Rig Veda Sukta 36
Mandala 9Sukta 366 Mantras

Sukta 36

Sukta 9.36

Devata

Soma Pavamāna

यह संक्षिप्त पवमान सूक्त सोम का स्तवन करता है—जब वह पेषण से मुक्त होकर ऊनी छन्ने में प्रवेश करता है और जुड़वाँ पात्रों में धाराओं से बहता है—तब वह शुद्ध और देवताओं के लिए सामर्थ्यवान बनता है। मंत्र उसके ऋत (नियमित, सत्य-अन्वेषी) प्रवाह, उसकी बलवर्धक शक्ति, और स्वर्गलोक की ओर उसके आरोहण की प्रशंसा करते हैं, जो यजमान को ओज, प्रकाश और वीर-बल प्रदान करता है।

Mantras

Mantra 1

असर्जि रथ्यो यथा पवित्रे चम्वोः सुतः । कार्ष्मन्वाजी न्यक्रमीत् ॥

रथी के समान वेग से मुक्त हुआ, निचोड़ा हुआ सोम पवित्र (पवित्र) में और दोनों चमुओं (पात्रों) में प्रवेश करता है; बल-समृद्धि का वाहक होकर वह यज्ञ के कर्म-क्षेत्र में उतरकर कदम बढ़ाता है।

Mantra 2

स वह्निः सोम जागृविः पवस्व देववीरति । अभि कोशं मधुश्चुतम् ॥

हे सोम, वह्नि (वहक-अग्नि) और जाग्रत्—पवित्र होकर प्रवाहित हो; देववीरत्व की ओर बढ़; मधु-रस टपकाने वाले कोश (पात्र) की ओर अभिमुख हो।

Mantra 3

स नो ज्योतींषि पूर्व्य पवमान वि रोचय । क्रत्वे दक्षाय नो हिनु ॥

हे पवमान, हमारे लिए प्राचीन ज्योतियों को प्रकाशित कर; हमें क्रतु (सत्कर्म-इच्छा) और दक्ष (प्रभावी विवेक-शक्ति) की ओर प्रेरित कर।

Mantra 4

शुम्भमान ऋतायुभिर्मृज्यमानो गभस्त्योः । पवते वारे अव्यये ॥

ऋत के अन्वेषकों से अलंकृत, गभस्ति (हाथों की किरणों) में परिशोधित—वह अव्यय वारे (अक्षय धारा) में प्रवाहित होता है।

Mantra 5

स विश्वा दाशुषे वसु सोमो दिव्यानि पार्थिवा । पवतामान्तरिक्ष्या ॥

वह सोम, पवमान होकर, दाता (दाशुष) को समस्त वसु प्रदान करे—दिव्य, पार्थिव, और अन्तरिक्षीय (प्राण-लोक) धन।

Mantra 6

आ दिवस्पृष्ठमश्वयुर्गव्ययुः सोम रोहसि । वीरयुः शवसस्पते ॥

हे सोम, अश्व-शक्ति की कामना से, गो-तेज की कामना से, तू दिवःपृष्ठ पर आरोहण करता है; वीर-शक्ति की कामना से—हे शवसस्पति, बल के स्वामी।

Frequently Asked Questions

It describes Soma being pressed, running through the woolen filter, filling the bowls, and becoming purified and powerful for offering in the sacrifice.

Pavamāna means “self-purifying.” The hymn focuses on Soma’s cleansing as he flows through the filter and is made fit for the gods.

It seeks strength and plenitude (vāja/śavas), clarity and truth-order (ṛta), and an uplifting, heaven-reaching power that supports heroic vitality in the worshipper.

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