Adhyaya 19
Uma SamhitaAdhyaya 1944 Verses

Lokapramāṇa–Grahamaṇḍala–Dhruvaloka-vyavasthā (Cosmic Measures and the Arrangement of the Heavenly Spheres)

इस अध्याय में सनत्कुमार योजनादि मापों के सहारे ब्रह्माण्ड की रचना का तकनीकी वर्णन करते हैं। सूर्य और चन्द्र की किरणों की पहुँच से पृथ्वी-लोक का प्रमाण बताकर, पृथ्वी के ऊपर क्रमशः सूर्य और चन्द्र का स्थान निर्धारित किया जाता है। फिर चन्द्र के ऊपर ग्रह-मण्डल की व्यवस्था और दृश्य ग्रहों का क्रमबद्ध आरोहण कहा गया है। आगे सप्तर्षि-मण्डल और ध्रुवलोक का निरूपण कर ध्रुव को दिव्य चक्र का मेढ़ीभूत, धुरी-रूप आधार बताया गया है। अंत में भूर्-भुवः-स्वः त्रिलोकी का ध्रुव से संबंध, तथा महर्लोक आदि उच्च लोकों और सनकादि आद्य ऋषियों का संकेत देकर लोकों, प्राणियों और आध्यात्मिक पदों की क्रमिक श्रेणी प्रस्तुत की गई है।

Shlokas

Verse 1

सनत्कुमार उवाच । रविचन्द्रमसोर्यावन्मयूखा भासयंति हि । तावत्प्रमाणा पृथिवी भूलोकस्स तु गीयते

सनत्कुमार बोले—जितनी दूर तक सूर्य और चन्द्रमा की किरणें प्रकाश देती हैं, उतनी ही पृथ्वी की मर्यादा है; वही भूर्लोक कहलाता है।

Verse 2

भूमेर्योजनलक्षे तु संस्थितं रविमण्डलम् । योजनानां सहस्राणि सदैव परिसंख्यया

पृथ्वी से एक लाख योजन की दूरी पर सूर्य-मण्डल स्थित है; उसका विस्तार सदा हजारों योजन के परिमाण में गिना जाता है।

Verse 3

शशिनस्तु प्रमाणाय जगतः परिचक्षते । रवेरूर्ध्वं शशी तस्थौ लक्षयोजनसंख्यया

वे चन्द्रमा को जगत्-व्यवस्था के मापन का मानक कहते हैं; और चन्द्रमा सूर्य के ऊपर एक लाख योजन की गणना से स्थित बताया गया है।

Verse 4

ग्रहाणां मण्डलं कृत्स्नं शशेरुपरि संस्थितम् । सनक्षत्रं सहस्राणि दशैव परितोपरि

चन्द्रमा के ऊपर समस्त ग्रहों का मण्डल स्थित है; और उससे भी ऊपर चारों ओर नक्षत्रों का समुदाय—दस सहस्र—विराजमान है।

Verse 5

बुधस्तस्मादथो काव्यस्तस्माद्भौमस्य मण्डलम् । बृहस्पतिस्तदूर्ध्वं तु तस्योपरि शनैश्चरः

बुध के ऊपर शुक्र है; शुक्र के ऊपर भौम (मंगल) का मण्डल है। उसके ऊपर बृहस्पति, और बृहस्पति के ऊपर शनैश्चर स्थित है।

Verse 6

सप्तर्षिमण्डलं तस्माल्लक्षेणैकेन संस्थितम् । ऋषिभ्य तु सहस्राणां शतादूर्ध्वं ध्रुवः स्थितः

उस प्रदेश से एक लाख योजन की दूरी पर सप्तर्षि-मण्डल स्थित है। उन ऋषियों से एक लाख योजन ऊपर ध्रुव अचल धुरी-सा स्थिर रहता है।

Verse 7

मेढीभूतस्स यस्तस्य ज्योतिश्चक्रस्य वै ध्रुवः । भूर्भुवःस्वरिति ज्ञेयं भुव ऊर्ध्वं ध्रुवादवाक्

उस ज्योति-चक्र का जो मेढ़ी (धुरी-स्तम्भ) बना है, वही ध्रुव उसका स्थिर केन्द्र है। इसे भूः, भुवः, स्वः—ये तीन लोक समझना चाहिए; भुवः-लोक ध्रुव के नीचे भी और ऊपर भी व्यवस्थित है।

Verse 8

एकयोजनकोटिस्तु यत्र ते कल्पवासिनः । ध्रुवादूर्ध्वं महर्लोकस्सप्तैते ब्रह्मणस्सुताः

जहाँ एक करोड़ योजन का विस्तार है, वहाँ कल्प-पर्यन्त रहने वाले निवासी हैं। ध्रुव के ऊपर महर्लोक है; वहाँ ब्रह्मा के सात पुत्र निवास करते हैं।

Verse 9

सनकश्च सनन्दश्च तृतीयश्च सनातनः । कपिलश्चासुरिश्चैव वोढुः पंचशिखस्तथा

सनक, सनन्दन, तीसरे सनत्कुमार और सनातन; तथा कपिल और आसुरि; और वोढु तथा पंचशिख—ये सभी पूज्य ऋषि इस उपदेश में स्मरणीय हैं।

Verse 10

उपरिष्टात्ततश्शुक्रो द्विलक्षाभ्यंतरे स्थितः । द्विलक्षयोजनं तस्मादधः सोमसुतः स्मृतः

उसके ऊपर दो लाख (योजन) के भीतर शुक्र स्थित है। और उससे दो लाख योजन नीचे सोमपुत्र बुध (ग्रह) कहा गया है।

Verse 11

द्विलक्षयोजनं तस्मादूर्ध्वं भौमस्स्थितो मुने । द्विलक्षयोजनं तस्मादूर्ध्वं जीवः स्थितो गुरु

हे मुने, उससे दो लाख योजन ऊपर भौम (मंगल) स्थित है। और उससे दो लाख योजन ऊपर गुरु (बृहस्पति/जीव) निवास करता है।

Verse 12

द्विलक्षयोजनं जीवादूर्ध्वं सौरिर्व्यवस्थितः । एते सप्तग्रहाः प्रोक्तास्स्वस्वराशिव्यवस्थिता

जीव (बृहस्पति) से दो लाख योजन ऊपर सौरि (शनि) व्यवस्थित है। ये सात ग्रह कहे गए हैं, जो अपने-अपने राशि-भाग में स्थित हैं।

Verse 13

रुद्रलक्षैर्योजनतस्सप्तोर्ध्वमृषयः स्थिताः । विश्वलक्षैर्योजनतो ध्रुवस्थितिरुदाहृता

रुद्र-लक्ष (एक लाख) योजन की ऊँचाई पर ऊपर सात ऋषि स्थित हैं। और विश्व-लक्ष (दस लाख) योजन पर ध्रुव का स्थान कहा गया है।

Verse 14

चतुर्गुणोत्तरे चार्द्धे जनलोकात्तपः स्मृतम् । वैराजा यत्र देवा वै स्थिता दाहविवर्जिताः

जनलोक से चार गुना ऊँचे ऊर्ध्वार्ध में तपोलोक कहा गया है। वहाँ वैराज नामक देव स्थित हैं, जो दाह (ताप-पीड़ा) से रहित हैं।

Verse 15

षड्गुणेन तपोलोकात्सत्यलोको व्यवस्थितः । ब्रह्मलोकः स विज्ञेयो वसंत्यमलचेतसः

तपोलोक से छः गुणा उत्कृष्ट होकर सत्यलोक स्थित है। वही ब्रह्मलोक जानना चाहिए, जहाँ निर्मल-चित्त जन निवास करते हैं।

Verse 16

सत्यधर्मरताश्चैव ज्ञानिनो ब्रह्मचारिणः । यद्गामिनोऽथ भूलोकान्निवसंति हि मानवाः

भूलोक में वे मनुष्य निवास करते हैं जो सत्य और धर्म में रत हैं—ज्ञानी, ब्रह्मचर्य में स्थित—और जिनका जीवन उसी (उच्च) मार्ग-लक्ष्य की ओर गमन करता है।

Verse 17

भुवर्लोके तु संसिद्धा मुनयो देवरूपिणः । स्वर्गलोके सुरादित्या मरुतो वसवोऽश्विनौ

भुवर्लोक में देवस्वरूप सिद्ध मुनि निवास करते हैं। स्वर्गलोक में देवगण—आदित्य, मरुत, वसु तथा दोनों अश्विन—विराजते हैं।

Verse 18

विश्वेदेवास्तथा रुद्रास्साध्या नागाः खगादयः । नवग्रहास्ततस्तत्र ऋषयो वीतकल्मषाः

वहाँ विश्वेदेव, रुद्र, साध्य, नाग, खग आदि उपस्थित थे। वहाँ नवग्रह भी थे, और कल्मष-रहित ऋषिगण भी एकत्र खड़े थे।

Verse 19

इति श्रीशिवमहापुराणे पञ्चम्यामुमासंहितायां लोकवर्णनंनामैकोनविंशोऽध्यायः

इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के पंचम भाग—उमासंहिता—में “लोकवर्णन” नामक उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त होता है।

Verse 20

दधिवृक्षफलं यद्वद्वृत्तिश्चोर्ध्वमधस्तथा । एतदंडकटाहेन सर्वतो वै समावृतम्

जैसे दधिवृक्ष का फल गोल होता है और उसकी वक्रता ऊपर-नीचे तक फैली रहती है, वैसे ही यह (लोक-समूह) अंडरूपी कड़ाहे के आवरण से चारों ओर से पूर्णतः घिरा है।

Verse 21

दशगुणेन पयसा सर्वतस्तत्समावृतम् । वह्निना वायुना चापि नभसा तमसा तथा

वह (ब्रह्मांडीय विस्तार) दस गुना बढ़े हुए जल से चारों ओर से आवृत था; और उसी प्रकार अग्नि, वायु, आकाश तथा तम (अंधकार) से भी ढका हुआ था।

Verse 22

भूतादिनापि महता दिग्गुणोत्तरवेष्टितः । महांतं च समावृत्य प्रधानं पुरुषः स्थितः

भूतादि महान् तत्त्व से तथा दिशाओं के गुणों की उच्चतर आवरण-शक्ति से आवृत होकर, पुरुष महत् को भी ढाँककर, प्रधान (प्रकृति) पर स्थित रहता है।

Verse 23

अनंतस्य न तस्यास्ति संख्यापि परमात्मनः । तेनानंत इति ख्यातः प्रमाणं नास्ति वै यतः

उस परमात्मा की न कोई संख्या है, न कोई परिमाण। इसलिए वह ‘अनन्त’ कहलाता है, क्योंकि उसे मापने का कोई प्रमाण नहीं है।

Verse 24

हेतुभूतस्समस्तस्य प्रकृतिस्सा परा मुने । अंडानां तु सहस्राणां सहस्राण्ययुतानि च

हे मुने, वह परा प्रकृति समस्त जगत् की कारण-भूता है। उसी से अण्डों (ब्रह्माण्डों) के असंख्य समूह उत्पन्न होते हैं—हजारों-हजार और दस हजारों तक।

Verse 25

ईदृशानां प्रभूतानि तस्मादव्यक्तजन्मनः । दारुण्यग्निस्तिले तैलं पयस्सु च यथा घृतम्

अव्यक्त-उद्गम वाले उस परम तत्त्व से असंख्य प्रकट रूप उत्पन्न होते हैं—जैसे काष्ठ में अग्नि, तिल में तेल और दूध में घी अंतर्निहित रहता है।

Verse 26

तथासौ परमात्मा वै सर्वं व्याप्यात्मवेदनः । आदिबीजात्प्रसुवते ततस्तेभ्यः परेण्डजाः

इस प्रकार वह परमात्मा—स्वप्रकाश चैतन्य-स्वरूप—सबमें व्याप्त है। आदिबीज से वह सृष्टि को उत्पन्न करता है, और उनसे आगे उच्च अण्डज प्राणी प्रकट होते हैं।

Verse 27

तेभ्यः पुत्रास्तथान्येषां बीजान्यन्यानि वै ततः । महदादयो विशेषांतास्तद्भवंति सुरादयः

उनसे पुत्र उत्पन्न हुए; और फिर अन्य से अन्य बीज-तत्त्व भी उत्पन्न हुए। उसी स्रोत से महत् आदि से लेकर विशेष (तन्मात्रा/भूत-विशेष) तक के विकार, तथा देवगण आदि प्राणी प्रकट होते हैं।

Verse 28

बीजाद्वृक्षप्ररोहेण यथा नापचयस्तरोः । सूर्य्यकांतमणेः सूर्य्याद्यद्वद्वह्निः प्रजायते

जैसे बीज से अंकुर निकलने पर वृक्ष का क्षय नहीं होता, और जैसे सूर्यकान्त मणि से सूर्यकिरणों द्वारा अग्नि उत्पन्न होती है; वैसे ही परमेश्वर से प्रकट होने वाली सृष्टि से भगवान् शिव का कुछ भी ह्रास नहीं होता।

Verse 29

तद्वत्संजायते सृष्टिः शिवस्तत्रः न कामयेत् । शिवशक्तिसमायोगे देवाद्याः प्रभवंति हि

उसी प्रकार सृष्टि उत्पन्न होती है; शिव अकेले उससे इच्छा नहीं करते। शिव-शक्ति के संयोग से ही देव आदि समस्त प्राणी वास्तव में प्रकट होते हैं।

Verse 30

तथा स्वकर्मणैकेन प्ररोहमुपयांति वै । ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्राश्च स शिवः परिगीयते

उसी प्रकार अपने एक ही स्वकर्म से वे अपने-अपने कार्य में प्रवृत्त होते हैं—ब्रह्मा, विष्णु और रुद्रगण; और वही शिव कहलाते हैं।

Verse 31

तस्मादुद्धरते सर्वं यस्मिंश्च लयमेष्यति । कर्ता क्रियाणां सर्वासां स शिवः परिगीयते

इसलिए वही है जिससे यह सब प्रकट होता है और जिसमें अंततः लीन हो जाता है। समस्त क्रियाओं के कर्ता के रूप में वही प्रभु शिव कहलाते हैं।

Verse 32

व्यास उवाच । सनत्कुमार सर्वज्ञ छिंधि मे संशयं महत् । सन्ति लोका हि ब्रह्मांडादुपरिष्टान्न वा मुने

व्यास बोले—हे सनत्कुमार, हे सर्वज्ञ! मेरे महान् संशय को काट दीजिए। हे मुनि, क्या ब्रह्माण्ड-रूपी अण्ड के ऊपर भी लोक हैं, या नहीं?

Verse 33

सनत्कुमार उवाच । ब्रह्मांडादुपरिष्टाच्च संति लोका मुनीश्वर । ताञ्छृणु त्वं विशेषेण वच्मि तेऽहं समागतः

सनत्कुमार बोले—हे मुनीश्वर, ब्रह्माण्ड के ऊपर भी लोक निश्चय ही हैं। उन्हें विशेष रूप से सुनिए; मैं आपको बताने के लिए ही यहाँ आया हूँ।

Verse 34

विधिलोकात्परो लोको वैकुंठ इति विश्रुतः । विराजते महादीप्त्या यत्र विष्णुः प्रतिष्ठितः

विधि-लोक (ब्रह्मा के लोक) के परे वैकुण्ठ नामक लोक प्रसिद्ध है। वह महान् तेज से प्रकाशित है, जहाँ भगवान् विष्णु प्रतिष्ठित हैं।

Verse 35

तस्योपरिष्टात्कौमारो लोको हि परमाद्भुतः । सेनानीः शंभुतनयो राजते यत्र सुप्रभः

उसके ऊपर कौमार लोक है, जो परम अद्भुत है। वहाँ देवसेना के सेनापति, शंभु-पुत्र स्कन्द, अत्यन्त प्रभामय होकर विराजते हैं।

Verse 36

ततः परमुमालोको महादिव्यो विरा जते । यत्र शक्तिर्विभात्येका त्रिदेवजननी शिवा

फिर उसके परे उमा-लोक है, जो अत्यन्त दिव्य होकर प्रकाशित है। वहाँ एकमात्र शक्ति ही दीप्त है—शिवा, जो त्रिदेवों की जननी, कल्याणी माता हैं।

Verse 37

परात्परा हि प्रकृती रजस्सत्त्वतमोमयी । निर्गुणा च स्वयं देवी निर्विकारा शिवात्मिका

प्रकृति परात्परा है, रज, सत्त्व और तम से युक्त; तथापि वही देवी अपने स्वरूप में निर्गुण, निर्विकार और शिवस्वरूपा है।

Verse 38

तस्योपरिष्टाद्विज्ञेयश्शिवलोकस्सनातनः । अविनाशी महादिव्यो महाशोभान्वितस्सदा

उसके ऊपर सनातन शिवलोक जानना चाहिए—वह अविनाशी, परम दिव्य और सदा महान् शोभा से युक्त है।

Verse 39

विराजते परं ब्रह्म यत्र शंभुर्महेश्वरः । त्रिदेवजनकस्वामी सर्वेषां त्रिगुणात्परः

जहाँ परम ब्रह्म विराजमान है—वही शम्भु महेश्वर हैं। वे त्रिदेवों के जनक-स्वामी हैं और सबके लिए त्रिगुणों से परे हैं।

Verse 40

तत ऊर्ध्वं न लोकाश्च गोलोकस्तत्समीपतः । गोमातरस्सुशीलाख्यास्तत्र संति शिवप्रिया

उसके ऊपर फिर कोई लोक नहीं; उसके निकट ही गोलोक है। वहाँ ‘सुशीला’ नाम की गोमाताएँ निवास करती हैं, जो शिव को अत्यन्त प्रिय हैं।

Verse 41

तत्पालः कृष्णनामा हि राजते शंकराज्ञया । प्रतिष्ठितश्शिवेनैव शक्त्या स्वच्छन्दचारिणा

उसका पालक ‘कृष्ण’ नाम से प्रसिद्ध है; वह शंकर की आज्ञा से दीप्तिमान है। स्वयं शिव ने अपनी स्वच्छन्द-चरिणी शक्ति द्वारा उसे प्रतिष्ठित किया है।

Verse 42

शिवलोकोऽद्भुतो व्यास निराधारो मनोहरः । अतिनिर्वचनीयश्च नानावस्तुविराजितः

हे व्यास! शिवलोक अद्भुत है—स्वयंसिद्ध, निराधार और परम मनोहर। वह वाणी से पूर्णतः अवर्णनीय है तथा नाना दिव्य तत्त्वों से विराजमान है।

Verse 43

शिवस्तु तदधिष्ठाता सर्वदेवशिरोमणिः । विष्णुब्रह्महरैस्सेव्यः परमात्मा निरञ्जनः

वह (परम तत्त्व) का अधिष्ठाता स्वयं शिव है—समस्त देवों का शिरोमणि। विष्णु, ब्रह्मा आदि भी जिनकी आराधना करते हैं; वे निर्मल परमात्मा हैं।

Verse 44

इति ते कथिता तात सर्वब्रह्मांडसंस्थितिः । तदूर्ध्वं लोकसंस्थानं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि

हे तात! इस प्रकार मैंने तुम्हें समस्त ब्रह्माण्डों की सम्पूर्ण व्यवस्था कह दी। अब उसके ऊपर लोकों की स्थिति के विषय में—और क्या सुनना चाहते हो?

Frequently Asked Questions

Rather than a narrative leelā, the chapter advances an authoritative cosmographic argument: the universe is intelligible as a vertically ordered system of spheres and lokas, quantified in yojanas and anchored by Dhruva as the stabilizing pivot of the celestial wheel.

Dhruva’s portrayal as meḍhībhūta (axle/pivot) functions symbolically as the principle of unwavering stability (dhruvatā): cosmic order depends on a fixed axis, mirroring the yogic ideal of a steady mind around which sensory and mental ‘orbits’ are regulated.

No specific Śiva-svarūpa or Gaurī-svarūpa is foregrounded in the sampled material; the chapter’s emphasis is cosmological architecture and hierarchy, serving as contextual knowledge that supports broader Shaiva theological and soteriological framing in the Umāsaṃhitā.