
Sukta 9.30
Soma Pavamāna
यह संक्षिप्त पवमान सूक्त सोम की स्तुति करता है—जब वह शक्तिशाली धाराओं में छननी से वेगपूर्वक होकर प्रवाहित होता है, शुद्ध होता है और उपासकों में प्रेरित वाणी (वाक्) को जाग्रत करता है। यह अनुष्ठान में सोम की गति का अनुसरण करता है: बहती हुई शुद्धि से लेकर कुंडों/पात्रों में उसके “आसीन” होने तक; और अंत में स्पष्ट आदेश देता है कि इन्द्र के लिए परम मधुर सोम का पेषण करो, जिससे देवगण हर्षोल्लास और बल में प्रविष्ट हों।
Mantra 1
प्र धारा अस्य शुष्मिणो वृथा पवित्रे अक्षरन् । पुनानो वाचमिष्यति ॥
इस शुष्मिन् (बलवान) के प्रवाह पवित्र (छन्नी) में स्वच्छन्द होकर बह निकलते हैं; और वह स्वयं को पवित्र करता हुआ हमारे भीतर प्रेरित वाणी को उकसाता, गतिमान करता है।
Mantra 2
इन्दुर्हियानः सोतृभिर्मृज्यमानः कनिक्रदत् । इयर्ति वग्नुमिन्द्रियम् ॥
इन्दु वेग से अग्रसर होता हुआ, सोतृजनों द्वारा मृज्यमान (शुद्ध किया जाता) हुआ, हर्ष से निनाद करता है। वह अन्तःस्थित इन्द्रिय—इन्द्र-शक्ति—के जाग्रत अग्नि-तेज को प्रवृत्त करता है।
Mantra 3
आ नः शुष्मं नृषाह्यं वीरवन्तं पुरुस्पृहम् । पवस्व सोम धारया ॥
हे सोम, अपनी धारा में हमारे पास प्रवाहित हो—नृसाह्य (मनुष्यों की बाधाओं को जीतने वाला) बल, वीरों से युक्त, बहु-अभिलषित—हममें भर दे।
Mantra 4
प्र सोमो अति धारया पवमानो असिष्यदत् । अभि द्रोणान्यासदम् ॥
शुद्ध होता हुआ सोम धारा के पार उछलकर आगे बढ़ता है। वह द्रोणों की ओर धावता है, वहाँ आसन ग्रहण करता है—हमारे भीतर तैयार पात्रों में स्वच्छ आनन्द-रस को प्रतिष्ठित करता है।
Mantra 5
अप्सु त्वा मधुमत्तमं हरिं हिन्वन्त्यद्रिभिः । इन्दविन्द्राय पीतये ॥
अप्सु—जल-धाराओं में—तुम्हें, हे मधुमत्तम हरि, अद्रि (पाषाण-प्रस्तर) से हिन्वन्ति, प्रेरित करते हैं; हे इन्दु, इन्द्र के पीने के लिए—कि वह तृप्त हो और विजयी बल से परिपूर्ण हो।
Mantra 6
सुनोता मधुमत्तमं सोममिन्द्राय वज्रिणे । चारुं शर्धाय मत्सरम् ॥
सु॒नोता—निचोड़ो—इन्द्राय वज्रिणे मधुमत्तम सोमम्; चारुं मत्सरम् शर्धाय—गण (शर्ध) के लिए रमणीय उन्माद-रस, जो आनन्द-उत्कर्ष बनता है।
It celebrates Soma as he is purified through the filter, becomes clarified in the vats, and is then pressed as the sweetest offering—especially for Indra—to bring strength and inspired speech.
Because purified Soma is seen as awakening inner inspiration: as the offering becomes clear, the worshipper’s mind and speech become clear and powerful for prayer and insight.
The deity praised is Soma in his purifying form (Pavamāna), but the final verse highlights that the refined Soma is pressed for Indra, the thunderbolt-bearer, to empower him and the divine host.
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