Rig Veda Sukta 81
Mandala 9Sukta 815 Mantras

Sukta 81

Sukta 9.81

Rishi

Not securely inferable from the excerpt alone.

Devata

Soma Pavamāna, oriented to Indra’s empowerment.

Chandas

Likely Triṣṭubh (requires verification).

यह संक्षिप्त पवमान सूक्त सोम की जीवित “तरंगों” का स्तवन करता है, जो शोधन-प्रक्रिया से वेगपूर्वक बहती हुई इन्द्र में प्रवेश करती हैं और उन्हें विजयकारी उदारता तथा प्रकाश/धन के श्रेष्ठ दान के लिए प्रबल करती हैं। इसके बाद यह प्रत्यक्ष प्रार्थना बन जाता है: शुद्ध सोम से निवेदन है कि वह धन-सम्पदा को “बिखेरे”, प्राणबल और निर्मल प्रज्ञा को दृढ़ करे, तथा समृद्धि को निकट बनाए रखे। अंत में व्यापक अभिषेक/आह्वान के साथ सूक्त समाप्त होता है, जिसमें द्यावा-पृथिवी, आदित्यगण और समस्त देवताओं को शुद्ध सोम में आनन्द लेने के लिए आमंत्रित किया जाता है।

Mantras

Mantra 1

प्र सोमस्य पवमानस्योर्मय इन्द्रस्य यन्ति जठरं सुपेशसः । दध्ना यदीमुन्नीता यशसा गवां दानाय शूरमुदमन्दिषुः सुताः ॥

सोम के पवमान (शुद्ध होते) हुए उर्मि—सुन्दर-रूप—आगे बढ़ते हैं; वे इन्द्र के उदर की ओर जाते हैं। जब वे दधि (दही) के साथ ऊँचे उठाए जाकर, सुते (निचोड़े) जाते हैं, तब यश से वे वीर को उद्-आनन्दित करते हैं—गवाम् (गौओं/किरणों) के दान के लिए उसे ऊपर उठाते हैं।

Mantra 2

अच्छा हि सोमः कलशाँ असिष्यददत्यो न वोळ्हा रघुवर्तनिर्वृषा । अथा देवानामुभयस्य जन्मनो विद्वाँ अश्नोत्यमुत इतश्च यत् ॥

क्योंकि सोम सचमुच कलशों की ओर वेग से दौड़ता है—मानो भार वहन करने वाला तीव्र अश्व; वह वृषभ है, तीव्र-मार्गों वाला। तब देवों के उभय-जन्म (दोहरी उत्पत्ति) का जो ज्ञाता है, वह उस (तत्त्व) को प्राप्त करता है—जो अमुतः (उधर से) भी है और इतः (इधर से) भी।

Mantra 3

आ नः सोम पवमानः किरा वस्विन्दो भव मघवा राधसो महः । शिक्षा वयोधो वसवे सु चेतुना मा नो गयमारे अस्मत्परा सिचः ॥

हे पवमान सोम, हमारे पास आओ; वसु (सम्पदा) का छिड़काव करो। हे इन्दु, हमारे लिए महत् राधस् (महान् दान/समृद्धि) देने वाले मगवान् बनो। सु-चेतुना (स्वच्छ प्रज्ञा) से हमें वयोधः (जीवन-बल की वृद्धि) सिखाओ; हमारी गयम् (लाभ/प्राप्ति) को हमसे परे, दूर मत उँडेलो।

Mantra 4

आ नः पूषा पवमानः सुरातयो मित्रो गच्छन्तु वरुणः सजोषसः । बृहस्पतिर्मरुतो वायुरश्विना त्वष्टा सविता सुयमा सरस्वती ॥

हमारे पास पवमान सोम के साथ उत्तम दाता पूषन् आएँ; मित्र और वरुण एकमत होकर आएँ। बृहस्पति, मरुत्, वायु, अश्विनौ, त्वष्टृ, सविता, सुयमा और सरस्वती—सब निकट आएँ।

Mantra 5

उभे द्यावापृथिवी विश्वमिन्वे अर्यमा देवो अदितिर्विधाता । भगो नृशंस उर्वन्तरिक्षं विश्वे देवाः पवमानं जुषन्त ॥

जो सबको गति देने वाले हैं—वे दोनों द्यावा-पृथिवी; देव अर्यमन् और विधाता अदिति; भग, नृशंस और विस्तृत अन्तरिक्ष—और समस्त देवगण पवमान सोम में प्रसन्न हों।

Frequently Asked Questions

The hymn addresses Soma in his purified form (Soma Pavamāna/Indu). It especially highlights Soma’s role in empowering Indra, while ending with an all-gods (Viśvedevas) appreciation of Soma.

In ritual language it describes the purified Soma drink being offered to Indra, which ‘fills’ him with exhilaration and strength. Symbolically it suggests purified energy entering the power of action and victory.

It asks Soma to scatter wealth and plenitude, increase life and strength, grant clear insight, and keep one’s gains close—so prosperity is not ‘poured away’ far from the worshipper.

Ask anything about Sukta 81 of the Rig Veda

Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.

Not sure where to start?

A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.

Read Rig Veda in the Vedapath app

Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Sanskrit recitation where available, and more.

Continue reading in the Vedapath app

Open in App