Rig Veda Sukta 106
Mandala 9Sukta 10614 Mantras

Sukta 106

Sukta 9.106

Devata

Indra (with Soma as the vehicle-offering)

यह पवमान सोम-सूक्त नव-निष्पीडित, स्वयंपवित्र सोम-धाराओं का स्तवन करता है, जो छननी से वेगपूर्वक बहकर पराक्रमी वृषभ इन्द्र के पास पहुँचती हैं। सोम की परिशुद्ध, ‘मधुर’ धारा की प्रशंसा की गई है कि वह दिव्य उन्माद/उत्साह (मद) जगाती है, विजय हेतु इन्द्र को बल देती है, और देवों तथा यजमानों को सौर लोक (स्वर) और अमरत्व प्रदान करती है।

Mantras

Mantra 1

इन्द्रमच्छ सुता इमे वृषणं यन्तु हरयः । श्रुष्टी जातास इन्दवः स्वर्विदः ॥

इन्द्र के पास ये निचोड़े हुए (सुता) सोम-बिंदु जाएँ—बल के वृषभ की ओर—हरित-पीत (हरयः) ऊर्जाएँ उन्हें वहन करें। ये इन्दवः श्रुष्टी (आज्ञापालन) में जन्मे हैं, स्वर्विदः—स्वर् (सूर्य-लोक) के खोजी; वे श्रवण-इच्छा को धारण कर दिव्य संकल्प को पूर्ण करते हैं।

Mantra 2

अयं भराय सानसिरिन्द्राय पवते सुतः । सोमो जैत्रस्य चेतति यथा विदे ॥

यह निचोड़ा हुआ सोम इन्द्र के लिए—धारण और प्राप्ति, जीत के लिए—पवित्र होकर बहता है। सोम विजयी चेतना को जगाता है, ताकि हम यथावत जानें—ताकि सही रीति से विद्या प्राप्त हो।

Mantra 3

अस्येदिन्द्रो मदेष्वा ग्राभं गृभ्णीत सानसिम् । वज्रं च वृषणं भरत्समप्सुजित् ॥

इसी सोम के मदों में इन्द्र उस विजयकारी ग्रास (ग्रहण) को पकड़ता है। वह वज्र और वृष-बल को साथ लाता है—अप्सुजित्, जलों में जय पाने वाला—प्रकाश-विजय के लिए शक्ति और ऋत-गति का संयोग करता है।

Mantra 4

प्र धन्वा सोम जागृविरिन्द्रायेन्दो परि स्रव । द्युमन्तं शुष्ममा भरा स्वर्विदम् ॥

हे सोम, जाग्रत होकर आगे बढ़; हे इन्दु, इन्द्र के लिए चारों ओर प्रवाहित हो। द्युमन्त शुष्म—दीप्तिमान पराक्रम, स्वर्विद् (स्वर-लोक को पाने वाला) तेज—ले आ।

Mantra 5

इन्द्राय वृषणं मदं पवस्व विश्वदर्शतः । सहस्रयामा पथिकृद्विचक्षणः ॥

हे विश्वदर्शत, इन्द्र के लिए वृष-स्वरूप मद में पवित्र हो। तुम सहस्र-यामा, सहस्र पथों पर चलने वाले; पथिकृत्, मार्ग-निर्माता; विचक्षण, दृष्टि में प्रखर—अन्तर्यात्रा के पथ खोलने वाला निर्मल आनन्द बनो।

Mantra 6

अस्मभ्यं गातुवित्तमो देवेभ्यो मधुमत्तमः । सहस्रं याहि पथिभिः कनिक्रदत् ॥

हे सोम! हमारे लिए तू गातुवित्तम—मार्ग का सर्वोत्तम अन्वेषक बन; देवों के लिए मधुमत्तम—अति-मधुररस से परिपूर्ण हो। सहस्र पथों से गमन कर, जाग्रत्-शक्ति की निनाद-ध्वनि करता हुआ।

Mantra 7

पवस्व देववीतय इन्दो धाराभिरोजसा । आ कलशं मधुमान्त्सोम नः सदः ॥

हे इन्दु! देववीति—देवों के आनन्दमय स्वागत हेतु—तू ओजस्वी धाराओं से पवित्र हो। हे मधुमान् सोम! कलश की ओर आ, और हमारे भीतर आसीन हो।

Mantra 8

तव द्रप्सा उदप्रुत इन्द्रं मदाय वावृधुः । त्वां देवासो अमृताय कं पपुः ॥

तेरे द्रप्स—ऊर्ध्वगामी, उदप्रुत—इन्द्र को मदाय, सामर्थ्य-उन्माद हेतु, बढ़ाते हैं। देवों ने तुझे अमृतत्व के लिए पिया—शुद्ध आनन्द को अमर द्रव्य में परिणत करके।

Mantra 9

आ नः सुतास इन्दवः पुनाना धावता रयिम् । वृष्टिद्यावो रीत्यापः स्वर्विदः ॥

हे नः सुत इन्दवः! तुम पवित्र होते हुए दौड़ते हुए हमारे पास आओ, और रयि—समृद्धि—को धारण करो। जिनका द्यौः वृष्टि है और जिनकी आपः प्रवाहित होती हैं—वे स्वर्विद्, सूर्य-लोक के अन्वेषक हैं।

Mantra 10

सोमः पुनान ऊर्मिणाव्यो वारं वि धावति । अग्रे वाचः पवमानः कनिक्रदत् ॥

सोम, स्वयं को पवित्र करता हुआ, ऊर्मि के साथ अवि-ऊन के वार (छन्ने) में से होकर धावता है। वाचः के अग्र में पवमान कनि॑क्रदत्—गूँजता-गरजता है, भीतर से वाणी को जगा देता है।

Mantra 11

धीभिर्हिन्वन्ति वाजिनं वने क्रीळन्तमत्यविम् । अभि त्रिपृष्ठं मतयः समस्वरन् ॥

धीभिः—प्रकाशमयी बुद्धियों से—वे वाजिनं, वाज-सम्पन्न शक्ति को, वने क्रीळन्तम्—वन में क्रीड़ा करते हुए, अवि के परे—उत्साहित करते हैं। त्रि-पृष्ठ—त्रि-पीठ वाले—की ओर मतयः एक साथ समस्वरन्—एकस्वर होकर गूँज उठती हैं।

Mantra 12

असर्जि कलशाँ अभि मीळ्हे सप्तिर्न वाजयुः । पुनानो वाचं जनयन्नसिष्यदत् ॥

वह कलशों की ओर, उदार दान के लिए, ऐसे छोड़ा गया है जैसे पूर्णता का अभिलाषी वेगवान अश्व। पवित्र होता हुआ वह वाणी को जन्म देता है और अविराम वेग से आगे बढ़ता जाता है।

Mantra 13

पवते हर्यतो हरिरति ह्वरांसि रंह्या । अभ्यर्षन्त्स्तोतृभ्यो वीरवद्यशः ॥

वह पवित्र होता है—आगे बढ़ने को आतुर स्वर्णिम हरि—और शीघ्र ही टेढ़े-मेढ़े विकारों से परे निकल जाता है। वह स्तोताओं की ओर धार बनकर बहता है, वीर-बल से समृद्ध यश-गौरव लाता हुआ।

Mantra 14

अया पवस्व देवयुर्मधोर्धारा असृक्षत । रेभन्पवित्रं पर्येषि विश्वतः ॥

इसी प्रकार पवित्र हो, देवों का अभिलाषी; मधु की धाराएँ मुक्त हो गई हैं। हे रेभन् (स्तोत्रगायक), तू पवित्र (पवित्रक) के चारों ओर सब दिशाओं से घूमता है—समस्त को निर्मल करता हुआ।

Frequently Asked Questions

It praises Soma as it is pressed and purified through the filter, then offered to Indra to increase his victorious power and to bring light (svar) and immortality (amṛta).

Indra is portrayed as becoming stronger and more ecstatic (mada) by drinking Soma; Soma is the sacrificial essence that fuels Indra’s cosmic victories and blessings for the worshippers.

Ritually, it is Soma being strained to become fit for offering; symbolically, it represents consciousness being clarified—so the divine force (Indra) can act with clean, luminous power.

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