
Sukta 9.41
Soma Pavamāna (streams/forces of Soma)
यह संक्षिप्त पवमान सूक्त सोम की उस प्रवाहित, परिशुद्ध अवस्था की स्तुति करता है, जब वह छननी से वेगपूर्वक होकर अज्ञान-तमस् की “काली त्वचा” को उतार फेंकता है और उज्ज्वल, अथक शक्ति को प्रकट करता है। इसमें सोम से प्रार्थना है कि वह यजमानों/यज्ञकर्त्ताओं की ओर प्रचुर पोषण के साथ धारा बने—गोधन, स्वर्ण-सदृश तेज, अश्व, और विजयी बल प्रदान करे—और उन्हें शान्ति देने वाली रक्षा से चारों ओर से घेर ले। इस स्तुति का प्रयोजन अनुष्ठानिक भी है (सोम-पीषण को समर्थ करना) और आध्यात्मिक भी (सोम के रस द्वारा चेतना का परिशोधन/स्पष्टीकरण)।
Mantra 1
प्र ये गावो न भूर्णयस्त्वेषा अयासो अक्रमुः । घ्नन्तः कृष्णामप त्वचम् ॥
वे आगे उमड़ते हैं, जैसे गौएँ घूर्णित वेग से; तेजस्वी, अयास (अथक) शक्तियाँ कदम बढ़ाती हैं, और कृष्ण त्वचा—अन्धकार का आवरण—को प्रहार करके दूर कर देती हैं।
Mantra 2
सुवितस्य मनामहेऽति सेतुं दुराव्यम् । साह्वांसो दस्युमव्रतम् ॥
हम सु-वित (कल्याण-मार्ग) की ओर मन को लगाते हैं; दुर्गम सेतु को लाँघकर परे जाते हैं। विजयी होकर हम उस अव्रत दस्यु को—जो ऋत के कर्म को नहीं मानता—परास्त करते हैं।
Mantra 3
शृण्वे वृष्टेरिव स्वनः पवमानस्य शुष्मिणः । चरन्ति विद्युतो दिवि ॥
वर्षा के समान उसकी ध्वनि सुनाई देती है—शुद्धि करने वाले, शुष्मिन् पवमान सोम की। उसकी विद्युतें दिवि में विचरती हैं।
Mantra 4
आ पवस्व महीमिषं गोमदिन्दो हिरण्यवत् । अश्वावद्वाजवत्सुतः ॥
हे इन्दु, हमारे पास प्रवाहित हो—महान् इष (पोषण) लेकर; गोमद् (किरण-सम्पन्न), हिरण्यवत् (दीप्ति-सम्पन्न), अश्वावत् (प्राण-बल-सम्पन्न), वाजवत् (शक्ति-सम्पन्न)—हे सुते, जो कर्म के लिए निचोड़ा गया है।
Mantra 5
स पवस्व विचर्षण आ मही रोदसी पृण । उषाः सूर्यो न रश्मिभिः ॥
हे विचक्षण पवमान सोम! प्रवाहित हो; महती दोनों रोदसी (द्यावा‑पृथिवी) को भर दे। जैसे उषा और सूर्य अपनी रश्मियों से (जगत् को) आप्लावित करते हैं, वैसे ही तू हमें तेजोमय धाराओं से परिपूर्ण कर।
Mantra 6
परि णः शर्मयन्त्या धारया सोम विश्वतः । सरा रसेव विष्टपम् ॥
हे सोम! शान्ति और आश्रय देने वाली अपनी धारा से हमें सब ओर से परि‑आवृत कर। रस के समान—शुद्ध सार‑तत्त्व की भाँति—हमारे स्थिर लोक (विष्टप) में सर्वत्र प्रवाहित हो।
It praises Soma as he flows in purified streams, drives away darkness, and brings nourishment, wealth, strength, and protective peace to the worshippers.
It is a metaphor for purification: as Soma is strained, he casts off impurity; spiritually, it points to removing inner ignorance and obscurity.
It is suited to recitation during soma pressing and straining, when the juice is purified and offered, while praying for prosperity and shelter for the community.
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