Rig Veda Sukta 74
Mandala 9Sukta 749 Mantras

Sukta 74

Sukta 9.74

Rishi

Unknown/uncertain in provided input

Devata

Soma Pavamāna (with imagery overlapping Agni/solar pursuit of svar)

Chandas

Jagatī (probable; verify)

यह पवमान सोम-सूक्त निचोड़े गए सोम की स्तुति करता है—एक दीप्तिमान, नवजात-सा तेज जो स्वर्गीय प्रकाश (स्वर) की ओर वेग से दौड़ता है, ऊनी छननी में गर्जना करता हुआ और जल-धाराओं में मिलकर प्रवाहित होता है। इसमें सोम को द्यौ का बीज और अदिति की गर्भ-शक्ति के रूप में चित्रित किया गया है, जो यजमान के लिए समृद्धि (दूध, बल, संतान) बढ़ाता है। सूक्त का समापन सोम की अंतिम शुद्धि और स्पष्ट प्रार्थना से होता है कि वह इन्द्र के पान हेतु मधुर और उन्मादक/उत्साहवर्धक बने।

Mantras

Mantra 1

शिशुर्न जातोऽव चक्रदद्वने स्वर्यद्वाज्यरुषः सिषासति । दिवो रेतसा सचते पयोवृधा तमीमहे सुमती शर्म सप्रथः ॥

नवजात शिशु की भाँति वह वन में पुकार उठता है, जब अरुण—बलवाही—प्रकाश (स्वर्) की अभिलाषा करता है। वह दिव्य रेतस् से संयुक्त होता है, और पयः की वृद्धि करता है—समृद्धि का दुग्ध। उसी को हम पुकारते हैं—विस्तृत शान्ति के लिए, और सुमति—दीप्त, सम्यक्-बुद्धि—के आश्रय के लिए।

Mantra 2

दिवो यः स्कम्भो धरुणः स्वातत आपूर्णो अंशुः पर्येति विश्वतः । सेमे मही रोदसी यक्षदावृता समीचीने दाधार समिषः कविः ॥

जो दिव्य लोक का स्कम्भ (स्तम्भ) और धारण (आधार) है, अपनी ही व्यापकता में तना हुआ—वह पूर्ण अंशु (किरण/रस) सर्वत्र परिभ्रमण करता है। उसने इन दो महान् रोदसी (द्यावा–पृथिवी) को आलिंगित किया है और उन्हें आमने-सामने स्थिर धारण किया है; कवि (द्रष्टा) समिषः—आनन्द-शक्तियों—को समरसता में एकत्र करता है।

Mantra 3

महि प्सरः सुकृतं सोम्यं मधूर्वी गव्यूतिरदितेॠतं यते । ईशे यो वृष्टेरित उस्रियो वृषापां नेता य इतऊतिॠग्मियः ॥

महान् है वह प्रवाह-गति—सुकृत, सोम्य मधु; विस्तृत है अदिति की गव्यूति (चरागाह-पथ), आगे बढ़ता हुआ ऋत। जो यहाँ से वृष्टि और उज्ज्वल गौओं (किरण-धेनुओं) पर शासन करता है; वह वृषभ, आपः (जल) का नेता—उसकी यहाँ से प्राप्त ऊति (सहायता) ऋग्मिय (स्तुत्य) है।

Mantra 4

आत्मन्वन्नभो दुह्यते घृतं पय ऋतस्य नाभिरमृतं वि जायते । समीचीनाः सुदानवः प्रीणन्ति तं नरो हितमव मेहन्ति पेरवः ॥

आत्मन्वत् नभ (स्वाधीन आकाश) से घृत और पयः (दीप्त मधुरता) दुहा जाता है; ऋत की नाभि से अमृत जन्म लेता है और फैलता है। जो समीचीन (ऋत-अनुकूल) हैं, वे सुदानव (सदादानी) उसे तृप्त करते हैं; नर, उसे भीतर स्थापित करके, उसे पोषक वर्षा की भाँति नीचे उँडेलते हैं।

Mantra 5

अरावीदंशुः सचमान ऊर्मिणा देवाव्यं मनुषे पिन्वति त्वचम् । दधाति गर्भमदितेरुपस्थ आ येन तोकं च तनयं च धामहे ॥

अंशु (सोम-किरण) तरंग के साथ चलता हुआ गरजा; वह मनुष्य के लिए देव-अन्वेषी ‘त्वचा’ (बाह्य आवरण/प्रकृति) को पुष्ट करता है। वह अदिति की गोद में गर्भ को धारण कराता है—जिसके द्वारा हम बालक और संतान, और अनन्त में प्रतिष्ठित धाम को धारण करें।

Mantra 6

सहस्रधारेऽव ता असश्चतस्तृतीये सन्तु रजसि प्रजावतीः । चतस्रो नाभो निहिता अवो दिवो हविर्भरन्त्यमृतं घृतश्चुतः ॥

हज़ार धाराओं वाले स्रोत से वे नीचे उतरीं—अविच्छिन्न बहती हुई; वे तृतीय रजस् में, प्रजा-समृद्ध हों। चार नाभियाँ स्वर्ग के आधार रूप में स्थापित हैं; वे हवि लाती हैं—अमृत, घृत-च्युत (घृत-रस से टपकता)।

Mantra 7

श्वेतं रूपं कृणुते यत्सिषासति सोमो मीढ्वाँ असुरो वेद भूमनः । धिया शमी सचते सेमभि प्रवद्दिवस्कवन्धमव दर्षदुद्रिणम् ॥

जब वह प्रवृत्त होने की इच्छा करता है, तब वह श्वेत रूप धारण करता है—सोम, बलवान दाता, वह असुर जो विशालता को जानता है। धिया से वह शमी (शान्ति/प्रशमन-शक्ति) के साथ जुड़ता है; और वह आगे बढ़ाता है—दिव्य कस्क (पात्र) को प्रकट करता हुआ, ऊँचे उठे प्रवाह को नीचे उँडेलता है।

Mantra 8

अध श्वेतं कलशं गोभिरक्तं कार्ष्मन्ना वाज्यक्रमीत्ससवान् । आ हिन्विरे मनसा देवयन्तः कक्षीवते शतहिमाय गोनाम् ॥

तब श्वेत कलश, गो-रश्मियों से अभ्यक्त, विजयी वेग से—रस निचोड़ते हुए—ऊपर चढ़ता है। देव-याचक जन मन से उसे आगे बढ़ाते हैं—कक्षीवान् की ओर, गो-सम्पदा की शत-हिम (शत-वर्षीय) समृद्धि के लिए।

Mantra 9

अद्भिः सोम पपृचानस्य ते रसोऽव्यो वारं वि पवमान धावति । स मृज्यमानः कविभिर्मदिन्तम स्वदस्वेन्द्राय पवमान पीतये ॥

हे सोम, जलों से मिश्रित तुम्हारा रस—ऊन-छन्नित—हे पवमान, छननी से होकर बह निकलता है। कवियों द्वारा परिमार्जित होकर, परम मदिर आनन्द बन; इन्द्र के पान हेतु मधुर हो—हे पवमान।

Frequently Asked Questions

The hymn praises Soma as Pavamāna—Soma juice that purifies itself as it flows through the woolen filter during the Soma sacrifice.

It uses birth and light imagery to show Soma’s fresh, living force: he ‘cries out’ as he is pressed and then rushes like a radiant beam seeking svar (the Light).

It describes the actual filtration—Soma mixed with water running through the wool strainer—and asks that the clarified Soma become sweet and power-giving for Indra to drink.

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