
Sukta 9.57
Soma Pavamāna
यह संक्षिप्त सोम पवमान सूक्त सोम की स्तुति करता है कि वह छलनी (पवित्र) से होकर अविच्छिन्न धाराओं में बहता है—मानो स्वर्ग से उतरती वर्षा—और प्रचुर बल व समृद्धि (वाज) की ओर अग्रसर होता है। रस के शुद्ध होकर ‘माँजे’ जाने पर सोम को राजस, धर्म-पालक और वेगवान माना गया है—जैसे कोई श्येन (बाज़) निधि पर आकर बैठता है। उससे प्रार्थना की जाती है कि वह स्वर्ग और पृथ्वी से समस्त धन-वैभव उपासकों के लिए ले आए।
Mantra 1
प्र ते धारा असश्चतो दिवो न यन्ति वृष्टयः । अच्छा वाजं सहस्रिणम् ॥
तेरी अविराम धाराएँ आगे बढ़ती हैं, जैसे द्युलोक से बरसती वृष्टियाँ; वे सहस्रगुण वाज—बल-समृद्धि—की ओर जाती हैं।
Mantra 2
अभि प्रियाणि काव्या विश्वा चक्षाणो अर्षति । हरिस्तुञ्जान आयुधा ॥
वह सब प्रिय काव्य-शक्तियों को निहारता हुआ प्रवाहित होता है; हरितवर्ण (हरि) अपने आयुध—कर्म-शक्तियों—को आगे हाँकता है।
Mantra 3
स मर्मृजान आयुभिरिभो राजेव सुव्रतः । श्येनो न वंसु षीदति ॥
वह प्राण-शक्तियों से परिष्कृत होकर, राजा-सा बलवान और सुव्रत—ऋत के प्रति निष्ठ—होकर, श्येन की भाँति वांछित वसु-धन पर आ बैठता है।
Mantra 4
स नो विश्वा दिवो वसूतो पृथिव्या अधि । पुनान इन्दवा भर ॥
वह हमारे लिए स्वर्ग से और पृथ्वी से भी समस्त वसु (धन-सम्पदा) ले आ; हे इन्दु, अपने पावन प्रवाह में उन्हें हमारे पास धारण कर ला।
It praises Soma as he is purified (pavamāna) in flowing streams, compares his movement to heavenly rain, and asks him to bring strength (vāja) and riches to the worshippers.
Soma Pavamāna is the Soma juice in its purified, clarified form—called Indu—flowing through the ritual filter and believed to grant vitality, victory, and prosperity.
Rain imagery shows Soma’s abundant, unstoppable flow, while the falcon image suggests swift, decisive arrival and secure settling on the ‘treasure’—the desired prize of strength and wealth.
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