Rig Veda Sukta 92
Mandala 9Sukta 926 Mantras

Sukta 92

Sukta 9.92

Rishi

Rebha Kāśyapa (traditional for RV 9.92; verify in Anukramaṇī/critical edition)

Devata

Soma Pavamāna

Chandas

Jagatī (probable; confirm metrically)

यह संक्षिप्त पवमान सूक्त सोम की स्तुति करता है—जब उसे पेरा जाता है और ऊनी छननी से होकर बहाया जाता है। वह विजय और पुरस्कार की ओर रथ की भाँति वेग से दौड़ता है। शुद्धि-प्रक्रिया को यह एक विश्वव्यापी सहयोग के रूप में चित्रित करता है—देवगण और “सात नदियाँ” सोम को धोकर, उसे सामर्थ्य प्रदान कर, इस प्रकार समर्थ बनाते हैं कि वह स्वीकार्य हवि बने और उपासकों को बल (इन्द्रिय) तथा पोषण प्रदान करे।

Mantras

Mantra 1

परि सुवानो हरिरंशुः पवित्रे रथो न सर्जि सनये हियानः । आपच्छ्लोकमिन्द्रियं पूयमानः प्रति देवाँ अजुषत प्रयोभिः ॥

निचोड़े जाते हुए वह हरित-वर्ण किरण, पवित्र पर, रथ की भाँति वेग से दौड़ता है—विजय-प्राप्ति के लिए उतावला। शुद्ध होता हुआ वह इन्द्रिय (इन्द्र-शक्ति) के श्लोक/स्तुति तक पहुँचता है; और देवता उसे प्रत्युत्तर में अपने पोषण और अग्र-दानों से स्वीकार करते हैं।

Mantra 2

अच्छा नृचक्षा असरत्पवित्रे नाम दधानः कविरस्य योनौ । सीदन्होतेव सदने चमूषूपेमग्मन्नृषयः सप्त विप्राः ॥

स्पष्ट नर-चक्षु (मानवी-दृष्टि) के साथ वह पवित्र की ओर प्रवाहित होता है, कवि (द्रष्टा) की योनि में अपना नाम धारण करते हुए। वह होता की भाँति सदन में—चमूषु (पात्रों/कटोरों) में—आसीन होता है; और उसके समीप सात ऋषि, सात विप्र—प्रेरित वाणी वाले—आ पहुँचते हैं।

Mantra 3

प्र सुमेधा गातुविद्विश्वदेवः सोमः पुनानः सद एति नित्यम् । भुवद्विश्वेषु काव्येषु रन्तानु जनान्यतते पञ्च धीरः ॥

सुमेधा, मार्गविद्, विश्वदेव-सम्बद्ध सोम—पवमान—अग्रसर होता है; शुद्ध होता हुआ वह नित्य यज्ञ-सदस् में आता है। समस्त काव्य-प्रेरित कर्मों में रस-भोगी बनकर वह धीर (स्थिर-बुद्धि) जनों में पंचधा (पाँच प्रकार से) अपने को विस्तारित करता है।

Mantra 4

तव त्ये सोम पवमान निण्ये विश्वे देवास्त्रय एकादशासः । दश स्वधाभिरधि सानो अव्ये मृजन्ति त्वा नद्यः सप्त यह्वीः ॥

हे पवमान सोम! तेरे निहित (गूढ़) अन्तर में समस्त देव कार्यरत हैं—त्रय और एकादश; और दस भी अपनी-अपनी स्वधा-शक्तियों सहित। ऊनी (अव्य) शिखर पर वे तुझे परिशुद्ध करते हैं; सात महान् (यह्वी) नदियाँ तुझे धोकर दीप्ति में ले जाती हैं।

Mantra 5

तन्नु सत्यं पवमानस्यास्तु यत्र विश्वे कारवः संनसन्त । ज्योतिर्यदह्ने अकृणोदु लोकं प्रावन्मनुं दस्यवे करभीकम् ॥

पवमान सोम का यह सत्य हो—जहाँ समस्त कारव (कर्म-कर्ता/कवि) एकत्र होते हैं। जब उसने ज्योति को दिन के लिए लोक (जगत्) बनाया, तब उसने मनु की रक्षा की और दस्यु को करभीक (बन्धन/निग्रह) में धकेल दिया।

Mantra 6

परि सद्मेव पशुमान्ति होता राजा न सत्यः समितीरियानः । सोमः पुनानः कलशाँ अयासीत्सीदन्मृगो न महिषो वनेषु ॥

वह पशुधन-सम्पन्न सद्मों के बीच होता की भाँति परिक्रमा करता है; सभाओं की ओर बढ़ते हुए राजा की तरह सत्यस्वरूप है। शुद्ध होता हुआ सोम कलशों तक आ पहुँचा; वह वन में महिष के समान, मृग के समान बैठ जाता है—अपने ही तेज में स्वाधीन, अपने बल में स्थित।

Frequently Asked Questions

It praises Soma juice while it is being strained and purified. The hymn says Soma becomes powerful and is welcomed by the gods, bringing strength and nourishment back to the worshipper.

The “seven mighty rivers” symbolize the cleansing, life-giving currents that wash Soma into brightness. They connect the ritual act of straining Soma with a wider cosmic purification.

It is recited during Soma rites when the pressed Soma flows through the filter and is collected into vessels. The verses support the act of purification and the offering of Soma to the gods, especially for vigor and success.

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