Sama Veda - Uttarārcika
Soma YajñaRitual SequenceGāna

Uttarārcika

The Second Collection

उत्तरार्चिक (“उत्तर/पश्चात्-संग्रह”) सामवेद के स्तोत्र-कोष का प्रदर्शन-केन्द्रित परिपाक है। इसमें ऋचाओं को विस्तारित सामन्-रूप में, रागात्मक विन्यास (स्वर-गति) और स्तोभ-प्रवेशों सहित इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है कि उन्हें सोम-यज्ञ में सीधे गाया जा सके। इस आर्चिक में धर्म-तत्त्व और यज्ञ-प्रौद्योगिकी का संगम होता है—सोम शुद्धि कराने वाली, जीवित प्रवाह-शक्ति के रूप में जो यज्ञ को सक्रिय करता है (पवमान-क्रम), और इन्द्र जाग्रत, विजयी दिव्य बुद्धि के रूप में जो हवि को ग्रहण कर उसे सामर्थ्य देता है (ऐन्द्र-क्रम)।

Prapathakas in Uttarārcika

Prapathaka 6

यह पवमान प्रपाठक सोम के शोधन-क्रिया में प्रवाहित रूप पर केंद्रित है। यहाँ सोम को जीवित यज्ञ-शक्ति के रूप में स्तुत किया गया है, जो यज्ञ को गतिमान करता है और उसके फलों को प्रभावी बनाता है। स्तुतियाँ बार-बार शुद्ध सोम-धारा को इन्द्र के पराक्रम-वर्धन से जोड़ती हैं—प्रतियोगिता में विजय, गौ-सम्पदा और धन की वृद्धि, तथा अनुष्ठान में ऋत (ऋत-व्यवस्था) की स्थिर प्रतिष्ठा प्रदान करती हैं। सोम को अर्पण और अर्पणकर्ता—दोनों का पावक मानकर आह्वान किया गया है; वह देवों तक प्रार्थनाएँ पहुँचाने वाला दूत बनकर यज्ञ में मंगलमय क्रम स्थापित करता है। समग्र प्रवाह शोधन और प्राणन से आरम्भ होकर सामर्थ्य-प्राप्ति और सिद्धि तक जाता है, और इन्द्र का जय-वैभव सफल यज्ञ का प्रतीक बनता है।

20 dashatis | 66 mantras |

Prapathaka 7

आर्चिक 4, प्रपाठक 7 ‘ऐन्द्र’ सोम-स्तुति-क्रम है, जो इन्द्र को जाग्रत दिव्य बुद्धि और अजेय विजेता के रूप में केंद्रित करता है। शुद्ध स्वर से गाए गए सामन् के द्वारा यजमान इन्द्र से अविनाशी समृद्धि, विघ्न-नाश (वृत्र-वध) और प्रकाश के उद्घाटन की याचना करता है। अग्नि को उस यज्ञीय तथा आन्तरिक प्रज्वलन के रूप में आह्वान किया गया है जो स्तुति को वहन करता है, और पवमान सोम वह शुद्धिकारक, उल्लासक शक्ति प्रदान करता है जिससे इन्द्र का पराक्रम सन्निहित और प्रभावी बनता है। इस अध्याय की गति सही गान (स्वर/उद्गीथ) से शुद्ध सोम तक, और अंततः इन्द्र की विजय तथा धन-प्रदान में परिणत होती है।

21 dashatis | 63 mantras |

Prapathaka 8

आर्चिका 4, प्रपाठक 8 (ऐन्द्र) में इन्द्र-सामनों का सघन क्रम संकलित है, जो अनुष्ठानतः सोम-यज्ञ को विजेता-शक्ति से “सुसज्जित” करता है—इन्द्र को दिव्य मन, वृत्र-हन्ता और प्रकाश-स्वामी के रूप में प्रतिष्ठित करते हुए। ये मन्त्र उनकी लोक-व्यवस्थापक सामर्थ्य की स्तुति करते हैं, जो जलों को उद्घाटित करती है, ऋत को स्थिर करती है, और सहायक देवताओं तथा ब्रह्माण्डीय रक्षाओं के द्वारा यजमान की रक्षा करती है। दशकों के प्रवाह में यह अध्याय बार-बार इन्द्र-विजय को आन्तरिक स्पष्टता से जोड़ता है: जो शक्ति अवरोध को तोड़ती है, वही प्रेरित वाणी और सम्यक् कर्म के लिए मार्ग भी निर्मल करती है। इस प्रकार यह प्रपाठक संरक्षण और विजय से आरम्भ होकर तेजस्-प्रकाश और ऋत में सुरक्षित प्रतिष्ठा तक ले जाने वाला एक सशक्तिकरण-चक्र बनता है।

19 dashatis | 62 mantras |

Prapathaka 9

पवमान खण्ड के आर्चिका 4, प्रपाठक 9 में सोम-पवमान के मन्त्रों की एक सतत शृंखला संगृहीत है, जो पिषित सोम को एक जीवित, शुद्धिकारक प्रवाह के रूप में चित्रित करती है—जो पवित्र (छन्नी) से होकर बहते हुए यज्ञ को सामर्थ्य देता है। स्तुतियाँ बार-बार सोम की शुद्धि को इन्द्र के बलवर्धन, विजय और रक्षण से जोड़ती हैं, तथा यज्ञ चारों ओर से सुरक्षित रहे—इस हेतु अग्नि की दीप्तिमान संरक्षकता का भी आह्वान करती हैं। अठारह दशतियों में यह अध्याय यज्ञ की आन्तरिक और बाह्य शुद्धि पर बल देता है—सोम को वाणी, हवि और यजमान का पावनकर्ता मानते हुए—और अंततः अडिग संरक्षण, विघ्नों पर जय तथा तेजस्वी रक्षाकवच के विषयों पर समाप्त होता है।

18 dashatis | 57 mantras |

Frequently Asked Questions

The Uttarārcika is the “Later Collection” of the Sāmaveda, presenting verses in expanded sāman form with melodic shaping and stobha insertions so they can be sung directly in Soma-yajña performance.

Soma—especially as Pavamāna, the purifying flow—and Indra in Aindra stutis. Soma hymns emphasize purification and ritual activation; Indra hymns emphasize victory, illumination, and empowering the sacrifice.

It provides performance-ready sāman expansions that are selected and organized within gāna traditions for specific ritual moments. In practice, it functions as a key source-text for what the Udgātṛ sings from the songbooks during Soma rites.

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