
Sukta 9.16
Soma Pavamāna
यह पवमान सोम-सूक्त पिसे हुए सोम का स्तवन करता है, जो शिलाओं से निकलकर वेग से प्रवाहित होता है और ऊनी छलनी से छनकर देवताओं के योग्य तेजस्वी, मादक (प्रेरक) रस बन जाता है। इसमें सोम की तीव्र, धाराप्रवाह गति को अंतःशक्ति के जागरण—विशेषतः इन्द्र के पराक्रम—और उपासक में प्रज्ञा तथा प्राण-बल के तीक्ष्ण होने से जोड़ा गया है।
Mantra 1
प्र ते सोतार ओण्यो रसं मदाय घृष्वये । सर्गो न तक्त्येतशः ॥
हे सोम! तेरे लिए सोतार (रस-निष्पादक) मदा (आनन्द-उन्माद) और दीप्त तेज के लिए रस को आगे प्रवाहित करते हैं। वह छूटी हुई धारा की भाँति वेग से दौड़ता है, और हाँके गए शीघ्र अश्व की तरह तीव्र गति करता है।
Mantra 2
क्रत्वा दक्षस्य रथ्यमपो वसानमन्धसा । गोषामण्वेषु सश्चिम ॥
क्रतु (संकल्प-शक्ति) और दक्ष (विवेक-बल) से वह कुशल कर्म का रथ-पथ बनता है; अपः (जल) को वस्त्र की भाँति धारण कर, अन्धस् (पेषित-रस) सहित, वह सूक्ष्म पथों में विचरता हुआ गोषा (दीप्त गौएँ—ज्ञान-सम्पदा) को खोजता है।
Mantra 3
अनप्तमप्सु दुष्टरं सोमं पवित्र आ सृज । पुनीहीन्द्राय पातवे ॥
अप्सु (जल में) अनप्त—अवबद्ध न होने वाला, दुस्तर (दुर्लंघ्य) सोम को पवित्र (छन्नी) में छोड़ो। इन्द्र के पान के लिए उसे शुद्ध करो, ताकि वह दीप्त-बल का स्वामी स्पष्ट (पवित्र) आनन्द-रस का पान करे।
Mantra 4
प्र पुनानस्य चेतसा सोमः पवित्रे अर्षति । क्रत्वा सधस्थमासदत् ॥
जाग्रत् चेतना से शुद्ध हुआ सोम पवित्र (छन्नी) में होकर आगे प्रवाहित होता है। क्रतु—संकल्प और ऋत-प्रेरित शक्ति से वह सधस्थ (सामान्य अधिष्ठान) में आकर अपना आसन ग्रहण करता है॥
Mantra 5
प्र त्वा नमोभिरिन्दव इन्द्र सोमा असृक्षत । महे भराय कारिणः ॥
हे इन्द्र, नमस्कार-युक्त कर्मों से सोम-धाराएँ तेरी ओर आगे छोड़ी जाती हैं; भीतर के कारी (साधक-शक्तियाँ) उन्हें महत् भार—महान वहन, बल और सिद्धि के परिपूर्ण वहन—के लिए प्रवाहित करते हैं॥
Mantra 6
पुनानो रूपे अव्यये विश्वा अर्षन्नभि श्रियः । शूरो न गोषु तिष्ठति ॥
अव्यय रूप में अपने को शुद्ध करता हुआ वह समस्त श्रियों (दीप्तियों) की ओर प्रवाहित होता है। वीर के समान वह गोषु—रश्मियों/गवों के बीच—स्थिर खड़ा रहता है, ज्ञान की दीप्तिमान धेनुओं की रक्षा और धारण करता है॥
Mantra 7
दिवो न सानु पिप्युषी धारा सुतस्य वेधसः । वृथा पवित्रे अर्षति ॥
द्यौः के सानु (शिखर) के समान, वेधस् (कर्म-निपुण ऋषि) के निचोड़े हुए सोम की उफनती धारा पवित्र (पवित्रक) से होकर बहती है—व्यर्थ नहीं, अपितु कर्म-सिद्धि के लिए।
Mantra 8
त्वं सोम विपश्चितं तना पुनान आयुषु । अव्यो वारं वि धावसि ॥
हे सोम, तू अपने स्वभाव से स्वयं को शुद्ध करता हुआ, अवि (ऊन) के छननी-पथ से दौड़ता है; और आयुषु (जीवन-शक्तियों) को अधिकाधिक विपश्चित्—विवेकशील और प्रकाशमान—करता है।
It praises Soma as he is pressed and purified, describing his swift flow through the filter and his power to inspire ecstasy, strength, and clear understanding.
Indra is the chief receiver of Soma in many Vedic rituals; the hymn emphasizes that purified Soma strengthens Indra’s might and supports victorious, effective power.
Ritually, Soma is filtered through sheep’s wool to clarify the juice. Symbolically, it points to inner purification—refining the mind and life-force into brighter, more discerning awareness.
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