
Sukta 9.112
Soma (Indu) for Indra
Anushtubh-like (late/gnomic feel; exact meter needs confirm)
यह संक्षिप्त पवमान सूक्त सोम (इन्दु) की स्तुति करता है, जब वह शुद्ध किया जाकर इन्द्र के बलवर्धन हेतु प्रवाहित किया जाता है। विविध मानवीय व्यवसायों और प्रकृति की सहज प्रवृत्तियों के सजीव, लगभग लोकोक्तिपरक बिंबों के माध्यम से यह घोषित करता है कि यद्यपि मन और प्रयोजन भिन्न-भिन्न हैं, फिर भी सबका संगम उस यज्ञीय प्रवाह में होता है जो इन्द्र को सामर्थ्य देता और ऋत (व्यवस्था) को धारण करता है।
Mantra 1
नानानं वा उ नो धियो वि व्रतानि जनानाम् । तक्षा रिष्टं रुतं भिषग्ब्रह्मा सुन्वन्तमिच्छतीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥
निश्चय ही हमारी धियाँ (विचार) नाना प्रकार की हैं; मनुष्यों के व्रत/मार्ग भी विविध हैं। बढ़ई टूटी लकड़ी को खोजता है, वैद्य रोग को खोजता है, ब्रह्मा (पुरोहित) सोम-पेरने वाले यजमान को चाहता है—हे इन्दु, इन्द्र के लिए चारों ओर प्रवाहित हो।
Mantra 2
जरतीभिरोषधीभिः पर्णेभिः शकुनानाम् । कार्मारो अश्मभिर्द्युभिर्हिरण्यवन्तमिच्छतीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥
सूखी/जरित औषधियों से, पत्तों से—पक्षी पकड़ने वाले अपना प्रयोजन साधते हैं; लोहार पत्थरों और द्युभि (दीप्त अग्नियों/चमकते ताप) से स्वर्णसम्पन्न को खोजता है। हे इन्दु, इन्द्र के लिए चारों ओर प्रवाहित हो।
Mantra 3
कारुरहं ततो भिषगुपलप्रक्षिणी नना । नानाधियो वसूयवोऽनु गा इव तस्थिमेन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥
मैं वाणी का कारीगर हूँ; दूसरा वैद्य है; दूसरा पत्थर-प्रेस पर पीसने वाली है। हमारी धियाँ नाना प्रकार की हैं, वसु (समृद्धि) की चाह रखने वाली; हम सत्य के अनुयायी होकर, किरणों/गौओं की भाँति क्रम से स्थित हैं। हे इन्दु, इन्द्र के लिए चारों ओर और आगे बह।
Mantra 4
अश्वो वोळ्हा सुखं रथं हसनामुपमन्त्रिणः । शेपो रोमण्वन्तौ भेदौ वारिन्मण्डूक इच्छतीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥
अश्व सहज चलने वाला रथ वहन करता है; हर्ष में साथी-स्वर पुकारते और प्रत्युत्तर देते हैं। प्रेरक शक्ति अपने स्पन्दन से अवरोधों को भेदती है; जलों में मण्डूक भी (वर्षा/जागरण को) चाहता है। हे इन्दु, इन्द्र के लिए चारों ओर और आगे बह।
It says that people think and work in many different ways, but all these pursuits ultimately meet in the sacrificial flow of Soma, which strengthens Indra and brings prosperity.
These examples show everyday diversity in society: each profession seeks its own ‘object’ (wood, illness, the presser). The hymn uses this to point to a shared center—the Soma rite.
Soma (Indu) is directly praised as he flows and is purified, but the refrain makes the purpose clear: Soma is offered ‘for Indra,’ to empower Indra’s victorious, rain-bringing force.
Read Rig Veda in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with audio, word-by-word meanings, and more.