Rig Veda Sukta 20
Mandala 9Sukta 207 Mantras

Sukta 20

Sukta 9.20

Rishi

Pavamāna Soma seer tradition (RV 9).

Devata

Soma Pavamāna

Chandas

Gāyatrī

यह संक्षिप्त गायत्री सूक्त सोम पवमान की स्तुति करता है, जब वह ऊनी छननी (पवित्र) से वेगपूर्वक प्रवाहित होता है—ऋषि-सदृश धारा के रूप में, जो देवताओं के आस्वादन हेतु तैयार की गई है। कवि शुद्ध हुए सोम से प्रार्थना करता है कि वह समस्त विरोधी शक्तियों पर विजय पाए और इस स्तोत्र तथा यजमान के जीवन में स्थिर धन (ध्रुव रयि), पोषण/वृद्धि की प्रेरणा (इष्) और वीर्य-पराक्रम (सुवीर्य) प्रदान करे।

Mantras

Mantra 1

प्र कविर्देववीतयेऽव्यो वारेभिरर्षति । साह्वान्विश्वा अभि स्पृधः ॥

देवों के आनन्द हेतु कवि (सोम) आगे बहता है—अव्य (भेड़ के ऊन) के छनने से छना हुआ, श्रेष्ठ धाराओं के साथ वेग से दौड़ता हुआ—और विरोध करने वाली समस्त प्रतिरोधक शक्तियों को दबा देता है।

Mantra 2

स हि ष्मा जरितृभ्य आ वाजं गोमन्तमिन्वति । पवमानः सहस्रिणम् ॥

वह निश्चय ही, पवमान (शुद्ध होता हुआ सोम), स्तुतिकर्ताओं के लिए गोमन्त (किरण-समृद्ध) बल-सम्पदा को गति देता है—ऐसी प्रचुरता जो सहस्रगुण होकर बढ़ती है।

Mantra 3

परि विश्वानि चेतसा मृशसे पवसे मती । स नः सोम श्रवो विदः ॥

तू चेतना से समस्त वस्तुओं के चारों ओर विचरता है; तू स्पर्श करते हुए शुद्ध करता है और हमारी मति (विचार) को गढ़ता है। हे सोम, हमारे लिए श्रवस् (प्रेरित यश/सत्य-प्रसारक कीर्ति) प्रदान कर।

Mantra 4

अभ्यर्ष बृहद्यशो मघवद्भ्यो ध्रुवं रयिम् । इषं स्तोतृभ्य आ भर ॥

हे सोम! हमारे अभिमुख प्रवाहित हो; विशाल यश के साथ। मघवद्भ्यः (यज्ञ-सम्पन्न दाताओं) के लिए ध्रुव रयि (स्थिर समृद्धि) प्रदान कर। और स्तोतृभ्यः (स्तुति करने वाले ऋषियों) के लिए इष् (पोषक प्रेरणा/वृद्धि-शक्ति) भी ला—कि सत्य में अन्तःकरण परिपूर्ण और दृढ़ हो।

Mantra 5

त्वं राजेव सुव्रतो गिरः सोमा विवेशिथ । पुनानो वह्ने अद्भुत ॥

हे सोम! तू सुव्रत राजा के समान गिरः (प्रेरित वाणी/स्तोत्र) में प्रविष्ट हुआ है। हे अद्भुत वह्नि! स्वयं को पवित्र करता हुआ, तू वह शक्ति बनता है जो हमारी हवि और चेतना को आगे वहन करती है।

Mantra 6

स वह्निरप्सु दुष्टरो मृज्यमानो गभस्त्योः । सोमश्चमूषु सीदति ॥

वह वह्नि-शक्ति अप्सु (जल में) दुस्तर—अवरोधित करने में कठिन—है; गभस्त्योः (हाथों) में मृज्यमान होकर सोम चमूषु (पात्रों) में आसीन होता है; यज्ञकर्म के लिए सुसज्जित अन्तःपात्रों में अपने को स्थापित करता है।

Mantra 7

क्रीळुर्मखो न मंहयुः पवित्रं सोम गच्छसि । दधत्स्तोत्रे सुवीर्यम् ॥

हे सोम! तू अपने पराक्रम में क्रीड़ा करता, यज्ञ में उत्सुक होकर पवित्र करने वाले पवित्र (पवित्रम्) की ओर जाता है। स्तोत्र में तू सुवीर्य—वीर-शक्ति—को धारण करता है।

Frequently Asked Questions

Soma Pavamāna is Soma as he is being purified—flowing through the ritual filter—so he becomes fit for the gods and powerful for the sacrificer.

The woolen filter (pavitra/avya) is the key ritual instrument that clarifies Soma; the hymn uses it as a symbol of purification that turns raw force into luminous, beneficial power.

It asks for victory over opposition, steadfast prosperity (dhruva rayi), nourishing increase (iṣ), and heroic strength (suvīrya) that empowers both life and sacred speech.

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