Dashati 7
PūrvārcikaPrapathaka 1Dashati 710 Mantras

Dashati 7

Agni as Jātavedas—ritual guide and luminous power who secures faultless sacrifice and protection in the sadas

Deity

Agni (Jātavedas)

Melodic Character

Vigorous bright and assuring—praise that sounds like confident kindling and forward advance

Rishi Family

Viśvāmitra (dominant traditional attribution for this cluster)

इस दशति का विषय जातवेदस् अग्नि है—यज्ञ का मार्गदर्शक और दीप्तिमान शक्ति, जो सदस् में यज्ञ को ठीक रीति से प्रवृत्त कराता, हवि को देवों तक पहुँचाता और यजमानों की रक्षा करता है। सुगठित स्तोत्र को ‘स्तोम-रथ’ की भाँति अग्नि को अर्पित किया जाता है; उसकी केतु-दीप्ति रोदसी—द्यावा-पृथिवी—दोनों लोकों में फैलती है। वह जलों में/समिधाओं में गुप्त रूप से बढ़ता है और जाग्रत होकर त्रिविध प्रकाश/त्रिविध रूप में प्रतिष्ठित होता है। अग्नि से मैत्री अनिष्ट, दोष और लौकिक-याज्ञिक हानि से बचाने वाली ढाल बनती है; सही स्तुति और सही कर्म-विन्यास से उसकी प्रज्ञा/प्रमति प्राप्त होकर यज्ञ निर्विघ्न और फलदायी होता है।

Mantras

Mantra 1

आ जुहोता हविषा मर्जयध्वं नि होतारं गृहपतिं दधिध्वम् इडस्पदे नमसा रातहव्यं सपर्यता यजतं पस्त्यानाम्

हविषा से आहुति अर्पित करो; अपने को पवित्र करो; होतृ—गृहपति—को स्थापित करो। इḍā-पद (इळा-स्थान) पर नमस्कार सहित उस रतहव्य (अर्पित हवि को ग्रहण करने वाले) की सेवा-उपासना करो—जो बस्तियों/गृहों का यजनीय (पूज्य) है।

Saman: Unknown/unspecified (requires gāna mapping)

Mantra 2

चित्र इच्छिशोस्तरुणस्य वक्षथो न यो मातरावन्वेति धातवे अनूधा यदजीजनदधा चिदा ववक्षत्सद्यो महि दूत्या3ं चरन्

युवक अग्नि का वहन अद्भुत है—जो धारण (स्थापन) के लिए दो माताओं के पीछे-पीछे चलता है। जब उन्होंने उसे जन्म दिया, तब वह तत्क्षण आगे बढ़ता है, अपने महान दूतकार्य में प्रवृत्त होकर।

Saman: Unknown/unspecified (requires gāna mapping)

Mantra 3

इदं त एकं पर ऊ त एकं तृतीयेन ज्योतिषा सं विशस्व संवेशनस्तन्वे3 चारुरेधि प्रियो देवानां परमे जनित्रे

यह तेरा एक रूप है, और वह भी तेरा एक रूप है; तृतीय ज्योति से तू एकत्व में प्रवेश कर। संवेेशन (विश्राम देने वाला) होकर, अपने तनु में मनोहर हो; देवों का प्रिय बन—परम जनित्र (उच्चतम जन्मस्थान) में।

Saman: Unknown/unspecified (requires gāna mapping)

Mantra 4

इमं स्तोममर्हते जातवेदसे रथमिव सं महेमा मनीषया भद्रा हि नः प्रमतिरस्य संसद्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव .

हे जातवेदस् (अग्नि) जो अर्ह (पूज्य) हैं—उनके लिए हम यह स्तोत्र, रथ के समान सुगठित, मनोमय/मनीषा (पवित्र बुद्धि) से यथाविधि रचते हैं। यज्ञ-सभा (संसद्) में उसकी प्रेरणा/मार्गदर्शना हमारे लिए कल्याणकारी है। हे अग्ने, तेरी सख्यता में हम—जो तेरे हैं—कभी आहत न हों।

Saman: Rathantara (Agneya-prakṛti traditional assignment)

Mantra 5

मूर्धानं दिवो अरतिं पृथिव्या वैश्वानरमृत आ जातमग्निम् कविं सम्राजमतिथिं जनानामासन्नाः पात्रं जनयन्त देवाः

दिव का मस्तक, पृथ्वी का आधार—ऋत (पवित्र नियम) से जन्मा वैś्वानर अग्नि; कवि, सम्राट, मनुष्यों का अतिथि—उस अमृतस्वरूप अग्नि को देवताओं ने समीप बैठकर, हवि के योग्य पात्र (पात्रम्) के रूप में उत्पन्न किया।

Saman: Gautamasya (Agni-sāman traditional assignment)

Mantra 6

वि त्वदापो न पर्वतस्य पृष्ठादुक्थेभिरग्ने जनयन्त देवाः तं त्वा गिरः सुष्टुतयो वाजयन्त्याजिं न गिर्ववाहो जिग्युरश्वाः

जैसे पर्वत की पीठ से जल फूट निकलते हैं, वैसे ही हे अग्ने, देवताओं ने उक्थ (उच्चरित स्तुति) द्वारा तुझमें से तेरा प्राकट्य कराया। तुझे ये गिरः—सु-स्तुतियाँ—विजयी बनाती हैं; जैसे अश्व दौड़ में जीतते हैं, वैसे ही हे गिर्‍ववाह (स्तोत्र-वाहक), वे तुझे जीत लेते हैं।

Saman: Agneya-uktha-sāman (traditional cluster assignment)

Mantra 7

आ वो राजानमध्वरस्य रुद्रं होतारं सत्ययजं रोदस्योः अग्निं पुरा तनयित्नोरचित्ताद्धिरण्यरूपमवसे कृणुध्वम्

हे (यजमानो), अपने अवसे (रक्षा) के लिए यज्ञ के राजा—अग्नि को, जो रुद्र-स्वरूप, होतृ, और दोनों लोकों (रोदसी) में सत्य-यज (सत्य-यज्ञ करने वाला) है—यहाँ लाओ। जो स्वर्ण-रूप है, जो प्राचीन काल से वज्रधारी (तनयित्नु) के अचिन्त्य/अदृश्य स्रोत से प्रकट हुआ—उसे सहायता हेतु बुलाओ।

Saman: Rudra-Agni sāman (traditional epithet-based assignment)

Mantra 8

इन्धे राजा समर्यो नमोभिर्यस्य प्रतीकमाहुतं घृतेन नरो हव्येभिरीडते सबाध आग्निरग्रमुषसामशोचि

राजा, सहचर (समर्य) अग्नि नमस्कारों से प्रज्वलित होता है; जिसका प्रतिक (दृश्य रूप) घृत की आहुति से पोषित होता है। उसे नर हव्य-भेंटों से ईळते (स्तुति-पूजा करते) हैं; वही अजेय अग्नि उषाओं में अग्र होकर प्रकाशित हुआ है।

Saman: Uṣas-agra Agni-sāman (prātaḥ-savana usage)

Mantra 9

प्र केतुना बृहता यात्यग्निरा रोदसी वृषभो रोरवीति दिवश्चिदन्तादुपमामुदानडपामुपस्थे महिषो ववर्ध

अग्नि महान केतु (उन्नत तेज) के साथ दोनों लोकों (रोदसी) की ओर अग्रसर होता है; वृषभ-सा वह गर्जता है। स्वर्ग के अन्तिम छोर से भी उसने अनुपम महिमा प्राप्त की; अपां उपस्थ (जल की गोद) में वह महिष (महाबल) बढ़ा है।

Saman: Ketu-Agni sāman (brightness motif)

Mantra 10

अग्निं नरो दीधितिभिरण्योर्हस्तच्युतं जनयत प्रशस्तम् दूरेदृशं गृहपतिमथव्युम्

मनुष्य, प्रज्वलित समिधाओं की दीप्ति से, दोनों अरणियों से—हाथ द्वारा उत्पन्न—अग्नि को जनित करते हैं; वह प्रशस्त, दूर से दीखने वाला, गृहपति, सर्वत्र व्याप्त है।

Saman: Araṇi-janana sāman (kindling motif)

Frequently Asked Questions

It presents Agni as Jātavedas who is praised with a well-made hymn, shines across the worlds, and guides the sacrifice in the ritual assembly so the worshippers remain unharmed.

The ‘chariot’ image says the praise must be firmly constructed—well-joined like a ratha—so it can carry the offering-intent smoothly and win Agni’s auspicious guidance (pramati) in the sadas.

Traditionally it is read as Agni’s three fires (gārhapatya, āhavanīya, dakṣiṇa) or as his presence in three realms (earth, atmosphere, heaven), showing one deity manifesting in coordinated stations.