
Sukta 9.111
Soma Pavamāna
Jagati (likely due to longer pādas; needs confirm)
यह संक्षिप्त पवमान सूक्त सोम की स्तुति करता है—जब वह छननी में शुद्ध होता है, स्वर्णिम प्रकाश से दीप्त होता है और यज्ञ-विधि में प्रवाहित होते हुए समस्त वैर-शत्रुता पर विजय पाता है। सोम को गुप्त निधि का प्रकाशक, त्रिविध शक्तियों द्वारा प्राण-बल का संस्थापक, तथा दिव्य रथ के रूप में चित्रित किया गया है—जिसकी अग्रगामी ज्योति रण में इन्द्र की विजयी पराक्रम-शक्ति को सहारा देती है।
Mantra 1
अया रुचा हरिण्या पुनानो विश्वा द्वेषांसि तरति स्वयुग्वभिः सूरो न स्वयुग्वभिः । धारा सुतस्य रोचते पुनानो अरुषो हरिः । विश्वा यद्रूपा परियात्यृक्वभिः सप्तास्येभिॠक्वभिः ॥
इस स्वर्णिम रुचि से—स्वयं को पवित्र करता हुआ—वह अपने स्वयुग्व (स्वयं-जुते) अश्वों/रश्मियों के साथ समस्त द्वेषों को पार कर जाता है, जैसे सूर्य अपनी स्वयुग्व किरणों के साथ। पिष्ट सोम की धारा दीप्त होती है—पवित्र करता हुआ, अरुष-हरि (रक्ताभ-स्वर्ण) तेजस्वी। जब वह ऋक्व (ऋषि/स्तोत्रकर्ता) शक्तियों के साथ, सात-मुखी वाणी-शक्तियों के साथ, समस्त रूपों के चारों ओर परियत करता है।
Mantra 2
त्वं त्यत्पणीनां विदो वसु सं मातृभिर्मर्जयसि स्व आ दम ऋतस्य धीतिभिर्दमे । परावतो न साम तद्यत्रा रणन्ति धीतयः । त्रिधातुभिररुषीभिर्वयो दधे रोचमानो वयो दधे ॥
तू पणीों द्वारा छिपाए उस वसु (निधि) को खोज निकालता है; मातृभिः (मातृ-शक्तियों) के साथ उसे अपने ही धाम में मर्जय (शुद्ध) करता है—ऋत के दमे (गृह) में, धीतियों (अंतर्दृष्टि-कर्मों) द्वारा। परावत से आए साम के समान वह स्थान है जहाँ धीतयः (विचार-ध्वनियाँ) रणन्ति (गूँजती) हैं। रोचमान (दीप्त) होकर, त्रिधातुभिः अरुषीभिः (त्रिविध अरुण शक्तियों) से तू वयः (जीवन-बल) को स्थापित करता है—तू वयः को स्थापित करता है।
Mantra 3
पूर्वामनु प्रदिशं याति चेकितत्सं रश्मिभिर्यतते दर्शतो रथो दैव्यो दर्शतो रथः । अग्मन्नुक्थानि पौंस्येन्द्रं जैत्राय हर्षयन् । वज्रश्च यद्भवथो अनपच्युता समत्स्वनपच्युता ॥
वह पूर्व दिशा की ओर, स्पष्ट विवेक के साथ, अग्रसर होता है; अपनी किरणों से वह समेटा/जुटाया जाता है—उसका दृश्य रथ, वह दिव्य दृश्य रथ। पुरुषार्थी स्तुतियाँ इन्द्र के पास पहुँचीं, विजय के लिए उसे हर्षित करती हुई; और वज्र भी—जब तुम संग्रामों में अचल, अनपच्युत होते हो, अनपच्युत।
The main deity is Soma Pavamāna—Soma as he is pressed and filtered, praised as a shining purifier who empowers the gods, especially Indra.
It refers to Soma flowing through the ritual filter (pavitra). The hymn also uses it symbolically: purification turns raw energy into clear, radiant strength aligned with ṛta (truth/order).
Filtered Soma is offered to Indra to increase his strength. The hymn links Soma’s radiance and inspired hymns (ukthas) with Indra’s unwavering victory power, symbolized by the vajra (thunderbolt).
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