
Sukta 9.31
Soma Pavamāna
यह संक्षिप्त पवमान सूक्त सोम की स्तुति करता है कि वह शोधन-क्रिया में “अग्रसर” होता हुआ, जीवित धाराओं के समान प्रवाहित होता है और जाग्रत, चेतन संपदा (चेतना रयि) प्रदान करता है। इसमें प्रार्थना है कि सोम चारों दिशाओं से संचित बल लेकर परिपूर्ण हो, वाज (विजयी शक्ति) की सभा में उपस्थित रहे, और अंत में इन्दु की मैत्री की याचना है—उस स्वामी की, जो भव (होने की प्रक्रिया) और लोकों को धारण करता है।
Mantra 1
प्र सोमासः स्वाध्यः पवमानासो अक्रमुः । रयिं कृण्वन्ति चेतनम् ॥
प्र—आगे बढ़ते हैं—स्वाध्यः सोमासः, पवमानासः; वे अक्रमुः—अग्रसर हुए; और हमारे लिए चेतनम् रयिम् कृण्वन्ति—जाग्रत, चेतन धन-समृद्धि रचते हैं।
Mantra 2
दिवस्पृथिव्या अधि भवेन्दो द्युम्नवर्धनः । भवा वाजानां पतिः ॥
हे इन्दु! दिव और पृथ्वी के ऊपर अधिष्ठित हो; तू द्युम्न-वर्धन, तेजस्वी सामर्थ्य का वर्धक बन। वाजों का, बल-समृद्धियों का स्वामी हो।
Mantra 3
तुभ्यं वाता अभिप्रियस्तुभ्यमर्षन्ति सिन्धवः । सोम वर्धन्ति ते महः ॥
तेरे लिए वायु प्रिय आकर्षण से दौड़ते हैं; तेरे लिए नदियाँ प्रवाहित होती हैं—हे सोम। वे तेरे महत्त्व, तेरी महान व्यापकता को बढ़ाते हैं।
Mantra 4
आ प्यायस्व समेतु ते विश्वतः सोम वृष्ण्यम् । भवा वाजस्य संगथे ॥
हे सोम! पूर्णता को प्राप्त हो; तेरी वृष्ण्य—वीर्य-शक्ति—चारों ओर से तेरे पास एकत्र हो। वाज की संगति, बल-समृद्धि के समागम-स्थल में उपस्थित हो।
Mantra 5
तुभ्यं गावो घृतं पयो बभ्रो दुदुह्रे अक्षितम् । वर्षिष्ठे अधि सानवि ॥
हे बभ्रु (ताम्रवर्ण) सोम! तुम्हारे लिए प्रकाश-गावें घृत और दूध दुहती हैं—अक्षय, अविनाशी समृद्धि—अति-वर्षक शिखर पर, सानु के ऊपर।
Mantra 6
स्वायुधस्य ते सतो भुवनस्य पते वयम् । इन्दो सखित्वमुश्मसि ॥
हे इन्दु! सत्यस्वरूप, स्व-शस्त्र (स्वशक्ति) से युक्त, भुवन के स्वामी—हम तुम्हारे साथ सख्य चाहते हैं; हमारे भीतर के लोकों के कर्म में तुम हमारे मित्र-সহायक बनो।
Soma Pavamāna is Soma “while being purified”—the pressed juice flowing through the filter, praised as a living, luminous power that strengthens and inspires.
The hymn asks Soma to bring rayi (wealth, abundance) that is cetanā—awakening and intelligent—so prosperity also becomes clarity, energy, and right capacity in life.
Calling Indu a friend means seeking an ongoing inner and outer alliance: protection, strength, and guidance from the purified divine essence that supports the worlds and the worshipper’s work.
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