Dashati 4
PūrvārcikaPrapathaka 1Dashati 410 Mantras

Dashati 4

Agni kindled with radiant flames as the guardian of ṛta (right-ordered sacrifice) and giver of strengthening wealth

Deity

Agni

Melodic Character

Bright urgent and elevating—focused on ignition radiance and forward-driving praise

Rishi Family

Bharadvāja

यह दशति अग्नि को समिधा से प्रज्वलित, दीप्त ज्वालाओं से प्रकाशित और ऋत (यज्ञ-व्यवस्था) के रक्षक के रूप में स्तुत करती है। अग्नि को कवि और त्राता—यज्ञ का संरक्षक तथा विधि का ज्ञाता—मानकर उनसे यज्ञ की शुद्धि, सही मार्गदर्शन (सुनीति), तथा यजमान के लिए बल-वर्धक धन (रयि), प्राण-शक्ति (वयस्) और शुभ यश (सुयशस्) की याचना की जाती है। पावक अग्नि आहुतियों और उपासकों को पवित्र कर, देवों तक हवि पहुँचाने वाले दृश्य मध्यस्थ रूप में कल्याण लौटाते हैं।

Mantras

Mantra 1

यज्ञायज्ञा वो अग्नये गिरागिरा च दक्षसे प्रप्र वयममृतं जातवेदसं प्रियं मित्रं न शंसिषम्

प्रत्येक यज्ञ में हम अग्नि के लिए, स्तुति पर स्तुति गाकर, और उसकी दक्ष शक्ति के निमित्त, बार-बार अमृतस्वरूप जातवेदस्—प्रिय को—मित्र की भाँति प्रशंसित करते हैं।

Saman: Unknown/Unspecified (requires Sāmavedic gāna-prayoga mapping for this ṛc in this arcikā context)

Mantra 2

पाहि नो अग्न एकया पाह्यू3त द्वितीयया पाहि गीर्भिस्तिसृभिरूर्जां पते पाहि चतसृभिर्वसो

हे अग्नि, एक (स्तोत्र) से हमारी रक्षा करो; दूसरी से भी रक्षा करो; तीन-तीन स्तुतियों से, हे ऊर्जापति, हमारी रक्षा करो; चार-चार स्तुतियों से, हे वसु, हमारी रक्षा करो।

Saman: Unknown/unspecified (requires Sāmavedic gāna tradition mapping for this arcika location)

Mantra 3

बृहद्भिरग्ने अर्चिभिः शुक्रेण देव शोचिषा भरद्वाजे समिधानो यविष्ठ्य रेवत्पावक दीदिहि

हे अग्नि! महान् ज्वालाओं से, हे देव! उज्ज्वल शुचि-तेज से, अपने दीप्त शोचिष् से—भरद्वाज के यज्ञ में समिधा से प्रज्वलित होकर, हे यविष्ठ (देवों में कनिष्ठ)! हे रेवत् पावक! दीप्त हो, प्रकाशमान हो।

Mantra 4

त्वे अग्ने स्वाहुत प्रियासः सन्तु सूरयः यन्तारो ये मघवानो जनानामूर्वं दयन्त गोनाम्

हे अग्नि, स्वाहुति से सम्यक् आहूत तुझमें, प्रिय ऋषि/सूरि स्वीकार्य हों; जो जनों के दानी मगवान, यज्ञ के नियन्ता हैं, वे गौओं की उर्वर/विस्तृत समृद्धि प्रदान करें।

Mantra 5

अग्ने जरितर्विश्पतिस्तपानो देव रक्षसः अप्रोषिवान्गृहपते महां असि दिवस्पायुर्दुरोणयुः

हे अग्नि! हे स्तोता के स्वामी, तू प्रजाओं का अधिपति है। हे देव! तू दहककर राक्षसों का नाश करता है। हे गृहपति! तू अविराम जाग्रत, महान् है; तू द्युलोक का रक्षक है, गृह-आवास में निवास करने वाला।

Saman: Unknown (requires specific Sāmavedic gāna tradition mapping for this ṛc in the Purvārcika Agneya section)

Mantra 6

अग्ने विवस्वदुषसश्चित्रं राधो अमर्त्य आ दाशुषे जातवेदो वहा त्वमद्या देवां उषर्बुधः

हे अग्नि, विवस्वान्-प्रभामय, अमर्त्य! उषाओं का चित्र (उज्ज्वल) राधस् दाता को प्रदान कर। हे जातवेदस्, उषर्बुधः—प्रातः-जाग्रत—आज तू देवों को हमारे यज्ञ में वहन कर।

Mantra 7

त्वं नश्चित्र ऊत्या वसो राधांसि चोदय अस्य रायस्त्वमग्ने रथीरसि विदा गाधं तुचे तु नः

हे चित्र (प्रख्यात) अग्ने, वसो! अपनी ऊति—सहायता—से हमारे लिए राधांसि—बहु दान—प्रेरित कर। इस रायः—धन—का तू, हे अग्ने, रथीर्—सारथी—है। संकटकाल में भी, हे अग्ने, हमारे लिए गाढ़ं विदा—दृढ़ घाट/पार-मार्ग—खोज दे।

Saman: Agneya Sāman (tune unspecified in input; commonly set with stobha-extensions in performance)

Mantra 8

त्वमित्सप्रथा अस्यग्ने त्रातरृतः कविः त्वां विप्रासः समिधान दीदिव आ विवासन्ति वेधसः

हे अग्ने, तू ही निश्चय इस यज्ञ में सुप्रथाः—विस्तृत कीर्ति वाला—है; तू ऋत का त्राता, कवि है। दीदिवः—दीप्त—तुझे, समिधान—समिधा से प्रज्वलित करते हुए—विप्र वेधसः, बुद्धिमान् विधाता, आ विवासन्ति—पूजते और मान देते हैं।

Saman: Unknown/unspecified (requires Sāmavedic gāna tradition mapping for this arcika location)

Mantra 9

आ नो अग्ने वयोवृधं रयिं पावक शंस्यम् रास्वा च न उपमाते पुरुस्पृहं सुनीती सुयशस्तरम्

हे अग्नि! हे पावक! हमारे पास आ; हमें वह रयि (धन) दे जो बल-वर्धक है, जो प्रशंसनीय है। और हे हवि से उपास्य! हमें वह बहु-अभिलषित समृद्धि भी दे—जो सुनीति (सद्गति) वाली हो, और अति-उत्कृष्ट यश देने वाली हो।

Mantra 10

यो विश्वा दयते वसु होता मन्द्रो जनानाम् मधोर्न पात्रा प्रथमान्यस्मै प्र स्तोमा यन्त्वग्नये

उस अग्नि के लिए—जो मनुष्यों का आनंददायक होतृ है, जो समस्त वसु (धन) वितरित करता है, और जिसके लिए मधुर सोम के पात्रों-सी प्रथम हवियाँ अर्पित होती हैं—हमारे स्तोत्र अग्नि की ओर प्रस्थान करें।

Saman: Agneya-sāman (tune unspecified in input)

Frequently Asked Questions

It praises Agni as brilliantly kindled fire who protects the right order of the sacrifice (ṛta) and grants prosperity, strength, good guidance, and renown.

‘Pāvaka’ highlights Agni’s purifying power in the rite, while ‘trātā of ṛta’ means he safeguards the properly ordered sacrificial performance and carries offerings without obstruction.

They support the establishment and glorification of the sacrificial fire: the chanters kindle and praise Agni’s radiance, affirm his ritual authority, and then ask him to bestow celebrated, vitality-increasing wealth and auspicious outcomes.