Adhyaya 20
Vidyesvara SamhitaAdhyaya 2066 Verses

पार्थिवार्चाविधिः | Pārthivārcā-vidhi (Procedure for the Earthen Liṅga Worship)

इस अध्याय में सूत जी पार्थिवार्चा—शुद्ध मिट्टी से बने शिवलिंग की पूजा—को वैदिक-विधि के अनुरूप और भुक्ति तथा मुक्ति देने वाला मार्ग बताते हैं। पहले सूत्रोक्त स्नान करके संध्या, ब्रह्मयज्ञ और तर्पण आदि नित्यकर्म पूर्ण कर, शिव-स्मरण के साथ भस्म और रुद्राक्ष जैसे शैव-चिह्न धारण करके पूजा आरम्भ करने का विधान है। वेदोक्त विधि और तीव्र भक्ति से पूर्ण फल-सिद्धि कही गई है। पूजा-स्थान के रूप में नदी-तट, सरोवर, पर्वत, वन, मंदिर या कोई भी स्वच्छ स्थान स्वीकार्य है। शुद्ध स्थान से सावधानीपूर्वक मिट्टी लेकर, वर्णानुसार मिट्टी के रंग का निर्देश देते हुए, स्थानीय उपलब्धता को भी मान्य किया गया है। मिट्टी को शुभ स्थान पर रखकर जल से शुद्ध करें, धीरे-धीरे गूँथकर वैदिक रीति से पार्थिव लिंग बनाएं और भक्तिपूर्वक पूजन करें—इसी से दोनों फल प्राप्त होते हैं; आगे के विस्तृत नियम सूत जी संकेत करते हैं।

Shlokas

Verse 1

सूत उवाच । अथ वैदिकभक्तानां पार्थिवार्चां निगद्यते । वैदिकेनैव मार्गेण भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी

सूतजी बोले—अब वैदिक मार्ग के भक्तों के लिए पार्थिव (मृत्तिका) लिङ्ग-पूजा का वर्णन किया जाता है; जो केवल वैदिक विधि से की जाए तो भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करती है।

Verse 2

सूत्रोक्तविधिना स्नात्वा संध्यां कृत्वा यथाविधि । ब्रह्मयज्ञं विधायादौ ततस्तर्प्पणमाचरेत्

सूत्रों में बताए विधान से स्नान करके और विधिपूर्वक संध्या करके, पहले ब्रह्मयज्ञ सम्पन्न करे; उसके बाद श्रद्धापूर्वक तर्पण करे।

Verse 3

नैत्यिकं सकलं कामं विधायानंतरं पुमान् । शिवस्मरणपूर्वं हि भस्मरुद्रा क्षधारकः

अपने समस्त नित्यकर्म पूर्ण करके, पुरुष पहले भगवान शिव का स्मरण करे; फिर भस्म और रुद्राक्ष धारण करे।

Verse 4

वेदोक्ताविधिना सम्यक्संपूर्णफलसिद्धये । पूजयेत्परया भक्त्या पार्थिवं लिंगमुत्तमम्

वेदोक्त विधि के अनुसार कर्म का पूर्ण और सिद्ध फल पाने हेतु परम भक्ति से उत्तम पार्थिव (मृण्मय) लिंग की पूजा करनी चाहिए।

Verse 5

नदीतीरे तडागे च पर्वते काननेऽपि च । शिवालये शुचौ देशे पार्थिवार्चा विधीयते

नदी-तट पर, तालाब के पास, पर्वत पर, वन में, शिवालय में अथवा किसी भी शुद्ध स्थान में पार्थिव-लिंग द्वारा शिव-पूजन करने की विधि बताई गई है।

Verse 6

शुद्धप्रदेशसंभूतां मृदमाहृत्य यत्नतः । शिवलिंगं प्रकल्पेत सावधानतया द्विजाः

हे द्विजों! शुद्ध स्थान से उत्पन्न मिट्टी को यत्नपूर्वक लाकर, सावधानी और एकाग्रता से शिवलिंग का निर्माण करना चाहिए।

Verse 7

विप्रे गौरा स्मृता शोणा बाहुजे पीतवर्णका । वैश्ये कृष्णा पादजाते ह्यथवा यत्र या भवेत्

ब्राह्मण के लिए वह गौर वर्ण की मानी गई है, क्षत्रिय के लिए शोण (लाल), बाहुज अर्थात वैश्य के लिए पीतवर्ण, और पादजात अर्थात शूद्र के लिए कृष्ण (काला)—अर्थात जहाँ जैसी हो, वैसी ही समझनी चाहिए।

Verse 8

संगृह्य मृत्तिकां लिंगनिर्माणार्थं प्रयत्नतः । अतीव शुभदेशे च स्थापयेत्तां मृदं शुभाम्

लिंग-निर्माण के लिए यत्नपूर्वक मिट्टी एकत्र करके, उस शुभ मृदा को अत्यन्त पवित्र स्थान में स्थापित करना चाहिए।

Verse 9

संशोध्य च जलेनापि पिंडीकृत्य शनैः शनैः । विधीयेत शुभं लिंगं पार्थिवं वेदमार्गतः

जल से उसे शुद्ध करके, धीरे-धीरे पिंड बनाकर, वेद-विधि के अनुसार शुभ पार्थिव लिंग का निर्माण करना चाहिए।

Verse 10

ततः संपूजयेद्भक्त्या भुक्तिमुक्तिफलाप्तये । तत्प्रकारमहं वच्मि शृणुध्वं संविधानतः

इसके बाद भक्ति से पूजन करे, जिससे भोग और मुक्ति—दोनों के फल प्राप्त हों। उस विधि को मैं कहता हूँ; तुम क्रमपूर्वक सुनो।

Verse 11

नमः शिवाय मंत्रेणार्चनद्र व्यं च प्रोक्षयेत् । भूरसीति च मंत्रेण क्षेत्रसिद्धिं प्रकारयेत्

“नमः शिवाय” मंत्र से पूजन-सामग्री पर प्रोक्षण करे। फिर “भूरसि” मंत्र से पूजा-क्षेत्र की सिद्धि तथा पवित्रीकरण विधिपूर्वक सम्पन्न करे।

Verse 12

आपोस्मानिति मंत्रेण जलसंस्कारमाचरेत् । नमस्ते रुद्र मंत्रेण फाटिकाबंधमुच्यते

“आपोऽस्मान्…” मंत्र से जल का संस्कार करे। और “नमस्ते रुद्र” मंत्र से ‘फाटिका-बन्ध’ नामक रक्षाबन्धन-विधि कही गई है।

Verse 13

शंभवायेति मंत्रेण क्षेत्रशुद्धिं प्रकारयेत् । नमः पूर्वेण कुर्यात्पंचामृतस्यापि प्रोक्षणम्

“शंभवाय” मंत्र से क्षेत्र-शुद्धि करे। फिर “नमः…” से आरम्भ होने वाले मंत्र द्वारा पंचामृत का भी प्रोक्षण करे।

Verse 14

नीलग्रीवाय मंत्रेण नमःपूर्वेण भक्तिमान् । चरेच्छंकरलिंगस्य प्रतिष्ठापनमुत्तमम्

भक्तिमान साधक पहले नमस्कार करे, फिर “नीलग्रीवाय” मंत्र से शंकर-लिंग की उत्तम प्रतिष्ठा-विधि सम्पन्न करे।

Verse 15

भक्तितस्तत एतत्ते रुद्रा येति च मंत्रतः । आसनं रमणीयं वै दद्याद्वैदिकमार्गकृत्

तब भक्तिभाव से “रुद्राय” मंत्र का जप करते हुए वैदिक मार्ग का अनुयायी पूजन में भगवान रुद्र को सुंदर आसन अर्पित करे।

Verse 16

मानो महन्तमिति च मंत्रेणावाहनं चरेत् । याते रुद्रे ण मंत्रेण संचरेदुपवेशनम्

“मानो महन्तम्…” से आरम्भ होने वाले मंत्र द्वारा महेश्वर का आवाहन करे; फिर “याते रुद्रेण…” से आरम्भ मंत्र द्वारा उपवेशन—अर्थात् आसन-स्थापन—करे।

Verse 17

मंत्रेण यामिषुमिति न्यासं कुर्य्याच्छिवस्य च । अध्यवोचदिति प्रेम्णाधिवासं मनुनाचरेत्

“यामिषुम्…” से आरम्भ होने वाले मन्त्र द्वारा शिव का न्यास करे। फिर “अध्यवोचद्…” से आरम्भ मन्त्र से प्रेमपूर्वक अधिवास (आवाहन-समर्पण) सम्पन्न करे।

Verse 18

मनुना सौजीव इति देवतान्यासमाचरेत् । असौ योवसर्पतीति चाचरेदपसर्पणम्

मनु द्वारा उपदिष्ट “सौजीव…” मंत्र से देह पर देवता-न्यास करना चाहिए। फिर “असौ योऽवसर्पती…” सूत्र से अपसर्पण-विधि कर के विघ्नकारी शक्तियों को दूर भगाए, ताकि शिव-पूजा निर्विघ्न चले।

Verse 19

नमोस्तु नीलग्रीवायेति पाद्यं मनुनाहरेत् । अर्घ्यं च रुद्र गायत्र् याऽचमनं त्र् यंबकेण च

“नमोऽस्तु नीलग्रीवाय” मंत्र का उच्चारण करके पाद्य अर्पित करे। रुद्र-गायत्री से अर्घ्य दे, और त्र्यम्बक मंत्र से आचमनीय जल समर्पित करे।

Verse 20

इति श्रीशिवमहापुराणे विद्येश्वरसंहितायां साध्यसाधनखण्डे पार्थिवशिवलिंगपूजाविधिवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः

इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण की विद्येश्वरसंहिता के साध्यसाधन-खण्ड में “पार्थिव शिवलिंग-पूजा-विधि का वर्णन” नामक बीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 21

घृटं स्नाने खलु घृतं घृतं यावेति मंत्रतः । मधुवाता मधुनक्तं मधुमान्न इति त्र् यृचा

स्नान के समय ‘घृतं—घृतं’ का उच्चारण करते हुए ‘घृतं यावे’ मंत्र से आह्वान करे; तथा ‘मधुवाता’, ‘मधुनक्तम्’, ‘मधुमान्नः’—इन तीन ऋचाओं से स्नान को संस्कारित करे, जिससे वैदिक मधुरता और पवित्रता द्वारा देह शिव-पूजन के योग्य बने।

Verse 22

मधुखंडस्नपनं प्रोक्तमिति पंचामृतं स्मृतम् । अथवा पाद्यमंत्रेण स्नानं पंचामृतेन च

मधु और शर्करा से स्नान करना कहा गया है; यही पञ्चामृत के रूप में स्मरणीय है। अथवा पाद्य-मंत्र से तथा पञ्चामृत से भी पवित्र स्नान कराए।

Verse 23

मानस्तोके इति प्रेम्णा मंत्रेण कटिबंधनम् । नमो धृष्णवे इति वा उत्तरीयं च धापयेत्

प्रेमपूर्वक “मानस्तोके” मंत्र का जप करते हुए कटिबंध बाँधे। फिर “नमो धृष्णवे” का उच्चारण कर उत्तरीय वस्त्र को विधिपूर्वक धारण करे।

Verse 24

या ते हेतिरिति प्रेम्णा ऋक्चतुष्केण वैदिकः । शिवाय विधिना भक्तश्चरेद्वस्त्रसमर्पणम्

“या ते हेतिः” से आरंभ होने वाली चार ऋचाओं का प्रेमपूर्वक जप करते हुए वैदिक उपासक, विधिपूर्वक भक्तिभाव से भगवान शिव को वस्त्र अर्पित करे।

Verse 25

नमः श्वभ्य इति प्रेम्णा गंधं दद्यादृचा सुधीः । नमस्तक्षभ्य इति चाक्षतान्मंत्रेण चार्पयेत्

प्रेमपूर्वक “नमः श्वभ्यः” ऋचा का पाठ करते हुए बुद्धिमान उपासक गंध (चंदनादि) अर्पित करे। फिर “नमस्तक्षभ्यः” मंत्र से अक्षत—अखंड धान्य—भी समर्पित करे।

Verse 26

नमः पार्याय इति वा पुष्प मंत्रेण चार्पयेत् । नमः पर्ण्याय इति वा बिल्बपत्रसमर्पणम्

“नमः पार्याय” मंत्र से पुष्प अर्पित करे; और “नमः पर्ण्याय” मंत्र से बिल्वपत्र भगवान् शिव को समर्पित करे।

Verse 27

नमः कपर्दिने चेति धूपं दद्याद्यथाविधि । दीपं दद्याद्यथोक्तं तु नम आशव इत्यृचा

“नमः कपर्दिने” का जप करते हुए विधिपूर्वक धूप अर्पित करे। फिर “नम आशवे” ऋचा का उच्चारण कर शास्त्रोक्त दीप समर्पित करे।

Verse 28

नमो ज्येष्ठाय मंत्रेण दद्यान्नैवेद्यमुत्तमम् । मनुना त्र् यम्बकमिति पुनराचमनं स्मृतम्

“नमो ज्येष्ठाय” मंत्र से भगवान् शिव को उत्तम नैवेद्य अर्पित करे। फिर “त्र्यम्बकम्…” वैदिक मंत्र का जप कर पुनः आचमन करना विहित है।

Verse 29

इमा रुद्रा येति ऋचा कुर्यात्फलसमर्पणम् । नमो व्रज्यायेति ऋचा सकलं शंभवेर्पयेत्

“इमा रुद्रा…” ऋचा का पाठ कर फल अर्पित करे। फिर “नमो व्रज्याय…” ऋचा का उच्चारण कर सब कुछ पूर्णतः शम्भु को समर्पित करे।

Verse 30

मानो महांतमिति च मानस्तोके इति ततः । मंत्रद्वयेनैकदशाक्षतै रुद्रा न्प्रपूजयेत्

फिर “मा नो महान्तम्” और “मा नस्तोके” इन दो मंत्रों का पाठ करके, ग्यारह अक्षत अर्पित कर रुद्रों की विधिवत् पूजा करे।

Verse 31

हिरण्यगर्भ इति त्र् यृचा दक्षिणां हि समर्पयेत् । देवस्य त्वेति मंत्रेण ह्यभिषेकं चरेद्बुधः

“हिरण्यगर्भ” से आरम्भ होने वाली त्र्यृचा का पाठ करके बुद्धिमान साधक यथाविधि दक्षिणा अर्पित करे। फिर “देवस्य त्वा…” मंत्र से प्रतिष्ठित शिवदेव का अभिषेक करे।

Verse 32

दीपमंत्रेण वा शंभोर्नीराजनविधिं चरेत् । पुष्पांजलिं चरेद्भक्त्या इमा रुद्रा य च त्र् यृचा

अथवा दीप-मंत्र से शम्भु के सम्मुख नीराजन-विधि करे। फिर भक्तिभाव से पुष्पांजलि अर्पित करे और रुद्र के लिए ये त्र्यृचा ऋक्-पाठ करे।

Verse 33

मानो महान्तमिति च चरेत्प्राज्ञः प्रदक्षिणाम् । मानस्तोकेति मंत्रेण साष्टाण्गं प्रणमेत्सुधीः

प्राज्ञ भक्त “मानो महान्तम्” का जप करते हुए प्रदक्षिणा करे। फिर “मानस् तोके” मंत्र से सुधी जन साष्टाङ्ग प्रणाम करे।

Verse 34

एषते इति मंत्रेण शिवमुद्रा ं प्रदर्शयेत् । यतोयत इत्यभयां ज्ञानाख्यां त्र् यंबकेण च

“एषते” मंत्र से शिव-मुद्रा दिखाए। “यतो-यत” मंत्र से अभया-मुद्रा, और “त्र्यम्बक” मंत्र से ज्ञान-नामक मुद्रा भी प्रदर्शित करे।

Verse 35

नमःसेनेति मंत्रेण महामुद्रा ं प्रदर्शयेत् । दर्शयेद्धेनुमुद्रा ं च नमो गोभ्य ऋचानया

“नमःसेन…” मंत्र का जप करके महामुद्रा दिखाए। और “नमो गोभ्यः” ऋचा से धेनु-मुद्रा भी प्रदर्शित करे।

Verse 36

पंचमुद्रा ः प्रदर्श्याथ शिवमंत्रजपं चरेत् । शतरुद्रि यमंत्रेण जपेद्वेदविचक्षणः

तदनन्तर पाँच मुद्राएँ प्रदर्शित करके शिव-मन्त्र का जप करे। वेद में निपुण साधक शतरुद्रीय मन्त्र से जप करे।

Verse 37

ततः पंचाण्गपाठं च कुर्य्याद्वेदविचक्षणः । देवागात्विति मंत्रेण कुर्याच्छंभोर्विसर्जनम्

इसके बाद वेद में निपुण उपासक पञ्चाङ्ग-पाठ करे। फिर “देवागात्…” से आरम्भ होने वाले मन्त्र द्वारा भगवान् शम्भु का विधिवत् विसर्जन करे।

Verse 38

इत्युक्तः शिवपूजाया व्यासतो वैदिकोविधिः । समासतश्च शृणुत वैदिकं विधिमुत्तमम्

इस प्रकार शिव-पूजा की वैदिक विधि विस्तार से कही गई। अब उसी उत्तम वैदिक विधान को संक्षेप में भी सुनो।

Verse 39

ऋचा सद्योजातमिति मृदाहरणमाचरेत् । वामदेवाय इति च जलप्रक्षेपमाचरेत्

‘सद्योजातम्…’ से आरम्भ ऋचा के साथ पवित्र मृदा का ग्रहण (विभूति-निर्माण हेतु) करे। और ‘वामदेवाय’ मन्त्र के साथ जल का प्रक्षेपण/छिड़काव करे।

Verse 40

अघोरेण च मंत्रेण लिंगनिर्माणमाचरेत् । तत्पुरुषाय मंत्रेणाह्वानं कुर्याद्यथाविधि

अघोर मंत्र से शिवलिंग का निर्माण/प्रतिष्ठा करे; और तत्पुरुष मंत्र से विधिपूर्वक भगवान् शिव का आवाहन करे।

Verse 41

संयोजयेद्वेदिकायामीशानमनुना हरम् । अन्यत्सर्वं विधानं च कुर्य्यात्संक्षेपतः सुधीः

बुद्धिमान उपासक को ईशान-मंत्र द्वारा वेदिका पर हर का स्थापन (आवाहन-निवेशन) करना चाहिए; फिर संक्षेप में शेष समस्त विधियाँ शास्त्रानुसार करनी चाहिए।

Verse 42

पंचाक्षरेण मंत्रेण गुरुदत्तेन वा तथा । कुर्यात्पूजां षोडशोपचारेण विधिवत्सुधीः

पंचाक्षरी मंत्र से—अथवा गुरु द्वारा प्रदत्त मंत्र से भी—बुद्धिमान भक्त को षोडशोपचार सहित विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए।

Verse 43

भवाय भवनाशाय महादेवाय धीमहि । उग्राय उग्रनाशाय शर्वाय शशिमौलिने

हम भव का ध्यान करते हैं—जो सृष्टि का कारण और भव-बंधन का नाशक है; महादेव का ध्यान करते हैं। उग्र का ध्यान करते हैं—जो उग्रता और पाप का संहारक है; शर्व तथा शशिमौलि (चन्द्र-शिरोमणि) शिव का ध्यान करते हैं।

Verse 44

अनेन मनुना वापि पूजयेच्छंकरं सुधीः । सुभक्त्या च भ्रमं त्यक्त्वा भक्त्यैव फलदः शिवः

इस मंत्र से भी बुद्धिमान जन शंकर की पूजा करें। उत्तम भक्ति से मोह को त्यागकर जानें कि शिव केवल भक्ति से ही फल देने वाले हैं।

Verse 45

इत्यपि प्रोक्तमादृत्य वैदिकक्रमपूजनम् । प्रोच्यतेन्यविधिः सम्यक्साधारणतया द्विजः

इस प्रकार वैदिक क्रम से पूजन के विषय में जो कहा गया है, उसे आदरपूर्वक ग्रहण करके, हे द्विज! अब मैं एक अन्य विधि—सामान्य रूप से और स्पष्टतया—सम्यक् साधना हेतु बताता हूँ।

Verse 46

पूजा पार्थिवलिंगस्य संप्रोक्ता शिवनामभिः । तां शृणुध्वं मुनिश्रेष्ठाः सर्वकामप्रदायिनीम्

पार्थिव (मृण्मय) लिंग की पूजा शिव के नामों द्वारा बताई गई है। हे मुनिश्रेष्ठो, उसे सुनो—वह समस्त कामनाओं को देने वाली है।

Verse 47

हरो महेश्वरः शंभुः शूलपाणिः पिनाकधृक् । शिवः पशुपतिश्चैव महादेव इति क्रमात्

क्रम से वे हर, महेश्वर, शम्भु, शूलपाणि, पिनाकधारी, शिव, पशुपति और महादेव कहलाते हैं।

Verse 48

मृदाहरणसंघट्टप्रतिष्ठाह्वानमेव च । स्नपनं पूजनं चैव क्षमस्वेति विसर्जनम्

मृत्तिका का संग्रह, (लिंग का) गूंथना-गठन, प्रतिष्ठा और आवाहन; फिर स्नान और पूजन; और अंत में ‘क्षमस्व’ कहकर विसर्जन—(ये विधियाँ हैं)।

Verse 49

ओंकारादिचतुर्थ्यंतैर्नमोन्तैर्नामभिः क्रमात् । कर्तव्या च क्रिया सर्वा भक्त्या परमया मुदा

ॐकार से आरम्भ करके, क्रमशः ‘नमः’ पर समाप्त होने वाले नामों से, परम भक्ति और हर्ष सहित समस्त पूजाकर्म करना चाहिए।

Verse 50

कृत्वा न्यासविधिं सम्यक्षडण्गकरयोस्तथा । षडक्षरेण मंत्रेण ततो ध्यानं समाचरेत्

षडङ्गों तथा दोनों हाथों पर विधिपूर्वक न्यास करके, फिर षडक्षर मन्त्र से ध्यान करना चाहिए।

Verse 51

कैलासपीठासनमध्यसंस्थं भक्तैः सनंदादिभिरर्च्यमानम् । भक्तार्तिदावानलमप्रमेयं ध्यायेदुमालिंगितविश्वभूषणम्

कैलास के पीठासन के मध्य विराजमान, सनंद आदि भक्तों द्वारा पूजित, भक्तों की पीड़ा-रूपी दावानल को भस्म करने वाले, अपरिमेय, उमा से आलिंगित, विश्व-भूषण प्रभु का ध्यान करे।

Verse 52

ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रा वतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वलांगं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम् । पद्मासीनं समंतात्स्थितममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम्

नित्य महेश का ध्यान करे—जो रजत-गिरि के समान दीप्त, मनोहर चंद्र-वतंस से विभूषित, रत्नाभूषणों से उज्ज्वल अंगों वाले, प्रसन्न, जिनके हाथों में परशु, मृग, वर-मुद्रा और अभय-मुद्रा हैं। जो पद्मासन पर विराजमान, चारों ओर देवगणों से घिरे, व्याघ्रचर्म धारण किए, विश्व के आद्य, विश्व-बीज, समस्त भय हरने वाले, पंचवक्त्र और त्रिनेत्र हैं।

Verse 53

इति ध्यात्वा च संपूज्य पार्थिवं लिंगमुत्तमम् । जपेत्पंचाक्षरं मंत्रं गुरुदत्तं यथाविधि

इस प्रकार ध्यान करके और उत्तम पार्थिव लिंग की विधिपूर्वक पूजा कर, गुरु द्वारा प्रदत्त पंचाक्षरी मंत्र का नियमानुसार जप करे।

Verse 54

स्तुतिभिश्चैव देवेशं स्तुवीत प्रणमन्सुधीः । नानाभिधाभिर्विप्रेन्द्रा ः पठेद्वै शतरुद्रि यम्

प्रणाम करते हुए बुद्धिमान भक्त स्तुतियों से देवेश्वर की प्रशंसा करे। और हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो, उनके अनेक पवित्र नामों से युक्त शतरुद्रीय का निश्चय ही पाठ करे।

Verse 55

ततः साक्षतपुष्पाणि गृहीत्वांजलिना मुदा । प्रार्थयेच्छंकरं भक्त्या मंत्रैरेभिः सुभक्तितः

तदनंतर अक्षत सहित पुष्पों को आनंदपूर्वक अंजलि में लेकर, इन मंत्रों द्वारा उत्तम भक्ति से शंकर से प्रार्थना करे।

Verse 56

तावकस्त्वद्गुणप्राणस्त्वच्चित्तोहं सदा मृड । कृपानिध इति ज्ञात्वा भूतनाथ प्रसीद मे

हे मृड, मैं आपका ही हूँ; आपके गुण ही मेरे प्राण हैं और मेरा चित्त सदा आपमें स्थित है। आपको करुणानिधि जानकर, हे भूतनाथ, मुझ पर प्रसन्न हों।

Verse 57

अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानाज्जप पूजादिकं मया । कृतं तदस्तु सफलं कृपया तव शंकर

हे शंकर! अज्ञान से या ज्ञानपूर्वक मैंने जो जप, पूजा आदि किए हैं, आपकी कृपा से वे सब सफल और पूर्ण हों।

Verse 58

अहं पापी महानद्य पावनश्च भवान्महान् । इति विज्ञाय गौरीश यदिच्छसि तथा कुरु

मैं महान पापी हूँ, और आप महान पावनकर्ता हैं—यह जानकर, हे गौरीश! जैसा आपको उचित लगे वैसा ही कीजिए।

Verse 59

वेदैः पुराणैः सिद्धान्तैरृषिभिर्विविधैरपि । न ज्ञातोसि महादेव कुतोहं त्वं महाशिव

हे महादेव! वेदों, पुराणों, सिद्धान्तों और अनेक प्रकार के ऋषियों द्वारा भी आप पूर्णतः ज्ञात नहीं होते; फिर मैं आपको कैसे जान सकूँ, हे महाशिव?

Verse 60

यथा तथा त्वदीयोस्मि सर्वभावैर्महेश्वर । रक्षणीयस्त्वयाहं वै प्रसीद परमेश्वर

हे महेश्वर! जैसे भी हो, अपने समस्त भावों सहित मैं आपका ही हूँ। निश्चय ही मेरी रक्षा आपको करनी है—हे परमेश्वर! मुझ पर प्रसन्न हों।

Verse 61

इत्येवं चाक्षतान्पुष्पानारोप्य च शिवोपरि । प्रणमेद्भक्तितश्शंभुं साष्टांगं विधिवन्मुने

इस प्रकार अक्षत और पुष्प शिव पर अर्पित करके, हे मुनि, विधिपूर्वक भक्तिभाव से शम्भु को साष्टांग प्रणाम करे।

Verse 62

ततः प्रदक्षिणां कुर्याद्यथोक्तविधिना सुधीः । पुनः स्तुवीत देवेशं स्तुतिभिः श्रद्धयान्वितः

तत्पश्चात् बुद्धिमान भक्त यथोक्त विधि से प्रदक्षिणा करे और फिर श्रद्धायुक्त होकर स्तुतियों द्वारा देवेश का पुनः स्तवन करे।

Verse 63

ततो गलरवं कृत्वा प्रणमेच्छुचिनम्रधीः । कुर्याद्विज्ञप्तिमादृत्य विसर्जनमथाचरेत्

फिर गले से आदरयुक्त ध्वनि करके, शुचि और नम्रबुद्धि भक्त प्रणाम करे; आदरपूर्वक निवेदन करके तत्पश्चात् विसर्जन-विधि करे।

Verse 64

इत्युक्ता मुनिशार्दूलाः पार्थिवार्चा विधानतः । भुक्तिदा मुक्तिदा चैव शिवभक्तिविवर्धिनी

हे मुनिशार्दूलो, इस प्रकार कही गई पार्थिवार्चा विधिपूर्वक की जाए तो वह भोग भी देती है, मुक्ति भी देती है और शिवभक्ति को बढ़ाती है।

Verse 65

इत्यध्यायं सुचित्तेन यः पठेच्छृणुयादपि । सर्वपापविशुद्धात्मासर्वान्कामानवाप्नुयात्

जो इस अध्याय को शुद्धचित्त से पढ़े या सुने भी, वह सब पापों से शुद्ध होकर समस्त (धर्मसम्मत) कामनाओं को प्राप्त करता है।

Verse 66

आयुरायोग्यदं चैव यशस्यं स्वर्ग्यमेव च । पुत्रपौत्रादिसुखदमाख्यानमिदमुत्तमम्

यह उत्तम आख्यान आयु और आरोग्य देता है, यश प्रदान करता है और स्वर्ग की प्राप्ति कराता है; तथा पुत्र-पौत्र आदि से होने वाला कुल-सुख भी देता है।

Frequently Asked Questions

It outlines a stepwise pārthivārcā protocol: Vaidika bathing and sandhyā, brahmayajña and tarpaṇa; completion of daily duties; Śiva-smaraṇa with bhasma/rudrākṣa observance; selection of a clean or sacred site; collection and water-purification of earth; gradual kneading and formation of a proper earthen liṅga; and devotional worship aimed at bhukti–mukti.

The earthen liṅga functions as a deliberately transient embodiment of the eternal: matter is purified, shaped, and worshiped to disclose Śiva’s immanent accessibility, while the Vaidika ordering of acts signals that liberation is pursued through disciplined embodiment rather than abstraction—ritual becomes a pedagogy of non-dual orientation toward Śiva.

Śiva is highlighted primarily through the liṅga form (liṅga-svarūpa) as the normative ritual icon, with Viśveśvara implied as the cosmic lord approached via vedokta worship; the emphasis is less on a named anthropomorphic form and more on liṅga-centered theology and practice.