
Agni as the gracious ritual guest—kindled, seated on the barhis, and invoked to grant welfare and carry offerings
Agni
Invocatory and reverent with a bright kindling-like uplift
Most attributions are unspecified in the provided data; one verse explicitly names Gopavana as the seer/voice. Rigvedic anukramaṇī confirmation would be needed for full rishi-family mapping.
अग्नि को कृपालु यज्ञ-अतिथि के रूप में आमंत्रित किया जाता है—उसे प्रज्वलित कर पवित्र कुश (बर्हिस्) पर बैठाया जाए, वह पावक होकर आहुतियों को शुद्ध करे और देवों तक पहुँचाए, तथा यजमान को कल्याण प्रदान करे। स्तुति में अग्नि की महानता और मृड/शिव (उपकारी) स्वरूप, काष्ठ-मंथन से उसकी यज्ञीय ‘जन्म’ और अंगार-रूप का स्मरण, तथा ‘हे पावक, हमारी हवि सुनो’ जैसी जागरूक पुकार प्रमुख है। अंत में स्वर इन्द्र की ओर मुड़ता है—सोमपति इन्द्र से प्रश्न/आह्वान किया जाता है कि वह यजमान की प्रेरित धि/गिर को स्वीकार कर उसे चुनें और बल दें; क्योंकि शुद्ध वाणी और सही संकल्प देवता को समीप लाते हैं और अग्नि उपासना को फलदायी बनाता है।
Mantra 1
अग्निं वो वृधन्तमध्वराणां पुरूतमम् अच्छा नप्त्रे सहस्वते
यज्ञों में जिसे तुम बढ़ाते हो—उस अग्नि को, जो अत्यन्त उदार है, यहाँ बुलाओ; सहस्रवान् (बलवान्) नप्तृ—उस शक्तिसम्पन्न के पास आओ।
Mantra 2
अग्निस्तिग्मेन शोचिषा यंसद्विश्वं न्या3त्रिणम् अग्निर्नो वंसते रयिम्
तीक्ष्ण-ज्वलित तेज से युक्त अग्नि समस्त भक्षक आक्रमणकारी को रोक दे; और अग्नि हमें धन-समृद्धि प्रदान करने में प्रसन्न हो।
Mantra 3
अग्ने मृड महां अस्यय आ देवयुं जनम् इयेथ बर्हिरासदम्
हे अग्नि, कृपा कर; तू महान है। इधर आ; देव-याचक जनसमुदाय के पास आ, और बर्हि (पवित्र कुश-आसन) पर आसीन हो।
Mantra 4
अग्ने रक्षा णो अंहसः प्रति स्म देव रीषतः तपिष्ठैरजरो दह
हे अग्ने, हमें अंहस् (पाप/दुःख) से बचा; और हे देव, अजर (अविनाशी) तू अपनी अत्यन्त दहकती ज्वालाओं से हिंसकों को जला दे।
Mantra 5
अग्ने युङ्क्ष्वा हि ये तवाश्वासो देव साधवः अरं वहन्त्याशवः
हे अग्ने, जुड़ जा—क्योंकि हे देव, तेरे घोड़े, साधु और शीघ्रगामी, विधिपूर्वक हवि को वहन करते हैं।
Mantra 6
नि त्वा नक्ष्य विश्पते द्युमन्तं धीमहे वयम् सुवीरमग्न आहुत
हे विश्पते, हम तुझे प्राप्त होते हैं; हम तुझे—द्युमान, सुवीर-प्रदाता—स्थापित करते हैं। हे आहुति-ग्रहणकर्ता अग्ने, हमारे यज्ञकर्म में उपस्थित हो।
Mantra 7
अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम् अपां रेतांसि जिन्वति
अग्नि दिव्य लोक का मस्तक है, शिखर का स्वामी है, और पृथ्वी का भी; वही अग्नि जलों के रेतांसि—जनन-तत्त्वों—को प्रबल करता, जाग्रत करता है।
Mantra 8
इममू षु त्वमस्माकं सनिं गायत्रं नव्यांसम् अग्ने देवेषु प्र वोचः
अब निश्चय ही, हे अग्ने, तू देवों के बीच हमारे इस नव्य गायत्र—गायत्र—सनि, अर्थात् प्राप्ति-उपाय, का उच्चारण कर।
Mantra 9
तं त्वा गोपवनो गिरा जनिष्ठदग्ने अङ्गरः स पावक श्रुधी हवम्
गोपवन ने अपने गिरा—स्तुति-गीत—से, हे अग्ने, तुझे अङ्गार-सा दहकता हुआ उत्पन्न किया; हे पावक, तू हमारे हव—आह्वान—को सुन।
Mantra 10
परि वाजपतिः कविरग्निर्हव्यान्यक्रमीत् दधद्रत्नानि दाशुषे
अग्नि—कवि, वाजपति (पोषण के स्वामी)—चारों ओर से हवियों की ओर अग्रसर हुए हैं; वे यजमान/दाशुष (अर्पण करने वाले) के लिए रत्न-सम संपदाएँ धारण करते हैं।
Mantra 11
उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः दृशे विश्वाय सूर्यम्
उदित हो—केतु (दीप्त किरण) उस देव जātavedas—सूर्य—को उठाकर ले जाते हैं, ताकि वह समस्त जगत के लिए दृष्टिगोचर हो।
Mantra 12
कविमग्निमुप स्तुहि सत्यधर्माणमध्वरे देवममीवचातनम्
अध्वर (यज्ञ) में सत्य-धर्म वाले कवि अग्नि की स्तुति करो—उस देव की, जो अमीव (रोग) और हर प्रकार की अनिष्ट आपदा को दूर भगाता है।
Mantra 13
शं नो देवीरभिष्टये शं नो भवन्तु पीतये शं योरभि स्रवन्तु नः
हमारे लिए देवियाँ अभीष्ट-प्राप्ति हेतु कल्याणकारी हों; हमारे लिए पान/सोम-पान हेतु भी शुभ हों; वे कल्याण और आरोग्य बरसाती हुई हमारी ओर प्रवाहित हों।
Mantra 14
कस्य नूनं परीणसि धियो जिन्वसि सत्पते जोषाता यस्य ते गिरः
हे सत्पते! अब तू किसका पूर्णतः परिग्रह करता है? किसकी भक्तिपूर्ण धियों को तू प्रेरित करता है? जिसकी स्तुतियाँ तुझ तक पहुँचती हैं, उसका तू प्रसन्न स्वीकारकर्ता है।
It centers on inviting Agni—gracious and great—to come, sit on the sacred grass, hear the call, purify the rite, and make the offering effective; it also gestures toward Indra’s granting of favor in the Soma-session.
The language is primarily ritual: Agni is ‘made to be born’ when the āhavanīya fire is kindled (agnijanana). The “ember” (aṅgara) image highlights his visible, glowing presence in the sacrifice.
Sāmavedic groupings can pivot from the fire-principle that enables offering to the Soma-lord who receives and rewards it. The Indra verse frames divine patronage—whose praise and intention Indra accepts and strengthens.