
इस अध्याय में सूत के कथन से सञ्ज्ञा–छाया का उपाख्यान आता है। विवस्वान् सूर्य के प्रखर तेज को सञ्ज्ञा (त्वाष्ट्रि/सुरेणुका) सह नहीं पाती; मन‑देह दोनों व्याकुल हो उठते हैं। पितृगृह जाने से पहले वह माया‑मयी ‘छाया’ नामक प्रतिरूप रचकर उसे आदेश देती है कि घर में अडिग रहकर सञ्ज्ञा के बच्चों का पालन करे। यहाँ सञ्ज्ञा से सूर्य के पुत्र—मनु श्राद्धदेव तथा यम और यमुना—का वर्णन है। कथा रूप‑सत्य, कर्तव्य‑सहनशीलता और गोपन की नीति के तनाव को दिखाती है; गूढ़ अर्थ में तेज दिव्य गुण है जो देहधारियों को अभिभूत कर सकता है, और छाया असह्य स्थिति में भी धर्म की रक्षा करने वाली सीमांत व्यवस्था है। साथ ही मनु, यम और यमुना की वंश-आधारभूमि भी स्थापित होती है।
Verse 1
सूत उवाच । विवस्वान्कश्यपाज्जज्ञे दाक्षायण्यां महाऋषेः । तस्य भार्याऽभवत्संज्ञा त्वाष्ट्री देवी सुरेणुका
सूत बोले—दाक्षायणी में महर्षि कश्यप से विवस्वान उत्पन्न हुए। उनकी पत्नी त्वष्टा की दिव्य कन्या संज्ञा थी, जो सुरेणुका नाम से प्रसिद्ध थी।
Verse 2
मुनेऽसहिष्णुना तेन तेजसा दुस्सहेन च । भर्तृरूपेण नातुष्यद्रूप यौवनशालिनी
हे मुने, रूप-यौवन से दीप्त वह देवी उस असह्य, दुर्दम तेज को सह न सकी; और पति-रूप में भी वह संतुष्ट न हुई।
Verse 3
आदित्यस्य हि तद्रूपमसहिष्णुस्तु तेजसः । दह्यमाना तदोद्वेगमकरोद्वरवर्णिनी
आदित्य के उस रूप की ज्वलंत प्रभा को वह सह न सकी। दग्ध होती हुई वह सुन्दरवर्णा स्त्री तब व्याकुल और उद्विग्न हो उठी।
Verse 4
ऋषेऽस्यां त्रीण्यपत्यानि जनयामास भास्करः । संज्ञायां तु मनुः पूर्वं श्राद्धदेवः प्रजापतिः
हे ऋषि, इसी में भास्कर ने तीन संतानों को उत्पन्न किया। और संज्ञा से सबसे पहले श्राद्धदेव प्रजापति मनु का जन्म हुआ।
Verse 5
यमश्च यमुना चैव यमलौ संबभूवतुः । एवं हि त्रीण्यपत्यानि तस्यां जातानि सूर्य्यतः
यम और यमुना भी जुड़वाँ रूप में उत्पन्न हुए। इस प्रकार संज्ञा से सूर्य के तीन ही पुत्र-पुत्रियाँ जन्मे।
Verse 6
संवर्तुलं तु तद्रूपं दृष्ट्वा संज्ञा विवस्वतः । असहंती ततश्छायामात्मनस्साऽ सृजच्छुभाम्
विवस्वान के उस प्रचण्ड तेजस्वी रूप को देखकर संज्ञा सह न सकी; इसलिए उसने अपने ही अंश से शुभ छाया-रूप की सृष्टि की।
Verse 7
मायामयी तु सा संज्ञामवोचद्भक्तितश्शुभे । किं करोमीह कार्य्यं ते कथयस्व शुचिस्मिते
तब वह माया-रूपिणी छाया भक्तिभाव से संज्ञा से बोली—“हे शुभे, मैं यहाँ तुम्हारा कौन-सा कार्य करूँ? हे शुचि-स्मिते, बताओ।”
Verse 8
संज्ञोवाच । अहं यास्यामि भद्रं ते ममैव भवनं पितुः । त्वयैतद्भवने सत्यं वस्तव्यं निर्विकारतः
संज्ञा बोली—“मैं जाती हूँ; तुम्हारा कल्याण हो—अपने पिता के घर। पर हे सत्ये, तुम्हें इसी भवन में निश्चल भाव से, निर्विकार रहकर, सत्यतः निवास करना है।”
Verse 9
इमौ मे बालकौ साधू कन्या चेयं सुमध्यमा । पालनीयाः सुखेनैव मम चेदिच्छसि प्रियम्
ये मेरे दोनों बालक साधु और सुशील हैं, और यह कन्या सुमध्यमा है। यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहो, तो इन्हें कोमलता से पालो और सुख में रखो।
Verse 10
छायोवाच । आकेशग्रहणाद्देवि सहिष्येऽहं सुदुष्कृतम् । नाख्यास्यामि मतं तुभ्यं गच्छ देवि यथासुखम्
छाया बोली—हे देवी, तुमने मुझे केश पकड़कर जो घोर अपराध किया है, उसे मैं सह लूँगी। मैं तुम्हें अपना मत नहीं बताऊँगी। हे देवी, जैसे तुम्हें सुख हो वैसे जाओ।
Verse 11
सूत उवाच । इत्युक्ता साऽगमद्देवी व्रीडिता सन्निधौ पितुः । पित्रा निर्भर्त्सिता तत्र नियुक्ता सा पुनः पुनः
सूत बोले—ऐसा कहे जाने पर वह देवी लज्जित होकर अपने पिता के सन्निधि में गई। वहाँ पिता ने उसे डाँटा और बार-बार उसी कार्य में फिर से नियुक्त किया।
Verse 12
अगच्छद्वडवा भूत्वाऽऽच्छाद्यरूपं ततस्त्वकम् । कुरुंस्तदोत्तरान्प्राप्य नृणां मध्ये चचार ह
तब वह घोड़ी का रूप धारण करके, अपने वास्तविक स्वरूप को आवरण से छिपाकर चल पड़ी। कुरुओं के देश और उत्तर प्रदेशों में पहुँचकर वह मनुष्यों के बीच विचरने लगी।
Verse 13
संज्ञां तां तु रविर्मत्वा छायायां सुसुतं तदा । जनयामास सावर्णिं मनुं वै सविता किल
परंतु सूर्य ने छाया को संज्ञा समझकर, उस पर तब एक उत्तम पुत्र उत्पन्न किया। वास्तव में सविता ने सावर्णि नामक मनु को जन्म दिया।
Verse 14
संज्ञाऽनु प्रार्थिता छाया सा स्वपुत्रेऽपि नित्यशः । चकाराभ्यधिकं स्नेहं न तथा पूर्वजे सुते
संज्ञा के बार-बार आग्रह करने पर छाया ने प्रतिदिन अपने ही पुत्र पर अधिक स्नेह किया, परन्तु ज्येष्ठ पुत्र पर वैसा स्नेह नहीं किया।
Verse 15
अनुजश्चाक्षमस्तत्तु यमस्तं नैव चक्षमे । स सरोषस्तु बाल्याच्च भाविनोऽर्थस्य गौरवात्
परन्तु उसका अनुज यम उसे सह न सका; वह उसे बिल्कुल भी सहन नहीं कर पाया। बाल्यावस्था के कारण और भविष्य में होने वाले परिणाम को बहुत महत्त्व देने से वह क्रोध से भर उठा।
Verse 16
छायां संतर्जयामास यदा वैवस्वतो यमः । तं शशाप ततः क्रोधाच्छाया तु कलुषीकृता
जब वैवस्वत यम ने छाया को धमकाया, तब क्षोभ से कलुषित हुई छाया ने क्रोध में उसे शाप दे दिया।
Verse 17
चरणः पततामेष तवेति भृशरोषितः । यमस्ततः पितुस्सर्वं प्रांजलिः प्रत्यवेदयत्
अत्यन्त क्रुद्ध होकर यम बोला—“यह पाँव तुम्हारे ऊपर गिर पड़े।” इसके बाद उसने हाथ जोड़कर सब बात अपने पिता से निवेदन की।
Verse 18
भृशं शाप भयोद्विग्नस्संज्ञावाक्यैर्विचेष्टितः । मात्रा स्नेहेन सर्वेषु वर्तितव्यं सुतेषु वै
शाप के भय से अत्यन्त उद्विग्न होकर उसने संकेतों और परोक्ष वचनों से स्थिति सँभालने का प्रयास किया। निश्चय ही माता को अपने सभी पुत्रों के प्रति समान स्नेह से व्यवहार करना चाहिए।
Verse 19
स्नेहमस्मास्वपाकृत्य कनीयांसं बिभर्ति सा । तस्मान्मयोद्यतः पादस्तद्भवान् क्षंतुमर्हति
हम पर से स्नेह हटाकर वह छोटे को सँभालती है; इसलिए क्रोध से मेरा पाँव उठ गया—आप कृपा करके इस अपराध को क्षमा करें।
Verse 20
शप्तोहमस्मि देवेश जनन्या तपतांवर । तव प्रसादाच्चरणो न पतेन्मम गोपते
हे देवेश, तपस्वियों में श्रेष्ठ मेरी माता ने मुझे शाप दिया है; पर हे गोपते, आपकी कृपा से मेरे चरण न डगमगाएँ, मैं मार्ग से न गिरूँ।
Verse 21
सवितोवाच । असंशयं पुत्र महद्भविष्यत्यत्र कारणम् । येन त्वामाविशत्क्रोधो धर्मज्ञं सत्यवादिनम्
सविता ने कहा—हे पुत्र, निःसंदेह यहाँ कोई महान कारण है। धर्म को जानने वाले और सत्य बोलने वाले तुममें क्रोध किस कारण से प्रविष्ट हुआ?
Verse 22
न शक्यते तन्मिथ्या वै कर्त्तुं मातृवचस्तव । कृमयो मांसमादाय गमिष्यंति महीतले
तुम्हारी माता के वचन को झूठा करना संभव नहीं। कीड़े मांस को ले जाकर पृथ्वी-तल पर विचरेंगे।
Verse 23
तद्वाक्यं भविता सत्यं त्वं च त्रातौ भविष्यसि । कुरु तात न संदेहं मनश्चाश्वास्य स्वं प्रभो
वह वचन सत्य सिद्ध होगा और तुम भी त्राता बनोगे। हे तात, करो—संदेह मत करो। हे प्रभो, पहले अपने मन को स्थिर कर आश्वस्त करो।
Verse 24
सूत उवाच । इत्युक्त्वा तनयं सूर्यो यमसंज्ञं मुनीश्वर । आदित्यश्चाब्रवीत्तान्त्तु छायां क्रोधसमन्वितः
सूत बोले—हे मुनीश्वर, यम नामक अपने पुत्र से ऐसा कहकर, आदित्य सूर्य क्रोध से युक्त होकर छाया से बोले।
Verse 25
सूर्य उवाच । हे प्रिये कुमते चंडि किं त्वयाऽऽचरितं किल । किं तु मेऽभ्यधिकः स्नेह एतदाख्यातुमर्हसि
सूर्य बोले—हे प्रिये, हे कुमति चण्डि, तूने यह क्या आचरण किया है? पर मेरा स्नेह तुझ पर अधिक है; इसलिए तू इसे मुझे बताने योग्य है।
Verse 26
सूत उवाच । सा रवेर्वचनं श्रुत्वा यथा तथ्यं न्यवेदयत् । निर्दग्धा कामरविणा सांत्वयामास वै तदा
सूत बोले—रवि के वचन सुनकर उसने जैसा सत्य था वैसा ही निवेदन किया। फिर कामरूपी सूर्य से दग्ध होकर उसने उस समय उसे/उसे ही सांत्वना देकर शांत किया।
Verse 27
छायोवाच । तवातितेजसा दग्धा इदं रूपं न शोभते । असहंती च तत्संज्ञा वने वसति शाद्वले
छाया बोली—तुम्हारे अतितेज से दग्ध होकर यह रूप अब शोभा नहीं देता। उस अवस्था को सह न सकने से, वही नाम धारण करने वाली वह वन में शाद्वल पर निवास करती है।
Verse 28
श्लाघ्या योगबलोपेता योगमासाद्य गोपते । अनुकूलस्तु देवेश संदिश्यात्ममयं मतम्
हे गोपते! वह प्रशंसनीय और योगबल से युक्त, योगसमाधि को प्राप्त होकर, अनुकूल भाव वाले देवेश को आत्मतत्त्वमय उपदेश निवेदित कर गई।
Verse 29
रूपं निवर्तयाम्यद्य तव कांतं करोम्यहम् । सूत उवाच । तच्छ्रुत्वाऽपगतः क्रोधो मार्तण्डस्य विवस्वतः
“आज मैं अपना रूप संकुचित कर तुम्हारे लिए उसे मनोहर कर दूँगा।” सूत बोले—यह सुनकर विवस्वान् मार्तण्ड का क्रोध शांत हो गया।
Verse 30
भ्रमिमारोप्य तत्तेजः शातयामास वै मुनिः । ततो विभ्राजितं रूप तेजसा संवृतेन च
उस तेज को घूमते चक्र पर रखकर मुनि ने निश्चय ही उसे काट डाला। तब एक अत्यन्त दीप्तिमान रूप प्रकट हुआ, पर वह अपनी ही प्रभा से आच्छादित और आवृत था।
Verse 31
कृतं कांततरं रूपं त्वष्ट्रा तच्छुशुभे तदा । ततोभियोगमास्थाय स्वां भार्य्यां हि ददर्श ह
तब त्वष्टा ने और भी अधिक कान्तिमय रूप रचा, जो उस समय अत्यन्त शोभायमान था। फिर तीव्र अभिलाषा से प्रेरित होकर उसने अपनी ही पत्नी को देखा।
Verse 32
अधृष्यां सर्वभूतानां तेजसा नियमेन च । सोऽश्वरूपं समास्थाय गत्वा तां मैथुनेच्छया
वह अपने तेज और संयम-बल से समस्त प्राणियों के लिए अजेय था। उसने अश्वरूप धारण किया और मैथुन-इच्छा से प्रेरित होकर उसके पास गया।
Verse 33
मैथुनाय विचेष्टंतीं परपुंसोभिशंकया । मुखतो नासिकायां तु शुक्रं तत् व्यदधान्मुने
हे मुने, मैथुन हेतु चेष्टा करती हुई उसे देखकर, कहीं कोई परपुरुष निकट न आ जाए—इस शंका से उसने अपना शुक्र मुख से नासिका में प्रवाहित कर दिया।
Verse 34
देवौ ततः प्रजायेतामश्विनौ भिषजां वरौ । नासत्यौ तौ च दस्रौ च स्मृतौ द्वावश्विनावपि
तत्पश्चात् देवस्वरूप दो अश्विन उत्पन्न हुए, जो वैद्यों में श्रेष्ठ थे। वे नासत्य और दस्र कहलाते हैं—यही दोनों ‘अश्विनौ’ के नाम से स्मरण किए जाते हैं।
Verse 35
इति श्रीशिवमहापुराणे पञ्चम्यामुमासंहितायां मन्वन्तरकीर्तने वैवस्वतवर्णनं नाम पचत्रिंशोऽध्यायः
इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के पंचम खंड ‘उमासंहिता’ में मन्वन्तरों के कीर्तन-प्रसंग के अंतर्गत ‘वैवस्वत (मन्वन्तर) का वर्णन’ नामक पैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
Verse 36
पत्या तेन गृहं प्रायात्स्वं सती मुदितानना । मुमुदातेऽथ तौ प्रीत्या दंपतो पूर्वतोधिकम्
अपने पति के साथ सती, आनंद से दमकते मुख वाली, अपने घर लौट आई। फिर वह दिव्य दंपति परस्पर प्रेम से पहले से भी अधिक हर्षित हुआ।
Verse 37
यमस्तु कर्मणा तेन भृशं पीडितमानसः । धर्मेण रंजयामास धर्मराज इमा प्रजाः
उस कर्म से यम का मन अत्यन्त पीड़ित हुआ; तब धर्म के द्वारा उसने इन प्रजाओं को प्रसन्न किया। इस प्रकार धर्मराज ने धर्म-नियम से लोगों का मार्गदर्शन किया।
Verse 38
लेभे स कर्मणा तेन धर्मराजो महाद्युतिः । पितॄणामाधिपत्यं च लोकपालत्वमेव च
उस कर्म के द्वारा महाद्युतिमान धर्मराज ने पितरों के लोक का आधिपत्य और लोकपाल का पद भी प्राप्त किया।
Verse 39
मनुः प्रजापतिस्त्वासीत्सावर्णिस्स तपोधनः । भाव्यः स कर्मणा तेन मनोस्सावर्णिकेंतरे
सावर्णि ही मनु, प्रजापति, और तप का निधि था। अपने कर्मों के उसी पुण्य से वह वैवस्वत मनु के बाद आने वाले सावर्णि-मन्वन्तर में फिर मनु होगा।
Verse 40
मेरुपृष्ठे तपो घोरमद्यापि चरते प्रभुः । यवीयसी तयोर्या तु यमी कन्या यशस्विनी
मेरु पर्वत की पीठ पर प्रभु आज भी घोर तप करते हैं। उन दोनों की जो कनिष्ठा कन्या हुई, वह यशस्विनी यमी थी।
Verse 41
अभवत्सा सरिच्छ्रेष्ठा यमुना लोकपा वनी । मनुरित्युच्यते लोके सावर्णिरिति चोच्यते
तब वह यमुना नदियों में श्रेष्ठ, लोकों को पावन करने वाली बनी। संसार में उसे ‘मनु’ भी कहा जाता है और ‘सावर्णि’ भी कहा जाता है।
Verse 42
य इदं जन्म देवानां शृणुयाद्धारयेत्तु वा । आपदं प्राप्य मुच्येत प्राप्नुयात्सुमहद्यशः
जो देवों के जन्म का यह वृत्तान्त सुनता है या स्मरण में धारण करता है, वह आपत्ति आने पर उस संकट से मुक्त हो जाता है और अत्यन्त महान यश पाता है।
The chapter narrates Saṃjñā’s inability to endure Sūrya’s intense tejas, her creation of Chāyā as a substitute to maintain household continuity, and the identification of her children with Sūrya—Manu (Śrāddhadeva), and the twins Yama and Yamunā.
Sūrya’s tejas symbolizes undiluted divine potency that can exceed embodied capacity; Chāyā functions as a liminal ‘mediating form’ (māyāmayī substitute) that preserves dharma and caregiving obligations when direct presence becomes existentially unsustainable.
No direct manifestation of Śiva or Umā/Gaurī is foregrounded in the sampled verses; instead, the adhyāya uses a solar-genealogical upākhyāna (Sūrya–Saṃjñā–Chāyā) as an instructive analog for themes relevant to Śaiva theology—power, mediation, and sustaining order.