
Sukta 9.96
Soma Pavamāna (purified Soma)
यह पवमान सोम-सूक्त निचोड़े गए सोम की स्तुति करता है, जो छननियों से वेगपूर्वक आगे बढ़ता है, जलों में दीप्त और गर्जन करता हुआ, और इन्द्र तथा अन्य देवों के लिए यज्ञोपयोगी बनता है। सोम को विजयी नायक के रूप में महिमामंडित किया गया है, जो वैर-भाव और दरिद्रता को दूर करता है, यजमान के लिए मार्ग को विस्तृत करता है, और साथियों को प्रकाश के नए “वस्त्र” पहनाता है—बल, निर्मलता और प्रेरित शक्ति।
Mantra 1
प्र सेनानीः शूरो अग्रे रथानां गव्यन्नेति हर्षते अस्य सेना । भद्रान्कृण्वन्निन्द्रहवान्त्सखिभ्य आ सोमो वस्त्रा रभसानि दत्ते ॥
रथों के अग्रभाग में वीर सेनानी सोम आगे बढ़ता है, गो-धन—दीप्त किरणों—की खोज में; उसकी सेना (अन्तःशक्ति) हर्षित होती है। शुभता रचते हुए और इन्द्र-आह्वान (इन्द्र-बल) को जगाते हुए, सोम सखाओं को वेगवान वस्त्र देता है—नव आवरण, प्रकाश और सामर्थ्य के।
Mantra 3
स नो देव देवताते पवस्व महे सोम प्सरस इन्द्रपानः । कृण्वन्नपो वर्षयन्द्यामुतेमामुरोरा नो वरिवस्या पुनानः ॥
हे देव सोम, हमारे लिए देवत्व-प्राप्ति हेतु पवित्र हो; महाविस्तार के लिए, इन्द्र-पान (इन्द्र का पेय) बनकर। जलों को रचते हुए, द्यौ को वर्षाते हुए, और इस विस्तीर्ण पृथ्वी को भी—जब तू शुद्ध होता है, तब हमारे लिए वरिवस्—विस्तृत मार्ग/अवकाश—खोल दे।
Mantra 4
अजीतयेऽहतये पवस्व स्वस्तये सर्वतातये बृहते । तदुशन्ति विश्व इमे सखायस्तदहं वश्मि पवमान सोम ॥
अजित होने और अहत (अपराजेय) रहने के लिए पवित्र होकर प्रवाहित हो; स्वस्ति (कल्याण) के लिए, सर्व-ताति (समग्र सिद्धि/पूर्णता) के लिए, और महत् (विस्तृत) के लिए। यही कामना ये सब सखा करते हैं; हे पवमान सोम, वही मैं भी तुझसे चाहता/माँगता हूँ।
Mantra 5
सोमः पवते जनिता मतीनां जनिता दिवो जनिता पृथिव्याः । जनिताग्नेर्जनिता सूर्यस्य जनितेन्द्रस्य जनितोत विष्णोः ॥
सोम पवित्र होकर प्रवाहित होता है—वह मतीनों (प्रेरित विचारों) का जनिता है; वह द्यौ (स्वर्ग) का जनिता है, वह पृथ्वी का जनिता है। वह अग्नि का जनिता है, वह सूर्य का जनिता है; वह इन्द्र का जनिता है, और विष्णु का भी जनिता है।
Mantra 9
परि प्रियः कलशे देववात इन्द्राय सोमो रण्यो मदाय । सहस्रधारः शतवाज इन्दुर्वाजी न सप्तिः समना जिगाति ॥
देवों की वायु से प्रेरित प्रिय सोम, इन्द्र के रण्य (आनन्द-उन्माद) के लिए कलश में चारों ओर धाराएँ बनाकर प्रवाहित होता है। सहस्रधार, शतवाज, वह उज्ज्वल इन्दु—वाजी (विजयी) सप्ति (अश्व) की भाँति—एक ही लक्ष्य की ओर पहुँचता/दौड़ता है।
Mantra 10
स पूर्व्यो वसुविज्जायमानो मृजानो अप्सु दुदुहानो अद्रौ । अभिशस्तिपा भुवनस्य राजा विदद्गातुं ब्रह्मणे पूयमानः ॥
वह प्राचीन सोम—वसु का ज्ञाता और खोजनेवाला—पुनः जन्म लेता है; जलों में मँजता हुआ, अद्रि (पाषाण) पर दुहा जाता है। अभिशस्ति (दुष्ट वचन/आक्षेप) और आघात से रक्षक, भुवन का राजा—पवमान होकर वह ब्रह्म (वाणी/मंत्र) के लिए गातु (मार्ग) को पा लेता है।
Mantra 11
त्वया हि नः पितरः सोम पूर्वे कर्माणि चक्रुः पवमान धीराः । वन्वन्नवातः परिधीँरपोर्णु वीरेभिरश्वैर्मघवा भवा नः ॥
हे पवमान सोम! तुम्हारे द्वारा ही हमारे प्राचीन पितरों—धीरों—ने कर्मों को सिद्ध किया। हे अविजेय! जीतते हुए हमारे चारों ओर के परिधि (बन्धन-घेरों) को खोल दो; वीरों और अश्वों सहित हमारे लिए मगवान (उदार दाता) बनो।
Mantra 12
यथापवथा मनवे वयोधा अमित्रहा वरिवोविद्धविष्मान् । एवा पवस्व द्रविणं दधान इन्द्रे सं तिष्ठ जनयायुधानि ॥
जैसे तुमने मनु के लिए अपने को पवित्र किया—वयो॒धा (समृद्धि देनेवाला), अमित्रहा (शत्रुहंता), वरिवोविद् (विस्तृत अवकाश का ज्ञाता), हविष्मान् (हविष्य से युक्त)—वैसे ही अब पवित्र हो, द्रविण (धन-तेज) को धारण करते हुए। इन्द्र में समवेत होकर स्थित हो, और जनय—आयुधानि: विजय के लिए प्रभावी शक्तियों को उत्पन्न कर।
Mantra 13
पवस्व सोम मधुमाँ ऋतावापो वसानो अधि सानो अव्ये । अव द्रोणानि घृतवान्ति सीद मदिन्तमो मत्सर इन्द्रपानः ॥
हे सोम! मधुमान्, ऋतावान् होकर पवित्र हो; ऊन के शिखर (अव्य) पर जलों को वस्त्र की भाँति धारण किए हुए। घृत-पूर्ण द्रोणों में आसीन हो—अत्यन्त मादक, परम आनन्ददायक, इन्द्र का पान—कि अर्पित रूपों में वह रस दृढ़तापूर्वक निवास करे।
Mantra 14
वृष्टिं दिवः शतधारः पवस्व सहस्रसा वाजयुर्देववीतौ । सं सिन्धुभिः कलशे वावशानः समुस्रियाभिः प्रतिरन्न आयुः ॥
दिव्य वर्षा के समान, शतधारा होकर पवित्र हो; देववीति में सहस्रगुण बल-समृद्धि जीतने वाला वाजयु बन। कलश में सिन्धुओं (नदियों) के साथ संयुक्त होकर, गूँजता हुआ, उषस्सदृश दीप्तियों के साथ हमारे आयु को बढ़ा और स्थिर कर।
Mantra 15
एष स्य सोमो मतिभिः पुनानोऽत्यो न वाजी तरतीदरातीः । पयो न दुग्धमदितेरिषिरमुर्विव गातुः सुयमो न वोळ्हा ॥
यह सोम हमारी मतियों से पवित्र होता हुआ, बलवान अश्व के समान, दरिद्रता और वैर की शक्तियों को लाँघ जाता है। अदिति के दुहे हुए दूध के समान, वह पोषक, वेगवान रस-धारा उँडेलता है—विस्तृत पथ के समान व्यापक—सुगम-नियंत्रित, सुनिश्चित वहनकर्ता जो हमें आगे ले जाता है।
Mantra 16
स्वायुधः सोतृभिः पूयमानोऽभ्यर्ष गुह्यं चारु नाम । अभि वाजं सप्तिरिव श्रवस्याभि वायुमभि गा देव सोम ॥
अपने ही आयुध-बल से युक्त, सोतृजनों द्वारा पवित्र किया गया हे सोम, उस गुप्त और रमणीय ‘नाम’ की ओर प्रवाहित हो। जैसे तीव्र अश्व यश की ओर दौड़ता है, वैसे ही बल-समृद्धि (वाज) की ओर वेग कर; वायु की ओर वेग कर; देव सोम, किरणों/गावों की ओर भी वेग कर।
Mantra 17
शिशुं जज्ञानं हर्यतं मृजन्ति शुम्भन्ति वह्निं मरुतो गणेन । कविर्गीर्भिः काव्येना कविः सन्त्सोमः पवित्रमत्येति रेभन् ॥
वे नवजात शिशु—वांछनीय—को निर्मल करते हैं; मरुतगण अपने समूह सहित वह्नि (अग्नि-वाहक) को शोभित करते हैं। प्रेरित वाणी से कवि, काव्य-दृष्टि से कवि—सचमुच कवि—सोम, स्तुति-गान करता हुआ, पवित्र (छन्नी) के पार चला जाता है।
Mantra 18
ऋषिमना य ऋषिकृत्स्वर्षाः सहस्रणीथः पदवीः कवीनाम् । तृतीयं धाम महिषः सिषासन्त्सोमो विराजमनु राजति ष्टुप् ॥
जिसका मन ऋषि-सा है, जो ऋषित्व को रचता है, स्वयंस्रवित होकर स्वर्गीय प्रकाश में बहता है—हजार पथों का नेता, कवियों के पथ का पथ-प्रदर्शक। तृतीय धाम की अभिलाषा करता हुआ वह महिष (महान वृषभ) सोम, विराज् के अनुक्रम में स्तुति-छन्द में गाता और राज्य करता है।
Mantra 19
चमूषच्छ्येनः शकुनो विभृत्वा गोविन्दुर्द्रप्स आयुधानि बिभ्रत् । अपामूर्मिं सचमानः समुद्रं तुरीयं धाम महिषो विवक्ति ॥
चमू (करछुलों) पर बैठा श्येन-पक्षी, अपने आयुध धारण किए—गोविन्दु (गव्यों का अन्वेषी) यह द्रप्स—अपां ऊर्मि (जल-तरंग) के साथ समुद्र की ओर चलता है; महिष (महान् वृषभ) चतुर्थ धाम को प्रकट करता है।
Mantra 20
मर्यो न शुभ्रस्तन्वं मृजानोऽत्यो न सृत्वा सनये धनानाम् । वृषेव यूथा परि कोशमर्षन्कनिक्रदच्चम्वोरा विवेश ॥
जैसे उज्ज्वल मर्य (युवा) अपना तन माँजता है, जैसे अश्व सृत्वा (वेग से दौड़कर) धन-प्राप्ति के लिए बढ़ता है—वैसे वह वृषभ की भाँति यूथों के चारों ओर कोश (पात्र) के परितः वेग से दौड़ता है; हर्ष से हिनहिनाता हुआ, वह दोनों चम्वोः (दो कटोरों) में प्रवेश करता है।
Mantra 21
पवस्वेन्दो पवमानो महोभिः कनिक्रदत्परि वाराण्यर्ष । क्रीळञ्चम्वोरा विश पूयमान इन्द्रं ते रसो मदिरो ममत्तु ॥
पवस्व, हे इन्दु, पवमान, अपनी महान् शक्तियों सहित; हर्ष से हिनहिनाता हुआ, वारा (ऊन के छननी-रोम) के परितः वेग से बह। क्रीड़ा करता हुआ, पूयमान (शुद्ध होता) दोनों चम्वोः में प्रवेश कर; तेरा मदिर रस इन्द्र को प्रमुदित करे।
Mantra 22
प्रास्य धारा बृहतीरसृग्रन्नक्तो गोभिः कलशाँ आ विवेश । साम कृण्वन्त्सामन्यो विपश्चित्क्रन्दन्नेत्यभि सख्युर्न जामिम् ॥
उससे महान् धाराएँ प्रवाहित हुईं; किरणों से अभिषिक्त होकर वह कलशों में प्रविष्ट हुआ। साम रचता हुआ—साम का स्वामी, विवेकशील ऋषि—उच्च स्वर से पुकारता हुआ वह अपने बन्धु की ओर, मित्र की भाँति, अग्रसर होता है।
Mantra 23
अपघ्नन्नेषि पवमान शत्रून्प्रियां न जारो अभिगीत इन्दुः । सीदन्वनेषु शकुनो न पत्वा सोमः पुनानः कलशेषु सत्ता ॥
हे पवमान, तू शत्रुओं का नाश करता हुआ आगे बढ़ता है; प्रिय के गीत से प्रशंसित जार की भाँति यह उज्ज्वल इन्दु स्तुत होता है। उड़कर आए पक्षी की तरह काष्ठ-पात्रों में बैठता हुआ, शुद्ध होता सोम कलशों में अपना आसन ग्रहण करता है।
Mantra 24
आ ते रुचः पवमानस्य सोम योषेव यन्ति सुदुघाः सुधाराः । हरिरानीतः पुरुवारो अप्स्वचिक्रदत्कलशे देवयूनाम् ॥
हे पवमान सोम, तेरी रुचियाँ तेरे पास ऐसे आती हैं जैसे सु-दोहन करने वाली स्त्रियाँ—उत्तम धाराओं से समृद्ध। हरितवर्ण (हरि) अग्रसर किया गया, बहु-आकांक्षित, जलों में गूँज उठा—देव-यजनों के कलश में वह गर्जित हुआ।
The hymn praises Soma Pavamāna—Soma in the act of being purified as it flows through the filters and becomes fit to offer to the gods, especially Indra.
It refers to the ritual process where pressed Soma juice is strained through a woolen filter and collected in jars; the hymn also treats this as a symbol of inner cleansing and clarified inspiration.
It asks for victory over hostility and want, auspiciousness and strength (often linked with Indra), and a “wide path” of progress—prosperity, protection, and right movement in life.
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