Rig Veda Sukta 4
Mandala 9Sukta 410 Mantras

Sukta 4

Sukta 9.4

Devata

Soma Pavamāna

यह पवमान सोम-सूक्त शुद्ध किए जाने वाले सोम की स्तुति करता है—जब उसे निचोड़ा और छाना जाता है। उससे बार-बार विजय पाने, महान यश अर्जित करने, और उपासकों को अधिक उत्तम तथा अधिक दीप्तिमान अवस्था में रूपान्तरित करने की प्रार्थना की जाती है। प्रत्येक याचना को ‘अथा नो वस्यसस् कृधि’—“अब हमें और श्रेष्ठ बना”—यह ध्रुवपद बाँधता है: दीर्घायु और सूर्य-दर्शन, तेजस्वी धन, तथा सोम की इच्छा और सहायता से पोषक समृद्धि।

Mantras

Mantra 1

सना च सोम जेषि च पवमान महि श्रवः । अथा नो वस्यसस्कृधि ॥

हे सोम, सदा और फिर-फिर हमारे लिए विजय कर; हे पवमान, महान यश (श्रवः) प्राप्त कर। तब हमें अधिक उत्तम/कल्याणमय अवस्था में ढाल दे।

Mantra 2

सना ज्योतिः सना स्वर्विश्वा च सोम सौभगा । अथा नो वस्यसस्कृधि ॥

सदा ज्योति है, सदा स्वर्ग (स्वः) है, और हे सोम, समस्त सौभाग्य भी। तब हमें अधिक उत्तम/श्रेष्ठ अवस्था में ढाल दे।

Mantra 3

सना दक्षमुत क्रतुमप सोम मृधो जहि । अथा नो वस्यसस्कृधि ॥

हे सोम! हमारे भीतर सदा दक्षता और क्रतु (संकल्प-शक्ति) को स्थिर रख; और शत्रुतापूर्ण मृध् (दबाव/आघात) को दूर कर। तब हमें अधिक उत्तम अवस्था में ढाल दे।

Mantra 4

पवीतारः पुनीतन सोममिन्द्राय पातवे । अथा नो वस्यसस्कृधि ॥

हे पवितारो (शोधक/पवित्र करने वाले)! इन्द्र के पान हेतु सोम को पवित्र करो; तब हमें अधिक उत्तम अवस्था में ढाल दो।

Mantra 5

त्वं सूर्ये न आ भज तव क्रत्वा तवोतिभिः । अथा नो वस्यसस्कृधि ॥

हे सोम! सूर्य में हमें सहभागी कर—अपने क्रतु (प्रभावी संकल्प) और अपनी ऊतियों (सहायताओं) से। तब हमें अधिक उत्कृष्ट अवस्था में ढाल दे।

Mantra 6

तव क्रत्वा तवोतिभिर्ज्योक्पश्येम सूर्यम् । अथा नो वस्यसस्कृधि ॥

तेरे क्रतु (प्रभावी संकल्प) और तेरी उतियों (सहायताओं) से हम दीर्घकाल तक सूर्य का दर्शन करें; फिर हमें अधिक उत्तम अवस्था में ढाल दे।

Mantra 7

अभ्यर्ष स्वायुध सोम द्विबर्हसं रयिम् । अथा नो वस्यसस्कृधि ॥

हमारी ओर प्रवाहित हो, हे सोम, स्वायुध (सुसज्ज) होकर; द्विगुण-बलवर्धक धन-सम्पदा ले आ। फिर हमें अधिक उत्तम अवस्था में ढाल दे।

Mantra 8

अभ्यर्षानपच्युतो रयिं समत्सु सासहिः । अथा नो वस्यसस्कृधि ॥

हमारी ओर प्रवाहित हो, हे (सोम), अपच्युत—अच्युत और अडिग; संग्रामों में विजयी कराने वाली सम्पदा लेकर। फिर हमें अधिक उत्तम अवस्था में ढाल दे।

Mantra 9

त्वां यज्ञैरवीवृधन्पवमान विधर्मणि । अथा नो वस्यसस्कृधि ॥

हे पवमान सोम! यज्ञों द्वारा उन्होंने तुम्हें कर्म-धर्म के विधान में बढ़ाया है; तब हमें और उत्तम अवस्था में ढाल दे।

Mantra 10

रयिं नश्चित्रमश्विनमिन्दो विश्वायुमा भर । अथा नो वस्यसस्कृधि ॥

हे इन्दु! हमारे लिए चित्र-दीप्तिमान धन—अश्ववत् शीघ्र और सर्वथा विश्वायुमान—ले आ; तब हमें और उत्तम अवस्था में ढाल दे।

Frequently Asked Questions

It asks the purifying Soma to win victory and glory for the worshippers and to transform them into a better, more luminous state of well-being.

In Vedic language, beholding the Sun signifies sustained life, order, and clear awareness; the hymn prays that Soma’s power and help grant long-lasting vitality and insight.

It is suited to the Soma sacrifice during the pressing and filtering of Soma, when Pavamāna verses accompany the juice as it is purified and prepared for offering.

Ask anything about Sukta 4 of the Rig Veda

Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.

Not sure where to start?

A free Google sign-in keeps your chat saved across web and the app.

Read Rig Veda in the Vedapath app

Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Sanskrit recitation where available, and more.

Continue reading in the Vedapath app

Open in App