
Aindra stotra: praising and summoning Indra to partake of the fostering Soma and to grant protection and bounty
Indra
Invitatory and triumphant with a confident tone of reliance on Indra’s strength and generosity
Kaṇva
ऐन्द्र स्तोत्र: सोम-पीड़न के अवसर पर गायक-समुदाय इन्द्र का आह्वान करता है कि वे ‘पान्तम/अत्यन्त पोषक’ सोम का पान करें और अपनी शक्ति व उदारता से सहायक बनें—रक्षा दें, शत्रुओं पर विजय कराएँ, तथा भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि प्रदान करें। इन्द्र को ‘विश्वासाह’ (सबको वश करने वाले), ‘शतक्रतु’ (शत-शक्ति/शत-योजनाओं वाले) और ‘मंहिष्ठ’ (अत्यन्त दानी) कहकर प्रतिदिन (द्यवि-द्यवि) निरन्तर स्तुति की जाती है। स्तोत्र-क्रिया में गायक ‘सखायः’ और ‘स्तोम-वाहसः’ (स्तुति-वाहक) बनकर गान द्वारा इन्द्र को समीप खींचते हैं; अंत में ‘नि षीदत’ के भाव से स्तुतियाँ इन्द्र के समक्ष स्थिर/आसीन की जाती हैं, जिससे उनकी कृपा—रक्षा, विजय और दान—सोम के माध्यम से प्रकट हो।
Mantra 1
पान्तमा वो अन्धस इन्द्रमभि प्र गायत विश्वासाहं शतक्रतुं मंहिष्ठं चर्षणीनाम्
हे जनो, अन्धस् (सोम-रस) से परिपोषित इन्द्र के लिए गाओ; विश्व-विजयी, शतक्रतु, मनुष्यों में महिष्ठ—उसके लिए स्तुति गाओ।
Mantra 2
प्र व इन्द्राय मादनं हर्यश्वाय गायत सखायः सोमपाव्ने
हे सखाओ! हरित-अश्व, सोम-पावन इन्द्र के लिए हर्षदायक (मादन) स्तुति-गीत ऊँचे स्वर से गाओ।
Mantra 3
वयमु त्वा तदिदर्था इन्द्र त्वायन्तः सखायः कण्वा उक्थेभिर्जरन्ते
हे इन्द्र! हम उसी लक्ष्य को लेकर, तुम्हें पाने की अभिलाषा से तुम्हारी ओर आते हैं; कण्व-ऋषि के सखा, उक्थ (स्तोत्र) द्वारा तुम्हारा यजन-गान करते हैं।
Mantra 4
इन्द्राय मद्वने सुतं परि ष्टोभन्तु नो गिरः अर्कमर्चन्तु कारवः
इन्द्र के मदन (उल्लास) हेतु सुत (निचोड़ा हुआ) सोम है; हमारी गिरः (वाणी) उसके चारों ओर गूँजें; कारव (गायक) अर्क (स्तुति) का अर्चन करें।
Mantra 5
अयं त इन्द्र सोमो निपूतो अधि बर्हिषि एहीमस्य द्रवा पिब
हे इन्द्र! यह सोम तेरे लिए है—सुपवित्र, बर्हिष् (पवित्र कुश) पर रखा हुआ; आ, इधर दौड़कर आ, और इसका पान कर।
Mantra 6
सुरूपकृत्नुमूतये सुदुघामिव गोदुहे जुहूमसि द्यविद्यवि
रक्षा और सहायतार्थ हम सु-रूप, सु-कर्तृत्व वाले (इन्द्र) का आह्वान करते हैं—जैसे दुहने वाले के लिए लोग प्रचुर-दुग्धा गौ को पुकारते हैं—दिन-प्रतिदिन।
Mantra 7
अभि त्वा वृषभा सुते सुतं सृजामि पीतये तृम्पा व्यश्नुही मदम्
हे वृषभ-वीर! सोम-प्रसवनाच्या वेळी, पानार्थ मी तुझ्याकडे पिळलेला सोम पाठवितो; तृप्त हो; मद (उल्लास) पूर्णपणे प्राप्त कर.
Mantra 8
य इन्द्र चमसेष्वा सोमश्चमूषु ते सुतः पिबेदस्य त्वमीशिषे
हे इन्द्र! जो सोम तुझ्यासाठी पिळून प्याल्यांत व पात्रांत ठेवला आहे—तो तू पिऊन घे; निश्चयच त्याचा स्वामी तूच आहेस.
Mantra 9
योगेयोगे तवस्तरं वाजेवाजे हवामहे सखाय इन्द्रमूतये
प्रत्येक योग में, प्रत्येक वाज-प्रतियोगिता में, हे सखाओ, हम अधिक-शक्तिशाली इन्द्र को सहायता (ऊति) के लिए आह्वान करते हैं।
Mantra 10
आ त्वेता नि षीदतेन्द्रमभि प्र गायत सखायः स्तोमवाहसः
हे (स्तुतियाँ) तेरे पास आकर यहाँ बैठें; हे सखाओ, स्तोम-वह (स्तोत्र-वाहक) तुम इन्द्र की ओर गान करो।
It is a sung invocation to Indra, asking him to come to the Soma offering and, pleased by the stotra, grant protection, victory, and generous gifts.
The Soma-juice is presented as sustaining and boon-giving; by offering it with song, the chanters attract Indra and activate the expected reciprocity of help and bounty.
They are the bearers of the hymn—i.e., the Sāman singers (Udgātṛ group) who carry and present the praise in its musical form before Indra.