
Sukta 9.33
Soma-Pavamāna seer tradition (exact rishi uncertain in provided input).
Soma Pavamāna (plural streams).
Likely Gāyatrī or Triṣṭubh depending on hymn structure; needs verification from full sukta metrical pattern.
यह संक्षिप्त पवमान सूक्त सोम की अनेक प्रवाहित धाराओं की स्तुति करता है—जब वह शुद्ध किया जाता है और जल-तरंगों की भाँति गति में प्रवृत्त होता है, तथा वृषभों की तरह बलपूर्वक आगे बढ़ता है। इसमें छनन और आहुति की बाह्य यज्ञ-क्रिया को अंतःप्रकाश से जोड़ा गया है—सोम की ‘हरित-पीत’ शक्ति, प्रेरित वाणी का उदय, और विशाल, चतुर्विध समृद्धि का वरदान।
Mantra 1
प्र सोमासो विपश्चितोऽपां न यन्त्यूर्मयः । वनानि महिषा इव ॥
सोम-शक्तियाँ प्रकट होकर आगे बढ़ती हैं—विपश्चित् (विवेक-सम्पन्न) होकर—जैसे जल की तरंगें; और जैसे महान वृषभ, वे वनों को भेदती हुई आगे धकेलती हैं।
Mantra 2
अभि द्रोणानि बभ्रवः शुक्रा ऋतस्य धारया । वाजं गोमन्तमक्षरन् ॥
ऋत की धारा में, भूरि-दीप्त (बभ्रु) धाराएँ द्रोणों (कुंडों) की ओर बह पड़ीं; वे गो-सम्पन्न वाज (बल-समृद्धि) को टपकाती/उँडेलती हैं।
Mantra 3
सुता इन्द्राय वायवे वरुणाय मरुद्भ्यः । सोमा अर्षन्ति विष्णवे ॥
सुते हुए सोम-प्रवाह इन्द्र और वायु के लिए, वरुण के लिए, मरुतों के लिए बहते हैं; और विष्णु के लिए भी—ऋत, विशालता और सम्यक्-बल की देवशक्तियों की ओर।
Mantra 4
तिस्रो वाच उदीरते गावो मिमन्ति धेनवः । हरिरेति कनिक्रदत् ॥
तीन वाणियाँ उठती हैं; रश्मियाँ (गावः) दुग्ध-धेनुओं की भाँति रंभाती हैं; और हरि (ताम्र-स्वर्ण) आगे बढ़ता है, कणिकरदत्—घोष करता हुआ।
Mantra 5
अभि ब्रह्मीरनूषत यह्वीॠतस्य मातरः । मर्मृज्यन्ते दिवः शिशुम् ॥
पवित्र ब्रह्म-वाणियाँ स्तुति में उसकी ओर उमड़ती हैं; ऋत की महाबली माताएँ दिव्य शिशु को माँजती-निखारती हैं।
Mantra 6
रायः समुद्राँश्चतुरोऽस्मभ्यं सोम विश्वतः । आ पवस्व सहस्रिणः ॥
हे सोम, चारों दिशाओं से हमारे लिए अपने को पवित्र कर; आध्यात्मिक समृद्धि के चार समुद्र—सहस्रगुण परिपूर्णता सहित—लेकर आ।
It praises Soma as he is purified and made ready for offering, describing him as wave-like streams that bring clarity, inspired speech, and abundant prosperity.
Waves express Soma’s flowing purification, while bulls express his force—his ability to break through obstacles and energize the ritual and the worshipper’s inner life.
It is a poetic way of asking for vast, complete abundance from every direction—material and spiritual plenitude gathered into a single, overflowing gift.
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