
Sukta 9.38
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Soma Pavamāna
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यह संक्षिप्त पवमान सूक्त सोम की स्तुति करता है जब उसे निचोड़ा और शुद्ध किया जाता है—वह प्रबल वृषभ-रथ के समान वेग से बहता हुआ समृद्धि और बल की ओर अग्रसर होता है। मंत्रों में सोम की तीव्र गति का वर्णन है, जो मनुष्यों के लोक में प्रवेश करता है और ‘प्रिय योनि’—उस आश्रय-स्थान—की ओर निकट आता है, जहाँ वह अर्पण और पान के योग्य बनता है। इसका उद्देश्य शोधन-प्रवाह को पवित्र ठहराना और यज्ञ में सोम की स्फूर्तिदायक, जीवन-पोषक शक्ति का आवाहन करना है।
Mantra 1
एष उ स्य वृषा रथोऽव्यो वारेभिरर्षति । गच्छन्वाजं सहस्रिणम् ॥
यह ही वह बलवान वृषभ—रथ—है; अव्य (अविनाशी) आवरणों सहित वह प्रवाहित होता है, सहस्रगुण वाज (बल-समृद्धि) की ओर बढ़ता हुआ।
Mantra 2
एतं त्रितस्य योषणो हरिं हिन्वन्त्यद्रिभिः । इन्दुमिन्द्राय पीतये ॥
त्रित के इस हरितवर्ण (सोम) को युवतियाँ द्रोण-पाषाणों से प्रेरित करती हैं—इन्द्र के पान हेतु यह उज्ज्वल इन्दु-बिन्दु।
Mantra 3
एतं त्यं हरितो दश मर्मृज्यन्ते अपस्युवः । याभिर्मदाय शुम्भते ॥
इसी को दस हरितवर्ण अश्व—कर्म में तत्पर—माँजते हैं; जिनके द्वारा वह मद-उल्लास हेतु शोभित होता है।
Mantra 4
एष स्य मानुषीष्वा श्येनो न विक्षु सीदति । गच्छञ्जारो न योषितम् ॥
यह सोम मनुष्यों के बीच कुलों में बाज़-सा आकर बैठता है; वह प्रियसी की ओर जाने वाले जार-सा आगे बढ़ता है।
Mantra 5
एष स्य मद्यो रसोऽव चष्टे दिवः शिशुः । य इन्दुर्वारमाविशत् ॥
यह उसका मधुर रस है—दिव्य शिशु—जो यहाँ नीचे दिखाई देता है; वही उज्ज्वल इन्दु-बिन्दु, जो वाड़ (आवरण/परिसर) में प्रविष्ट हुआ है।
Mantra 6
एष स्य पीतये सुतो हरिरर्षति धर्णसिः । क्रन्दन्योनिमभि प्रियम् ॥
यह निचोड़ा हुआ सोम, हरित-पीत वर्ण का, धारास्वरूप बहता हुआ, पान के लिए अग्रसर होता है—आधार में दृढ़; गर्जना करता हुआ, अपने प्रिय योनि-स्थान, अपने ही प्रिय प्रकटि-आसन की ओर दौड़ता है।
It praises Soma while he is being pressed and purified, describing his swift streaming through the filter and his arrival into the vessel where he becomes fit for offering and drinking.
The falcon image conveys speed and decisive arrival among the clans, while the lover image conveys intimacy and inevitability—Soma is drawn to his proper seat and to those who welcome him in the rite.
It refers to Soma’s rightful settling place after purification—both the ritual vessel/seat of collection and, symbolically, the stable ground where refined power becomes fully present and usable.
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