवल कठोर परिश्रम में लगे हुए उन्होंने क्षीरसागर का मंथन किया; और अत्यधिक मंथन से उसी दुग्ध-सागर से हलाहल विष उत्पन्न हुआ।

Verse 98

त्रैलोक्यदहने प्रौढं प्राप्तं हंतुं दिवौकसः । अत ऊर्ध्वं दिशः सर्वा व्याप्तं कृत्स्नं नभस्तलम् । ग्रसितुं सर्वभूतानां कालकूटं समभ्ययात्

त्रैलोक्य को दग्ध करने में समर्थ वह कालकूट विष देवताओं का नाश करने को बढ़ चला। ऊपर उठकर उसने सब दिशाओं को व्याप्त कर लिया, समस्त आकाश-मंडल को भर दिया, मानो समस्त प्राणियों को निगलने ही आया हो।

Verse 99

दृष्ट्वा बृहंतं स्वकरस्थमोजसा तं सर्पराजं सह पर्वतेन । तत्रैव हित्वापययुस्तदानीं पलायमाना ह्यसुरैः समेताः

अपने हाथ में बलपूर्वक पकड़े हुए उस महान सर्पराज को, पर्वत सहित देखकर, वे उसी क्षण उस स्थान को छोड़कर भाग खड़े हुए; और उनके साथ असुर भी पलायन करने लगे।

Verse 100

तथैव सर्व ऋषयो भृग्वाद्याः शतशाम्यति । दक्षस्य यजनं तेन यथा जातं तथाभवत्

उसी प्रकार भृगु आदि समस्त ऋषि सैकड़ों प्रकार से शांत हो गए; और इसलिए दक्ष का यज्ञ जैसा बन पड़ा था, वैसा ही (उसका फल) निश्चित हो गया।

Verse 101

सत्यलोकं गताः सर्वे भुगुणा नोदिता भृशम् । वेदवाक्यैश्च विविधैः कालकूटं शतशस्ततः । देवा नास्त्यत्र संदेहः सत्यं सत्यं वदामि वः

भृगु के द्वारा अत्यन्त प्रेरित होकर वे सब सत्यलोक गए। वहाँ विविध वेदवचनों से उन्होंने कालकूट विष को बार-बार शांत किया। हे देवो, इसमें कोई संदेह नहीं—मैं तुमसे सत्य-सत्य कहता हूँ।

Verse 102

भृगुणोक्तं वचः श्रुत्वा कालकूटविषार्द्दिताः । सत्यलोकं समासाद्य ब्रह्माणं शरणं ययुः

भृगु के वचन सुनकर, और कालकूट विष से पीड़ित होकर, वे सत्यलोक पहुँचे और ब्रह्मा की शरण में गए।

Verse 103

तदा जाज्वल्यमानं वै कालकूटं प्रभोज्जवलम् । दृष्ट्वा ब्रह्माथ तान्दृष्ट्वा ह्यकर्मज्ञानसुरासुरान् । तेषां शपितुमारेभे नारदेन निवारितः

तब ब्रह्मा ने प्रचण्ड तेज से दहकते हुए कालकूट को देखा; और कर्म में विवेकहीन उन देवों और असुरों को देखकर उन्हें शाप देने लगे, पर नारद ने उन्हें रोक दिया।

Verse 104

ब्रह्मोवाच । अकार्यं किं कृतं देवाः कस्मात्क्षोभोयमुद्यतः । ईश्वरस्य च जातोऽद्य नान्यथा मम भाषितम्

ब्रह्मा बोले—हे देवो, कौन-सा अनुचित कर्म किया गया है कि यह क्षोभ उठ खड़ा हुआ? यह विक्षोभ आज ईश्वर की ही आज्ञा से उत्पन्न हुआ है; मेरा कथन अन्यथा नहीं है।

Verse 105

ततो देवैः परिवृतो वेदोपनिषदैस्तथा । नानागमैः परिवृतः कालकूटभयाद्ययौ

तब वह देवों से घिरा हुआ, तथा वेद-उपनिषदों से भी आवृत—अनेक आगमों से परिवेष्टित—कालकूट के भय से आगे बढ़ा।

Verse 106

ततश्चिंतान्विता देवा इदमूचुः परस्परम् । अविद्याकामसंवीताः कुर्यामः शंकरं च कम्

तब चिंता से व्याकुल देव परस्पर कहने लगे—“अविद्या और काम से आच्छन्न होकर हम क्या करें, और किसे अपना शंकर (रक्षक) बनाएं?”

Verse 107

ब्रह्माणं च पुरस्कृत्य तदा देवास्त्वरान्विताः । वैकुण्ठमाव्रजन्सर्वे कालकूट भयार्द्दिताः

तब ब्रह्मा को अग्रणी बनाकर, कालकूट के भय से पीड़ित सभी देव शीघ्रता से वैकुण्ठ को गए।

Verse 108

ब्रह्मादयश्चर्षिगणाश्च तदा परेशं विष्णुं पुराणपुरुषं प्रभविष्णुमीशम् । वैकुण्ठमाश्रितमधोक्षजमाधवं ते सर्वे सुरासुरगणाः शरणं प्रयाताः

तब ब्रह्मा आदि और ऋषिगण, तथा देव-दानवों की समस्त सेनाएँ—वैकुण्ठ में स्थित परमेश्वर विष्णु, आदिपुरुष, सर्वशक्तिमान ईश्वर, अधोक्षज माधव—की शरण में पहुँचे।

Verse 109

तावत्प्रवृद्धं सुमहत्कालकूटं समभ्ययात् । दग्ध्वादो ब्रह्मणो लोकं वैकुण्ठं च ददाह वै

उसी समय अत्यन्त प्रबल और विशाल कालकूट उमड़ पड़ा; उसने पहले ब्रह्मलोक को जलाया और फिर वैकुण्ठ को भी दग्ध कर दिया।

Verse 110

कालकूटाग्निना दग्धो विष्णुः सर्वगुहाशयः । पार्षदैः सहितः सद्यस्तमालसदृशच्छविः

कालकूट की अग्नि से दग्ध होकर, सर्वहृदय-गुहाओं में निवास करने वाले विष्णु अपने पार्षदों सहित तत्काल तमाल-वृक्ष के समान श्यामवर्ण हो गए।

Verse 111

वैकुण्ठं च सुनीलं च सर्वलोकैः समावृतम् । जलकल्मषसंवीताः सर्वे लोकास्तदाभवन्

वैकुण्ठ भी गहरे नील वर्ण का हो गया और समस्त लोकों से चारों ओर घिर गया। तब सभी लोक अद्भुत जल-कल्मष, मानो मलीन तरंगित जल, से आच्छादित हो गए।

Verse 112

अष्टावरणसंवीतं ब्रह्मांडं ब्रह्मणा सह । भस्मीभूतं चकाराशु जलकल्मषमद्भुतम्

आठ आवरणों से घिरा हुआ ब्रह्माण्ड, ब्रह्मा सहित, उस अद्भुत जल-कल्मष द्वारा शीघ्र ही भस्म कर दिया गया।

Verse 113

नोभूमिर्न जलं चाग्निर्न वायुर्न नभस्तदा । नाहंकारो न च महान्मूलाविद्या तथैव च । शिवस्य कोपात्संजातं तदा भस्माकुलं जगत्

तब न पृथ्वी रही, न जल, न अग्नि, न वायु, न आकाश; न अहंकार, न महत्तत्त्व, और न ही मूल-अविद्या शेष रही। शिव के कोप से उस समय जगत् भस्म के कोलाहल से भर गया।