Adhyaya 25
Uma SamhitaAdhyaya 2575 Verses

Kālajñāna (Knowledge of Time) and Mṛtyu-cihna (Signs of Death): Śiva’s Instruction to Umā

इस अध्याय में संवाद-परंपरा है। स्त्रीस्वभाव का वर्णन सुनकर व्यास सनत्कुमार से कालज्ञान का उपदेश माँगते हैं; तब सनत्कुमार पार्वती और परमेश्वर के पूर्व संवाद का वर्णन करते हैं। पार्वती कहती हैं कि उन्होंने शिव-पूजा की विधि और मंत्र समझ लिए हैं, पर कालचक्र में आयु की गणना और मृत्यु के निकट आने के चिह्न (मृत्यु-चिह्न) जानना चाहती हैं। शिव ‘परम शास्त्र’ का आश्वासन देकर समय की इकाइयाँ—दिन, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, वर्ष—और स्थूल-सूक्ष्म, आंतरिक-बाह्य लक्षणों की व्याख्या करते हैं। आगे शरीर में होने वाले संकेत—अचानक पीलापन, ऊपर की ओर रंग-विकार, इंद्रियों/अंगों का जड़ हो जाना—आदि को निश्चित अवधि (जैसे छह माह) में मृत्यु-सूचना के रूप में बताया गया है। उद्देश्य भाग्यवाद नहीं, बल्कि अनित्यता का बोध, लोक-उपकार और वैराग्य बढ़ाकर साधना को तीव्र करना है।

Shlokas

Verse 1

व्यास उवाच । सनत्कुमार सर्वज्ञ त्वत्सकाशान्मया मुने । स्त्रीस्वभावः श्रुतः प्रीत्या कालज्ञानं वदस्व मे

व्यास बोले—हे सर्वज्ञ सनत्कुमार, हे मुनि, आपके पास से मैंने प्रसन्नतापूर्वक स्त्री-स्वभाव सुना। अब कृपा करके मुझे काल का ज्ञान बताइए।

Verse 2

सनत्कुमार उवाच । इदमेव पुराऽपृच्छत्पार्वती परमेश्वरम् । श्रुत्वा नानाकथां दिव्यां प्रसन्ना सुप्रणम्य तम्

सनत्कुमार बोले—यह विषय पहले पार्वती ने परमेश्वर से ही पूछा था। अनेक दिव्य कथाएँ सुनकर वह प्रसन्न हुई और उन्हें भली-भाँति प्रणाम करके (फिर प्रश्न करने लगी)।

Verse 3

पार्वत्युवाच । भगवंस्त्वत्प्रसादेन ज्ञातं मे सकलं मतम् । यथार्चनं तु ते देव यैर्मंत्रैश्च यथाविधि

पार्वती बोलीं—हे भगवन्, आपकी कृपा से मुझे समस्त उपदेश ज्ञात हो गया। अब, हे देव, बताइए कि आपकी पूजा यथाविधि कैसे की जाए—किन मंत्रों से और किस विधि के अनुसार।

Verse 4

अद्यापि संशयस्त्वेकः कालचक्रं प्रति प्रभो । मृत्युचिह्नं यथा देव किं प्रमाणं यथायुषः

हे प्रभो, कालचक्र के विषय में अब भी मेरे मन में एक ही संशय है। हे देव, जैसे मृत्यु के लक्षण होते हैं, वैसे मनुष्य की नियत आयु का प्रमाण या निश्चित संकेत क्या है?

Verse 5

तथा कथय मे नाथ यद्यहं तव वल्लभा । इति पृष्टस्तया देव्या प्रत्युवाच महेश्वरः

“तो हे नाथ, मुझे बताइए—यदि मैं सचमुच आपकी प्रिया हूँ।” देवी द्वारा ऐसा पूछे जाने पर महेश्वर ने उत्तर दिया।

Verse 6

ईश्वर उवाच । सत्यं ते कथयिष्यामि शास्त्रं सर्वोत्तमं प्रिये । येन शास्त्रेण देवेशि नरैः कालः प्रबुध्यते

ईश्वर बोले—हे प्रिये, मैं तुम्हें सत्य कहूँगा—यह सर्वोत्तम शास्त्र-उपदेश है। हे देवेशि, इस शास्त्र से मनुष्य काल (काळ) के तत्त्व को जानकर जाग्रत हो जाते हैं।

Verse 7

अहः पक्षं तथा मासमृतुं चायनवत्सरौ । स्थूलसूक्ष्मगतैश्चिह्नैर्बहिरंतर्गतैस्तथा

दिन, पक्ष, मास, ऋतु, अयन-क्रम और वर्ष—इन्हीं रूपों में काल जाना जाता है; और उसके स्थूल तथा सूक्ष्म, बाह्य और आन्तरिक—ऐसे लक्षणों से भी वह पहचाना जाता है।

Verse 8

तत्तेहं सम्प्रवक्ष्यामि शृणु तत्त्वेन सुन्दरि । लोकानामुपकारार्थं वैराग्यार्थमुमेऽधुना

हे सुन्दरी, अब मैं वह तत्त्व तुम्हें भलीभाँति कहूँगा; तत्त्व से सुनो। हे उमा, इस समय मैं लोक-उपकार और वैराग्य-जागरण के लिए कह रहा हूँ।

Verse 9

अकस्मात्पांडुरं देहमूर्द्ध्वरागं समंततः । तदा मृत्युं विजानीयात्षण्मासाभ्यन्तरे प्रिये

प्रिये, यदि किसी का शरीर अचानक पीला पड़ जाए और अस्वाभाविक ऊर्ध्ववर्णता चारों ओर फैलने लगे, तो समझना चाहिए कि छह मास के भीतर मृत्यु निकट है।

Verse 10

मुखं कर्णौ तथा चक्षुर्जिह्वास्तम्भो यदा भवेत् । तदा मृत्युं विजानीयात्षण्मासाभ्यन्तरे प्रिये

प्रिये, जब मुख, कान, आँखें और जिह्वा में जड़ता या क्रियाशक्ति का नाश हो जाए, तब समझना चाहिए कि छह मास के भीतर मृत्यु निकट है।

Verse 11

रौरवानुगतं भद्र ध्वनिं नाकर्णयेद्द्रुतम् । षण्मासाभ्यंतरे मृत्युर्ज्ञातव्यः कालवेदिभिः

हे भद्र, यदि किसी को अचानक रौरव-युक्त भयानक ध्वनि सुनाई दे, तो काल के लक्षण जानने वालों को समझना चाहिए कि छह मास के भीतर मृत्यु होने वाली है।

Verse 12

रविसोमाग्निसंयोगाद्यदोद्योतं न पश्यति । कृष्णं सर्वं समस्तं च षण्मासं जीवितं तथा

जब सूर्य, चन्द्र और अग्नि के अशुभ संयोग से अपेक्षित प्रकाश न दिखे और सब कुछ पूर्णतः कृष्ण-सा प्रतीत हो, तब ऐसी दशा में जीवन भी केवल छह मास का कहा गया है।

Verse 13

वामहस्तो यदा देवि सप्ताहं स्पंदते प्रिये । जीवितं तु तदा तस्य मासमेकं न संशयः

हे देवि, प्रिय! जब किसी का बायाँ हाथ सात दिन तक निरन्तर काँपता रहे, तब—हे प्रिये—उसका जीवन केवल एक मास ही शेष रहता है; इसमें संशय नहीं।

Verse 14

उन्मीलयति गात्राणि तालुकं शुष्यते यदा । जीवितं तु तदा तस्य मासमेकं न संशयः

जब उसके अंग विकल होकर फैलने लगें और तालु सूख जाए, तब उसका जीवन केवल एक मास ही शेष रहता है; इसमें संशय नहीं।

Verse 15

नासा तु स्रवते यस्य त्रिदोषे पक्षजीवितम् । वक्त्रं कंठं च शुष्येत षण्मासांते गतायुषः

जिसकी नासिका त्रिदोष-विकार से बहने लगे, उसका शेष जीवन पखवाड़ा कहा गया है। और यदि मुख तथा कण्ठ सूख जाएँ, तो समझना चाहिए कि छः मास के अन्त में उसकी आयु समाप्त हो जाती है।

Verse 16

स्थूलजिह्वा भवेद्यस्य द्विजाः क्लिद्यंति भामिनि । षण्मासाज्जायते मृत्युश्चिह्नैस्तैरुपलक्षयेत्

हे भामिनि! जिसकी जिह्वा स्थूल हो जाए और द्विज (विद्वान ब्राह्मण) शिथिल व क्षीण से प्रतीत हों, तो छः मास के भीतर मृत्यु होती है; इन चिह्नों से उसे पहचानना चाहिए।

Verse 17

अंबुतैलघृतस्थं तु दर्पणे वरवर्णिनि । न पश्यति यदात्मानं विकृतं पलमेव च

हे वरवर्णिनी! दर्पण पर जल, तेल या घी लगा हो तो मनुष्य अपना प्रतिबिम्ब ठीक से नहीं देख पाता; केवल विकृत और क्षणभंगुर रूप ही दिखता है।

Verse 18

षण्मासायुस्स विज्ञेयः कालचक्रं विजानता । अन्यच्च शृणु देवेशि येन मृत्युर्विबुद्ध्यते

जो कालचक्र को जानता है, उसे समझना चाहिए कि (यहाँ कहा गया) आयुष्य छह मास का है। और हे देवेशि, आगे भी सुनो—जिससे मृत्यु का सत्य स्पष्ट जाना जाता है।

Verse 19

शिरोहीनां यदा छायां स्वकीयामुपलक्षयेत् । अथवा छायया हीनं मासमेकं न जीवति

जब कोई अपनी ही छाया को सिर-रहित देखे, अथवा उसकी छाया ही लुप्त हो जाए, तो वह एक मास भी जीवित नहीं रहता।

Verse 20

आंगिकानि मयोक्तानि मृत्युचिह्नानि पार्वति । बाह्यस्थानि ब्रुवे भद्रे चिह्नानि शृणु सांप्रतम्

हे पार्वती, मैंने देहगत मृत्यु-चिह्न कह दिए हैं। अब हे भद्रे, बाह्य चिह्नों का वर्णन करता हूँ—इन लक्षणों को अभी सुनो।

Verse 21

रश्मिहीनं यदा देवि भवेत्सोमार्कमण्डलम् । दृश्यते पाटलाकारं मासार्दे्धेन विपद्यते

हे देवि, जब चन्द्र या सूर्य-मण्डल किरण-रहित हो जाए और फीके लालिमा-युक्त रूप में दिखे, तो यह अमंगल है—अर्धमास में विपत्ति आती है।

Verse 22

अरुंधती महायानमिंदुलक्षणवर्जितम् । अदृष्टतारको योऽसौ मासमेकं स जीवति

जो अरुन्धती नामक महान् दिव्य-चिह्न को देखे—जो चन्द्र-लक्षणों से रहित हो और जिसमें तारे न दिखें—वह एक मास और जीवित रहता है।

Verse 23

दृष्टे ग्रहे च दिङ्मोहः षण्मासाज्जायते ध्रुवम् । उतथ्यं न ध्रुवं पश्येद्यदि वा रविमण्डलम्

अशुभ रूप से ग्रह दिखे तो निश्चय ही छह मास तक दिशाभ्रम होता है। ध्रुवतारा न देखें और सूर्य-मण्डल की ओर भी दृष्टि न करें।

Verse 24

रात्रौ धनुर्यदापश्येन्मध्याह्ने चोल्कपातनम् । वेष्ट्यते गृध्रकाकैश्च षण्मासायुर्न संशयः

यदि रात्रि में इन्द्रधनुष दिखे, या मध्याह्न में उल्का गिरे, और गिद्ध-कौए चारों ओर घेर लें, तो आयु छह मास रह जाती है—इसमें संदेह नहीं।

Verse 25

ऋषयस्स्वर्गपंथाश्च दृश्यंते नैव चाम्बरे । षण्मासायुर्विजनीयात्पुरुषैः कालवेदिभिः

आकाश में न तो ऋषि दिखाई देते हैं, न स्वर्ग का पथ। इसलिए काल के ज्ञाता पुरुष जानें कि आयु केवल छह मास है।

Verse 26

अकस्माद्राहुणा ग्रस्तं सूर्यं वा सोममेव च । दिक्चक्रं भ्रांतवत्पश्येत्षण्मासान्म्रियते स्फुटम्

यदि अकस्मात् सूर्य या चन्द्रमा राहु से ग्रस्त-सा दिखे, और दिशाओं का चक्र भ्रमित-सा घूमता प्रतीत हो, तो वह स्पष्टतः छह मास में मरता है।

Verse 27

नीलाभिर्मक्षिकाभिश्च ह्यकस्माद्वेष्ट्यते पुमान् । मासमेकं हि तस्यायुर्ज्ञातव्यं परमार्थतः

यदि किसी पुरुष को अचानक नीली मक्खियाँ घेर लें, तो परम सत्य से जानो कि उसकी शेष आयु केवल एक मास ही है।

Verse 28

गृध्रः काकः कपोतश्च शिरश्चाक्रम्य तिष्ठति । शीघ्रं तु म्रियते जंतुर्मासैकेन न संशयः

यदि गिद्ध, कौआ या कबूतर सिर पर पाँव रखकर बैठ जाए, तो वह प्राणी शीघ्र मरता है—एक मास के भीतर, इसमें संशय नहीं।

Verse 29

एवं चारिष्टभेदस्तु बाह्यस्थः समुदाहृतः । मानुषाणां हितार्थाय संक्षेपेण वदाम्यहम्

इस प्रकार बाह्य रूप से प्रकट होने वाले अरिष्ट-भेद (अशुभ लक्षण) कहे गए। मनुष्यों के हित के लिए मैं उन्हें संक्षेप में बताता हूँ।

Verse 30

हस्तयोरुभयोर्देवि यथा कालं विजानते । वामदक्षिणयोर्मध्ये प्रत्यक्षं चेत्युदाहृतम्

हे देवी, जैसे दोनों हाथों को देखकर समय जाना जाता है, वैसे ही बाएँ और दाएँ के बीच जो प्रत्यक्ष दिखाई दे, वही ‘प्रत्यक्ष’ कहा गया है।

Verse 31

एवं पक्षौ स्थितौ द्वौ तु समासात्सुरसुंदरि । शुचिर्भूत्वा स्मरन्देवं सुस्नातस्संयतेन्द्रियः

इस प्रकार, हे देवसुंदरी, यथाकाल दोनों पक्ष बीत जाने पर वह शुद्ध हुआ, भली-भाँति स्नान किया, इंद्रियों को संयमित किया और देव का स्मरण करते हुए उसी में निरत रहा।

Verse 32

हस्तौ प्रक्षाल्य दुग्धेनालक्तकेन विमर्दयेत् । गंधैः पुष्पैः करौ कृत्वा मृगयेच्च शुभाशुभम्

दूध से हाथों को धोकर, अलक्तक (लाख-रंग) से उन्हें मर्दित करे; फिर गंध और पुष्पों से हाथों को सुसज्जित करके शुभ-अशुभ लक्षणों की परीक्षा करे।

Verse 33

कनिष्ठामादितः कृत्वा यावदंगुष्ठकं प्रिये । पर्वत्रयक्रमेणैव हस्तयोरुभयोरपि

हे प्रिये, कनिष्ठा से आरम्भ करके अंगूठे तक, तीन-तीन पर्वों (जोड़ों) के क्रम से—दोनों हाथों में ही—गणना करनी चाहिए।

Verse 34

प्रतिपदादिविन्यस्य तिथिं प्रतिपदादितः । संपुटाकारहस्तौ तु पूर्वदिङ्मुखसंस्थितः

प्रतिपदा से आरम्भ करके तिथि का विन्यास कर, प्रतिपदा से ही प्रारम्भ करे। हाथों को ‘संपुट’ मुद्रा में रखकर, पूर्व दिशा की ओर मुख करके स्थित रहे।

Verse 35

स्मरेन्नवात्मकं मंत्रं यावदष्टोत्तरं शतम् । निरीक्षयेत्ततो हस्तौ प्रतिपर्वणि यत्नतः

नवाक्षरी मंत्र का मन ही मन स्मरण एक सौ आठ बार तक करे। तत्पश्चात् दोनों हाथों को प्रत्येक पर्व (जोड़) पर यत्नपूर्वक देखे।

Verse 36

तस्मिन्पर्वणि सा रेखा दृश्यते भृंगसन्निभा । तत्तिथौ हि मृतिर्ज्ञेया कृष्णे शुक्ले तथा प्रिये

उस पर्व (संधि) पर वह रेखा भौंरे के समान दिखाई देती है। हे प्रिये, उसी तिथि में मृत्यु का संकेत जानना चाहिए—कृष्ण पक्ष हो या शुक्ल पक्ष।

Verse 37

अधुना नादजं वक्ष्ये संक्षेपात्काललक्षणम् । गमागमं विदित्वा तु कर्म कुर्याञ्छृणु प्रिये

अब मैं नाद से उत्पन्न काल-लक्षण संक्षेप में कहूँगा। उसके गमन-आगमन को जानकर फिर कर्म करे—हे प्रिये, सुनो।

Verse 38

आत्मविज्ञानं सुश्रोणि चारं ज्ञात्वा तु यत्नतः । क्षणं त्रुटिर्लवं चैव निमेषं काष्ठकालिकम्

हे सुश्रोणि! आत्म-विज्ञान की सच्ची गति को यत्नपूर्वक जानकर, क्षण, त्रुटि, लव, निमेष और काष्ठ आदि काल-मानों को भी समझना चाहिए।

Verse 39

मुहूर्तकं त्वहोरात्रं पक्षमासर्तुवत्सरम् । अब्दं युगं तथा कल्पं महाकल्पं तथैव च

(काल की गणना) मुहूर्त, अहोरात्र, पक्ष, मास, ऋतु और वर्ष से होती है; तथा अब्द, युग, कल्प और महाकल्प भी कहे गए हैं।

Verse 40

एवं स हरते कालः परिपाट्या सदाशिवः । वामदक्षिणमध्ये तु पथि त्रयमिदं स्मृतम्

इस प्रकार क्रम-क्रम से सदाशिव काल को आगे खींचते हैं; और मार्ग में वाम, दक्षिण तथा मध्य—यह त्रिविध गति स्मरण की गई है।

Verse 41

दिनानि पंच चारभ्य पंचविंशद्दिनावधि । वामाचारगतौ नादः प्रमाणं कथितं तव

पाँचवें दिन से लेकर पच्चीसवें दिन तक, साधना में वामाचार-गति से चलने पर जो नाद प्रकट होता है, वही तुम्हें प्रगति का प्रमाण और माप बताया गया है।

Verse 42

भूतरंध्रदिशश्चैव ध्वजश्च वरवर्णिनि । वामचारगतौ नादः प्रमाणं कालवेदिनः

हे सुन्दरवर्णिनी, भूत-रन्ध्रों से सूचित दिशा, ध्वज का संकेत, और वाममार्ग में चलते समय उठने वाला नाद—ये सब काल के विधान को जानने वालों के लिए प्रमाण माने जाते हैं।

Verse 43

ऋतोर्विकारभूताश्च गुणास्तत्रैव भामिनि । प्रमाणं दक्षिणं प्रोक्तं ज्ञातव्यं प्राणवेदिभिः

हे भामिनी, ऋतुओं के विकार से उत्पन्न गुण वहीं विद्यमान होते हैं। दक्षिण पक्ष को प्रमाण कहा गया है; प्राण-विज्ञान जानने वालों को इसे समझना चाहिए।

Verse 44

भूतसंख्या यदा प्राणान्वहंते च इडादयः । वर्षस्याभ्यंतरे तस्य जीवितं हि न संशयः

जब इड़ा आदि नाड़ियों में प्रवाहित प्राण ‘भूत-संख्या’ के माप तक ही चलते हैं, तब निःसंदेह उसका जीवन एक वर्ष के भीतर समाप्त हो जाता है।

Verse 45

दशघस्रप्रवाहेण ह्यब्दमानं स जीवति । पंचदशप्रवाहेण ह्यब्दमेकं गतायुषम्

दस प्रवाहों के माप से वह एक वर्ष जीता है; पर पंद्रह प्रवाहों के माप से एक वर्ष मानो बीत ही जाता है—आयु क्षीण हो जाती है।

Verse 46

विंशद्दिनप्रवाहेण षण्मासं लक्षयेत्तदा । पंचविंशद्दिनमितं वहते वामनाडिका

बीस दिनों के प्रवाह-मान से तब उसे छह मास मानना चाहिए। वाम-नाड़िका पच्चीस दिनों के परिमाण को वहन करती है—ऐसा कहा गया है।

Verse 47

जीवितं तु तदा तस्य त्रिमासं हि गतायुषः । षड्विंशद्दिनमानेन मासद्वयमुदाहृतम्

तब उस व्यक्ति का शेष जीवन—जिसकी आयु क्षीण हो चली थी—तीन मास कहा गया; और मास को छब्बीस दिन मानने पर वह दो मास के बराबर बताया गया।

Verse 48

सप्तविंशद्दिनमितं वहतेत्यतिविश्रमा । मासमेकं समाख्यातं जीवितं वामगोचरे

सत्ताईस दिनों की नियत अवधि तक उसे वहन करने पर वह अत्यन्त थक जाती है। वाम-गति (वामगोचर) में जीवन-काल एक मास कहा गया है।

Verse 49

एतत्प्रमाणं विज्ञेयं वामवायुप्रमाणतः । सव्येतरे दिनान्येव चत्वारश्चानुपूर्वशः

यह प्रमाण वाम-वायु के मान के अनुसार जानना चाहिए। दाहिने और दूसरे (वाम) पक्ष के दिन क्रमशः चार-चार होते हैं।

Verse 50

चतुस्स्थाने स्थिता देवि षोडशैताः प्रकीर्तिताः । तेषां प्रमाणं वक्ष्यामि साम्प्रतं हि यथार्थतः

हे देवी, चारों धामों में स्थित ये सोलह तत्त्व कहे गए हैं। अब मैं उनका यथार्थ प्रमाण और मान ठीक-ठीक बताता हूँ।

Verse 51

षड्दिनान्यादितः कृत्वा संख्यायाश्च यथाविधि । एतदंतर्गते चैव वामरंध्रे प्रकाशितम्

प्रथम से आरम्भ करके छह दिनों तक विधिपूर्वक गणना करने पर, जब यह साधना भीतर स्थिर हो जाती है, तब वह वाम-रन्ध्र में प्रकट होती है।

Verse 52

षड्दिनानि यदा रूढं द्विवर्षं च स जीवति । मासानष्टौ विजानीयाद्दिनान्यष्ट च तानि तु

जब यह गणित छह दिनों तक दृढ़ हो जाता है, तब वह दो वर्ष तक जीवित रहता है। इसे आठ मास समझो, और उन्हें आठ दिन भी जानो।

Verse 53

प्राणः सप्तदशे चैव विद्धि वर्षं न संशयः । सप्तमासान्विजानीयाद्दिनैः षड्भिर्न संशयः

निःसंदेह जानो कि सत्रह प्राण एक वर्ष के तुल्य माने गए हैं। इसी प्रकार निःसंदेह जानो कि सात मास छह दिनों के बराबर गिने जाते हैं।

Verse 54

अष्टघस्रप्रभेदेन द्विवर्षं हि स जीवति । चतुर्मासा हि विज्ञेयाश्चतुर्विंशद्दिनावधिः

‘अष्टघस्र’ नामक विभाग के अनुसार वह निश्चय ही दो वर्ष तक जीवित रहता है। जानो कि चार मास (प्रत्येक) चौबीस दिनों की अवधि के माने जाते हैं।

Verse 55

यदा नवदिनं प्राणा वहंत्येव त्रिमासकम् । मासद्वयं च द्वे मासे दिना द्वादश कीर्तिताः

जब प्राण नौ दिनों तक धारण किए जाते हैं, तब उसे तीन मास के तुल्य कहा गया है; और जब प्राण दो मास तक धारण हों, तब उसे बारह दिनों के तुल्य घोषित किया गया है।

Verse 56

पूर्ववत्कथिता ये तु कालं तेषां तु पूर्वकम् । अवांतरदिना ये तु तेन मासेन कथ्यते

जो काल-विभाग पहले बताए गए हैं, उन्हें यहाँ भी उसी पूर्व क्रम से समझना चाहिए; और जो गणना अवांतर (अधिक/मध्य) दिनों से होती है, वह उसी मास के अंतर्गत कही और गिनी जाती है।

Verse 57

एकादश प्रवाहेण वर्षमेकं स जीवति । मासा नव तथा प्रोक्ता दिनान्यष्टमितान्यपि

ग्यारह के प्रवाह (क्रम) से वह एक वर्ष तक जीवित रहता है; यह भी कहा गया है कि (यह माप) नौ मास और इसी प्रकार आठ दिन भी है।

Verse 58

द्वादशेन प्रवाहेण वर्षमेकं स जीवति । मासान् सप्त विजानीयात्षड्घस्रांश्चाप्युदाहरेत्

द्वादश प्रवाह के द्वारा वह एक वर्ष तक जीवित रहता है। आगे जानो कि इसे सात मास कहा गया है, और इसे छः हजार (गणना-एकक) भी कहा जाता है।

Verse 59

नाडी यदा च वहति त्रयोदशदिनावधि । सम्वत्सरं भवेत्तस्य चतुर्मासाः प्रकीर्तिताः

जब नाड़ी-प्रवाह तेरह दिनों तक चलता है, तब उसे उसका ‘संवत्सर’ कहा जाता है; और उसके चार मास (चातुर्मास्य) ऐसे ही बताए गए हैं।

Verse 60

चतुर्विशद्दिनं शेषं जीवितं च न संशयः । प्राणवाहा यदा वामे चतुर्द्दशदिनानि तु

निस्संदेह केवल बीस दिन का जीवन शेष रहता है; और जब प्राण-प्रवाह वाम नाड़ी में चले, तो वह चौदह दिन (शेष) का संकेत देता है।

Verse 61

सम्वत्सरं भवेत्तस्य मासाः षट् च प्रकीर्तिताः । चतुर्विंशद्दिनान्येव जीवितं च न संशयः

उसके लिए ‘संवत्सर’ केवल छह मास का हो जाता है; और उसका जीवन-काल मात्र चौबीस दिन कहा गया है—इसमें संदेह नहीं।

Verse 62

पंचदशप्रवाहेण नव मासान्स जीवति । चतुर्विशद्दिनान्येव कथितं कालवेदिभिः

पंद्रह के प्रवाह-मान से वह नौ मास तक जीवित रहता है; और शेष काल ठीक चौबीस दिन ही है—ऐसा काल-वेत्ताओं ने कहा है।

Verse 63

षोडशाहप्रवाहेण दशमासान्स जीवति । चतुर्विशद्दिनाधिक्यं कथितं कालवेदिभिः

षोडशाह-प्रवाह के अनुसार वह दस मास तक जीवित रहता है; और काल-वेत्ताओं ने चौबीस दिनों की अधिकता भी कही है।

Verse 64

सप्तदशप्रवाहेण नवमासैर्गतायुषम् । अष्टादशदिनान्यत्र कथितं साधकेश्वरि

हे साधकों की ईश्वरी! सत्रह प्रवाहों से आयु नौ मास तक प्रवाहित होती है—यहाँ आगे अठारह दिन भी कहे गए हैं।

Verse 65

वामचारं यदा देवि ह्यष्टादशदिनावधिः । जीवितं चाष्टमासं तु घस्रा द्वादश कीर्तिताः

हे देवी! जब वामाचार का अनुष्ठान किया जाता है, तो उसकी अवधि अठारह दिन कही गई है। जीवन-धारण का काल आठ मास बताया गया है और ‘घस्रा’ दिन बारह कहे गए हैं।

Verse 66

चतुर्विंशद्दिनान्यत्र निश्चयेनावधारय । प्राणवाहो यदा देवि त्रयोविंशद्दिनावधिः

हे देवी! यहाँ निश्चयपूर्वक जानो कि चक्र चौबीस दिनों का है; और जब प्राण-वाह का विचार किया जाता है, हे देवी, तो उसकी अवधि तेईस दिनों तक है।

Verse 67

चत्वारः कथिता मासाः षड्दिनानि तथोत्तरे । चतुर्विंशप्रवाहेण त्रीन्मासांश्च स जीवति

चार मास बताए गए हैं, और उसके बाद छह दिन। चौबीस प्रवाह की निरंतरता से वह आगे तीन मास और भी जीवित रहता है।

Verse 68

दिनान्यत्र दशाष्टौ च संहरंत्येव चारतः । अवांतरदिने यस्तु संक्षेपात्ते प्रकीर्तितः

यहाँ क्रम के अनुसार वे दिनों की अवधि को भी—दस और आठ—यथाविधि संकुचित कर देते हैं। पर जो मध्यवर्ती दिन है, वह तुम्हें केवल संक्षेप में कहा गया है।

Verse 69

वामचारः समाख्यातो दक्षिणं शृणु सांप्रतम् । अष्टाविंशप्रवाहेण तिथिमानेन जीवति

वामचार का वर्णन हो गया। अब इसी समय दक्षिण (दक्षिणाचार) सुनो। यह अट्ठाईस की धारा से चलता है और तिथियों के मान से नियत रहता है।

Verse 70

प्रवाहेण दशाहेन तत्संस्थेन विपद्यते । त्रिंशद्धस्रप्रवाहेन पञ्चाहेन विपद्यते

निरंतर प्रवाह से, उसी अवस्था में रहने पर, वह दस दिनों में नष्ट हो जाता है; और तीस हजार के प्रवाह से वह पाँच दिनों में नष्ट हो जाता है।

Verse 71

एकत्रिंशद्यदा देवि वहते च निरंतरम् । दिनत्रयं तदा तस्य जीवितं हि न संशयः

हे देवि, जब वह इकतीस (की मात्रा) में निरंतर प्रवाहित होता है, तब उसका जीवन केवल तीन दिन रह जाता है—इसमें संदेह नहीं।

Verse 72

द्वात्रिंशत्प्राणसंख्या च यदा हि वहते रविः । तदा तु जीवितं तस्य द्विदिनं हि न संशयः

जब रवि द्वात्रिंशत् प्राणों की संख्या वहन करता है, तब उस व्यक्ति का जीवन केवल दो दिन रह जाता है—इसमें संदेह नहीं।

Verse 73

दक्षिणः कथितः प्राणो मध्यस्थं कथयामि ते । एकभागगतो वायुप्रवाहो मुखमण्डले

दाहिनी ओर का प्रवाह ‘प्राण’ कहा गया है। अब मैं तुम्हें मध्य में स्थित प्रवाह बताता हूँ—मुख-मण्डल में वायु का प्रवाह एक ही धारा होकर चलता है।

Verse 74

धावमानप्रवाहेण दिनमेकं स जीवति । चक्रमे तत्परासोर्हि पुराविद्भिरुदाहृतम्

वेगवान प्रवाह में बहकर वह केवल एक दिन ही जीवित रहता है। सचमुच, जहाँ आयु कट जाती है, उस अवस्था को प्राचीन मुनियों ने ‘चक्र’ में प्रवेश कहा है।

Verse 75

एतत्ते कथितं देवि कालचक्रं गतायुषः । लोकानां च हितार्थाय किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि

हे देवी, आयु के अंत की ओर ले जाने वाले काल-चक्र का यह वर्णन मैंने तुम्हें कह दिया। लोकों के कल्याण हेतु भी मैंने इसे कहा है। अब तुम और क्या सुनना चाहती हो?

Frequently Asked Questions

A theological instruction-scene: Pārvatī, after learning worship and mantras, requests clarification on the wheel of time (kālacakra) and the evidences of lifespan and death; Śiva responds by authorizing kālajñāna as a ‘supreme śāstra’ meant for human benefit and spiritual detachment.

The chapter treats the body and time as readable texts: ‘gross/subtle’ and ‘outer/inner’ signs become a semiotic system through which kāla is discerned, converting mortality-awareness into a disciplined contemplative tool that generates vairāgya and urgency for practice.

Rather than a distinct iconographic form, Śiva is highlighted functionally as Īśvara/Parameśvara—the sovereign knower and regulator of kāla—while Umā/Pārvatī appears as the paradigmatic inquirer whose questions elicit systematic doctrine for the welfare of beings.