
इस अध्याय में नन्दीश्वर सनत्कुमार से कहते हैं कि शंकर-चरित रुद्र ने ब्रह्मा को प्राणियों के नित्य कल्याण हेतु प्रेमपूर्वक सुनाया था। फिर स्वयं शिव अपनी वाणी में पुराणकाल का निर्धारण करते हैं—सातवें वाराह कल्प, निर्दिष्ट मन्वन्तर और युग-क्रम के संदर्भ सहित। द्वापर के अंत में लोकानुग्रह और विशेषतः ब्राह्मण-हित के लिए उनके प्राकट्य का वर्णन है तथा कलियुग की स्थितियों का संकेत भी मिलता है। आगे भविष्यवाणी आती है कि हिमालय में चागल शिखर पर शिव ‘श्वेत’ नामक महा-मुनि रूप में प्रकट होंगे; शिखाधारी ‘श्वेत’ उपाधि वाले शिष्य—श्वेत, श्वेतशिख, श्वेताश्व, श्वेतलोहित—ध्यान-योग का अभ्यास करेंगे और शिवधाम को प्राप्त होंगे। अंत में फल कहा गया है कि अविनाशी शिव को परम तत्त्व जानने से परब्रह्म-समाधि होती है और जन्म-मृत्यु-जरा से परे अवस्था प्राप्त होती है।
Verse 1
नन्दीश्वर उवाच । सनत्कुमार सर्वज्ञ चरितं शांकरं मुदा । रुद्रेण कथितं प्रीत्या ब्रह्मणे सुखदं सदा
नन्दीश्वर बोले—हे सर्वज्ञ सनत्कुमार! मैं आनंदपूर्वक शंकर-चरित का वर्णन करूँगा, जिसे रुद्र ने प्रेम से ब्रह्मा से कहा था और जो सदा सुखदायक है।
Verse 2
शिव उवाच । सप्तमे चैव वाराहे कल्पे मन्वन्तराभिधे । कल्पेश्वरोऽथ भगवान्सर्वं लोकप्रकाशनः
शिव ने कहा: सातवें वाराह-कल्प में, मन्वन्तर नामक काल में, कल्पेश्वर भगवान—जो समस्त लोकों को प्रकाशित करने वाले हैं—तब प्रकट हुए।
Verse 3
मर्नोर्वैवस्वतस्यैव ते प्रपुत्रो भविष्यति । तदा चतुर्युगाश्चैव तस्मिन्मन्वन्तरे विधे
हे विधे! तुम वैवस्वत मनु के प्रपौत्र बनोगे; और उसी मन्वन्तर में चारों युगों का चक्र यथाक्रम प्रवर्तित होगा।
Verse 4
अनुग्रहार्थं लोकानां ब्राह्मणानां हिताय च । उत्पश्यामि विधे ब्रह्मन्द्वापराख्ययुगान्तिके
लोकों पर अनुग्रह करने और ब्राह्मणों के हित के लिए, हे विधे, हे ब्रह्मन्! मैं द्वापर नामक युग के अंत के निकट स्वयं प्रकट होता हूँ।
Verse 5
युगप्रवृत्त्या च तदा तस्मिंश्च प्रथमे युगे । द्वापरे प्रथमे ब्रह्मन्यदा व्यासः स्वयंप्रभुः
युग-प्रवृत्ति के साथ तब उसी प्रथम युग में, और फिर हे ब्रह्मन्! द्वापर के आरम्भ में भी, स्वयंप्रभु व्यास अपनी दिव्य शक्ति से प्रकट हुए।
Verse 6
तदाहं ब्राह्मणार्थाय कलौ तस्मिन्युगान्तिके । भविष्यामि शिवायुक्तः श्वेतो नाम महामुनिः
अतः ब्राह्मणों के कल्याण हेतु, कलियुग के उस युगान्त-संधि में, मैं शिव से युक्त होकर ‘श्वेत’ नामक महामुनि के रूप में प्रकट होऊँगा।
Verse 7
हिमवच्छिखरे रम्ये छागले पर्वतोत्तमे । तदा शिष्याः शिखायुक्ता भविष्यन्ति विधे मम
हिमवत के रमणीय शिखर पर, ‘छागल’ नामक उस श्रेष्ठ पर्वत में, तब—हे विधाता—मेरे शिष्य शिखा (चोटी) धारण करने वाले होंगे।
Verse 8
श्वेतः श्वेतशिखश्चैव श्वेताश्वः श्वेतलोहितः । चत्वारो ध्यानयोगात्ते गमिष्यन्ति पुरं मम
श्वेत, श्वेतशिख, श्वेताश्व और श्वेतलोहित—ये चारों ध्यान-योग के अनुशासन से मेरे ही पुर (दिव्य धाम) को प्राप्त होंगे।
Verse 9
ततो भक्ता भविष्यन्ति ज्ञात्वा मां तत्त्वतोऽव्ययम् । जन्ममृत्युजराहीनाः परब्रह्मसमाधयः
तत्पश्चात् मुझे तत्त्वतः अव्यय सत्य रूप में जानकर वे भक्त बनेंगे। जन्म-मृत्यु-जरारहित होकर वे परब्रह्म—शिव, मुक्तिदाता पति—में समाधिस्थ रहेंगे।
Verse 10
द्रष्टुं शक्यो नरैर्नाहमृते ध्यानात्पितामह । दानधर्मादिभिर्वत्स साधनैः कर्महेतुभिः
हे पितामह! ध्यान के बिना मनुष्य मुझे देख नहीं सकते। वत्स, दान-धर्म आदि कर्म-हेतु साधनों से मेरा साक्षात् दर्शन नहीं होता।
Verse 11
द्वितीये द्वापरे व्यासः सत्यो नाम प्रजापतिः । यदा तदा भविष्यामि सुतारो नामतः कलौ
दूसरे द्वापर में व्यास प्रजापति ‘सत्य’ नाम से होंगे। और कलियुग में जब-जब अवसर होगा, मैं ‘सुतार’ नाम से सूत रूप में प्रकट होऊँगा।
Verse 12
तत्रापि मे भविष्यन्ति शिष्या वेदविदो द्विजाः । दुन्दुभिः शतरूपश्च हृषीकः केतुमांस्तथा
वहाँ भी मेरे शिष्य होंगे—वेदों के ज्ञाता द्विज: दुन्दुभि, शतरूप, हृषीक और केतुमान भी।
Verse 13
चत्वारो ध्यानयोगात्ते गमिष्यन्ति पुरं मम । ततो मुक्ता भविष्यन्ति ज्ञात्वा मां तत्त्वतोऽव्ययम्
वे चारों ध्यान-योग के अनुशासन से मेरे दिव्य पुर में पहुँचेंगे। फिर मुझे तत्त्वतः अविनाशी परम तत्त्व जानकर मुक्त हो जाएँगे।
Verse 14
तृतीये द्वापरे चैव यदा व्यासस्तु भार्गवः । तदाप्यहं भविष्यामि दमनस्तु पुरान्तिके
तीसरे द्वापर में जब व्यास भार्गव होंगे, तब मैं भी प्रकट होऊँगा—नगर की सीमा के निकट ‘दमन’ रूप में।
Verse 15
तत्रापि च भविष्यन्ति चत्वारो मम पुत्रकाः । विशोकश्च विशेषश्च विपापः पापनाशनः
वहाँ भी मेरे चार पुत्र उत्पन्न होंगे—विशोक, विशेष, विपाप और पापनाशन—जो शोक-रहित, विशिष्ट स्वभाव वाले और पाप का नाश करने वाले हैं।
Verse 16
शिष्यैः साहाय्यं व्यासस्य करिष्ये चतुरानन । निवृत्तिमार्गं सुदृढं वर्त्तयिष्ये कलाविह
हे चतुरानन ब्रह्मा, मैं अपने शिष्यों सहित व्यास की सहायता करूँगा और इस कलियुग में निवृत्तिमार्ग को दृढ़तापूर्वक सर्वत्र प्रवर्तित करूँगा।
Verse 17
चतुर्थे द्वापरे चैव यदा व्यासोंऽगिराः स्मृतः । तदाप्यहं भविष्यामि सुहोत्रो नाम नामतः
चौथे द्वापर में भी, जब व्यास ‘आङ्गिरस’ नाम से स्मरण किए जाएँगे, तब मैं भी ‘सुहोत्र’ नाम से प्रकट होऊँगा।
Verse 18
तत्रापि मम ते पुत्राश्चत्वारो योगसाधकाः । भविष्यंति महात्मानस्तन्नामानि ब्रुवे विधे
विधे (ब्रह्मा), वहाँ भी तुम्हारे चार पुत्र—योग-साधना में रत महात्मा—उत्पन्न होंगे। अब मैं उनके नाम तुम्हें बताता हूँ।
Verse 19
सुमुखो दुर्मुखश्चैव दुदर्भो दुरतिक्रमः । शिष्यैः साहाय्यं व्यासस्य करिष्येऽहं तदा विधे
सुमुख, दुर्मुख, दुदर्भ और दुरतिक्रम—मेरे शिष्यों सहित—उस समय व्यास को सहायता देंगे, हे विधे।
Verse 20
पञ्चमे द्वापरे चैव व्यासस्तु सविता स्मृतः । तदा योगी भविष्यामि कंको नाम महातपाः
पाँचवें द्वापर में व्यास ‘सविता’ नाम से प्रसिद्ध होंगे। तब मैं ‘कंक’ नामक महातपस्वी योगी बनूँगा।
Verse 21
तत्रापि मम ते पुत्राश्चत्वारो योगसाधकाः । भविष्यन्ति महात्मानस्तन्नामानि शृणुष्व मे
वहाँ भी मेरे चार पुत्र तुम्हारे यहाँ उत्पन्न होंगे— योग-साधना में सिद्ध, महात्मा। अब मुझसे उनके नाम सुनो।
Verse 22
सनकः सनातनश्चैव प्रभुर्यश्च सनन्दनः । विभुः सनत्कुमारश्च निर्मलो निरहंकृतिः
सनक, सनातन, प्रभु और सनन्दन; तथा विभु और सनत्कुमार— ये निर्मल, अहंकार-रहित महर्षि शिव के परम भक्त और शिव-तत्त्व के ज्ञाता हैं।
Verse 23
तत्रापि कंकनामाहं साहाय्यं सवितुर्विधे । व्यासस्य हि करिष्यामि निवृत्तिपथवर्द्धकः
वहाँ भी मैं ‘कंकन’ नाम से, सूर्य-सदृश सृष्टिकर्ता विधाता (ब्रह्मा) की सहायता करूँगा। और व्यास के लिए निवृत्ति-मार्ग को बढ़ाने वाला बनकर कार्य करूँगा।
Verse 24
परिवर्ते पुनः षष्ठे द्वापरे लोककारकः । कर्ता वेदविभागस्य मृत्युर्व्यासो भविष्यति
फिर छठे परिवर्तन में, द्वापर युग में, लोक-कारक (जगत्-सृष्टा) ‘मृत्यु-व्यास’ के रूप में प्रकट होगा, जो प्राणियों के हित हेतु वेदों का विभाग करेगा।
Verse 25
तदाऽप्यहं भविष्यामि लोकाक्षिर्नाम नामतः । व्यासस्य सुसाहा य्यार्थं निवृत्तिपथवर्द्धनः
तब भी मैं ‘लोकाक्षि’ नाम से प्रकट होऊँगा। व्यास की उत्तम सहायता के लिए मैं निवृत्ति-मार्ग को बढ़ाने वाला बनूँगा।
Verse 26
तत्रापि शिष्याश्चत्वारो भविष्यन्ति दृढव्रताः । सुधामा विरजाश्चैव संजयो विजयस्तथा
वहाँ भी दृढ़व्रती चार शिष्य होंगे—सुधामा, विरजा, संजय और तथा विजय।
Verse 27
सप्तमे परिवर्ते तु यदा व्यासः शतक्रतुः । तदाप्यहं भविष्यामि जैगीषव्यो विभुर्विधे
हे विभु विधे (ब्रह्मा)! सातवें परिवर्तन-चक्र में जब व्यास शतक्रतु (इन्द्र) होंगे, तब मैं भी जैगीषव्य नाम से प्रकट होऊँगा, ताकि धर्म-व्यवस्था स्थिर रहे।
Verse 28
योगं संद्रढयिष्यामि महायोगविचक्षणः । काश्यां गुहान्तरे संस्थो दिव्यदेशे कुशास्तरिः
महायोग में निपुण मैं अब अपने योग को दृढ़ और अचल करूँगा। काशी के दिव्य प्रदेश में एक गुहा के भीतर, पवित्र कुशासन पर स्थित रहूँगा।
Verse 29
साहाय्यं च करिष्यामि व्यासस्य हि शतक्रतोः । उद्धरिष्यामि भक्तांश्च संसारभयतो विधे
मैं व्यास और शतक्रतु (इन्द्र) की सहायता करूँगा। और हे विधि (ब्रह्मा), मैं अपने भक्तों को भी संसार-भय से उबार दूँगा।
Verse 30
तत्रापि मम चत्वारो भविष्यन्ति सुता युगे । सारस्वतश्च योगीशो मेघवाहः सुवाहनः
उस युग में वहाँ भी मेरे चार पुत्र होंगे—सारस्वत, योगीश, मेघवाह और सुवाहन।
Verse 31
अष्टमे परिवर्ते हि वसिष्ठो मुनिसत्तमः । कर्त्ता वेदविभागस्य वेदव्यासो भविष्यति
निश्चय ही आठवें परिवर्त में मुनियों में श्रेष्ठ वसिष्ठ वेदों के विभागकर्ता, वेदव्यास बनेंगे।
Verse 32
तत्राप्यहं भविष्यामि नामतो दधिवाहनः । व्यासस्य हि करिष्यामि साहाय्यं योगवित्तम
वहीं मैं भी ‘दधिवाहन’ नाम से प्रकट होऊँगा और योग के ज्ञाता व्यास के कार्य में निश्चय ही सहायता करूँगा।
Verse 33
कपिलश्चासुरिः पञ्चशिखः शाल्वलपूर्वकः । चत्वारो योगिनः पुत्रा भविष्यन्ति समा मम
कपिल, आसुरि, पंचशिख और शाल्वल—ये चारों मेरे पुत्र होंगे; योगी होकर साधना-सिद्धि में मेरे समान होंगे।
Verse 34
नवमे परिवर्ते तु तस्मिन्नेव युगे विधे । भविष्यति मुनिश्रेष्ठो व्यासः सारस्वताह्वयः
हे विधाता (ब्रह्मा), उसी युग में, नवम परिवर्तन-चक्र में, मुनियों में श्रेष्ठ व्यास प्रकट होंगे, जो ‘सारस्वत’ नाम से प्रसिद्ध होंगे।
Verse 35
व्यासस्य ध्यायतस्तस्य निवृत्तिपथवृद्धये । तदाप्यहं भविष्यामि ऋषभो नामतः स्मृतः
व्यास के ध्यानरत होने पर, उनके निवृत्ति-मार्ग की वृद्धि हेतु, उसी समय मैं भी प्रकट होऊँगा—‘ऋषभ’ नाम से स्मरण किया जाऊँगा।
Verse 36
पराशरश्च गर्गश्च भार्गवो गिरिशस्तथा । चत्वारस्तत्र शिष्या मे भविष्यन्ति सुयोगिनः
पराशर, गर्ग, भार्गव और गिरिश—ये चार वहाँ मेरे शिष्य होंगे, सिद्ध योगी॥
Verse 37
तैः साकं द्रढयिष्यामि योगमार्गं प्रजापते । करिष्यामि साहाय्यं वै वेदव्यासस्य सन्मुने
उनके साथ, हे प्रजापति, मैं योगमार्ग को दृढ़ करूँगा; और हे सत्पुरुष मुनि, मैं वेदव्यास को निश्चय ही सहायता दूँगा॥
Verse 38
तेन रूपेण भक्तानां बहूनां दुःखिनां विधे । उद्धारं भवतोऽहं वै करिष्यामि दयाकरः
हे विधे (ब्रह्मा), उसी रूप में मैं अनेक दुःखी भक्तों का उद्धार अवश्य करूँगा; क्योंकि मैं स्वभाव से दयालु हूँ।
Verse 39
सोऽवतारो विधे मे हि ऋषभाख्यस्सुयोगकृत् । सारस्वतव्यासमनः कर्त्ता नानोतिकारकः
हे विधे (ब्रह्मा), मेरा वह अवतार ‘ऋषभ’ नाम से प्रसिद्ध है, जो परम योग-नियम की स्थापना करता है। वह सारस्वत-व्यासन परम्परा का कर्ता है; उसका मन स्थिर है और वह किसी भी प्रकार के अनर्थ या अतिक्रमण का कर्ता नहीं।
Verse 40
अवतारेण मे येन भद्रायुर्नृपबालकः । जीवितो हि मृतः क्ष्वेडदोषतो जनकोज्झितः
मेरे उसी अवतार के द्वारा राजकुमार बालक भद्रायु—जो विष-दोष से मानो मृतप्राय हो गया था और अपने पिता द्वारा त्याग दिया गया था—वास्तव में पुनः जीवित किया गया।
Verse 41
प्राप्तेऽथ षोडशे वर्षे तस्य राजशिशोः पुनः । ययौ तद्वेश्म सहसा ऋषभः स मदात्मकः
जब वह राजकुमार सोलहवें वर्ष को पहुँचा, तब मद और आसक्ति से भरा ऋषभ अचानक फिर उस निवास-स्थान पर जा पहुँचा।
Verse 42
पूजितस्तेन स मुनिः सद्रूपश्च कृपानिधिः । उपादिदेश तद्धर्मान्राज्ययोगान्प्रजापते
उसके द्वारा पूजित वह मुनि—सद्रूप और करुणा-निधि—तब प्रजापति को उन्हीं धर्मों तथा धर्मयुक्त राजयोग (राज्य-नीति) का उपदेश देने लगे।
Verse 43
ततः स कवचं दिव्यं शंखं खङ्गं च भास्वरम् । ददौ तस्मै प्रसन्नात्मा सर्वशत्रुविनाशनम्
तब प्रसन्नचित्त होकर उसने उसे दिव्य कवच, शंख और तेजस्वी खड्ग प्रदान किया—जो समस्त शत्रुओं का विनाश करने वाले थे।
Verse 44
तदङ्ग भस्मनामृश्य कृपया दीनवत्सलः । स द्वादशसहस्रस्य गजानां च बलं ददौ
फिर दीनों पर दया करने वाले उस प्रभु ने कृपा से उसके अंगों पर भस्म का स्पर्श किया और उसे बारह हजार हाथियों के समान बल प्रदान किया।
Verse 45
इति भद्रायुषं सम्यगनुश्वास्य समातृकम् । ययौ स्वैरगतस्तस्यां पूजितस्त्वृषभः प्रभुः
इस प्रकार भद्रायुṣ को उसकी माता सहित भलीभाँति सांत्वना देकर, वहाँ पूजित प्रभु वृषभ अपने स्वेच्छा-मार्ग से प्रस्थान कर गए।
Verse 46
भद्रायुरपि राजर्षिर्जित्वा रिपुगणान्विधे । राज्यं चकार धर्मेण विवाह्य कीर्त्तिमालिनीम्
हे विधि (ब्रह्मा)! राजर्षि भद्रायु ने भी शत्रुओं के समूहों को जीतकर, कीर्तिमालिनी से विवाह करके, धर्मपूर्वक राज्य किया।
Verse 47
इत्थं प्रभावं ऋषभोऽवतारः शङ्करस्य मे । सतां गतिर्दीनबन्धुर्नवमः कथितस्तव
इस प्रकार मैंने तुम्हें शंकर के ऋषभ-अवतार का प्रभाव कहा है—जो सत्पुरुषों की गति और दीनों का बन्धु है—और जिसे नवम अवतार कहा गया है।
Verse 48
ऋषभस्य चरित्रं हि परमं पावनं महत् । स्वर्ग्यं यशस्यमायुष्यं श्रोतव्यं च प्रयत्नतः
ऋषभ का यह परम पावन और महान चरित्र स्वर्ग्य पुण्य, यश और आयु बढ़ाने वाला है; इसलिए इसे प्रयत्नपूर्वक श्रद्धा से सुनना चाहिए।
The chapter advances a theological argument via prophetic narrative: Śiva intentionally manifests in a future yuga-context (near Dvāpara’s end / into Kali conditions) as the muni Śveta, to benefit the world and sustain brāhmaṇic tradition—demonstrating that divine descent functions as pedagogical grace rather than mere mythic spectacle.
The repeated “Śveta-” naming and the emphasis on śikhā and Himalayan locale encode purity, ascetic discipline, and lineage-markers of Vedic transmission; together they signal that liberation here is mediated by disciplined dhyāna-yoga and correct tattva-jñāna, not by external power alone.
Śiva is highlighted in a sage-form (muni-rūpa) as Śveta, accompanied by four disciples (Śveta, Śvetaśikha, Śvetāśva, Śvetalohita) whose yogic practice leads to Śiva’s abode; Gaurī is not foregrounded in the provided chapter sample.