Rig Veda Sukta 9
Mandala 8Sukta 920 Mantras

Sukta 9

Sukta 8.9

Rishi

Kāṇva tradition (Vatsa prominently)

Devata

Aśvinau

Chandas

Jagatī (probable due to longer line; requires metrical verification)

यह सूक्त अश्विनौ को अत्यन्त शीघ्रता से पुकारता है कि वे द्रष्टा वत्स और उसके जनों की सहायता करें—अभेद्य, व्यापक रक्षा दें और शत्रु शक्तियों को दूर भगाएँ। इसमें अश्विनों की पालक-शक्ति को तात्कालिक आश्रय से बढ़ाकर विश्वव्यापी संरक्षण तक फैलाया गया है—चलते-जगत् की, शरीर की, और संतान के भविष्य की रक्षा। अंत में स्वर अधिक अंतर्मुखी और चिंतनशील हो जाता है, जहाँ प्रेरित विचार और आशीर्वाद के द्वारा वे दोनों ‘आसन ग्रहण’ करते हुए प्रतिष्ठित होते हैं।

Mantras

Mantra 1

आ नूनमश्विना युवं वत्सस्य गन्तमवसे । प्रास्मै यच्छतमवृकं पृथु च्छर्दिर्युयुतं या अरातयः ॥

अब, हे अश्विनौ, तुम दोनों वत्स के अवस (सहायता) हेतु आओ। उसे विस्तृत, अवृक—जिसे कोई भेड़िया न तोड़ सके—ऐसा आश्रय प्रदान करो; और जो अरातयः (शत्रु-बल) आक्रमण करते हैं, उन्हें दूर हटा दो।

Mantra 2

यदन्तरिक्षे यद्दिवि यत्पञ्च मानुषाँ अनु । नृम्णं तद्धत्तमश्विना ॥

जो अन्तरिक्ष में है, जो द्युलोक में है, और जो पाँच जनों (पञ्च-मानुष) के पीछे-पीछे चलता है—वही नृम्ण (वीर-बल) हमें प्रदान करो, हे अश्विनौ।

Mantra 3

ये वां दंसांस्यश्विना विप्रासः परिमामृशुः । एवेत्काण्वस्य बोधतम् ॥

हे अश्विनौ, जिन विप्रों (प्रेरित ऋषियों) ने तुम्हारे दंस (अद्भुत कर्म) को स्पर्श कर परिमापित किया है—उसी ज्ञान से काण्व के आह्वान को जानो, जागो।

Mantra 4

अयं वां घर्मो अश्विना स्तोमेन परि षिच्यते । अयं सोमो मधुमान्वाजिनीवसू येन वृत्रं चिकेतथः ॥

हे अश्विनौ, यह तुम्हारा घर्म (उष्ण अर्घ्य) स्तोत्र से चारों ओर सिंचित किया जाता है। यह मधुमान् सोम है, हे वाजिनीवसू (समृद्धि के स्वामी); जिसके द्वारा तुम वृत्र (आवरणकर्ता) को पहचानते हो और उसका बन्धन तोड़ते हो।

Mantra 5

यदप्सु यद्वनस्पतौ यदोषधीषु पुरुदंससा कृतम् । तेन माविष्टमश्विना ॥

हे अश्विनौ! पुरुदंससा (अनेक अद्भुत कर्मों वाले) तुम दोनों ने जो कुछ अप्सुओं (जल-तत्त्व) में, वनस्पति-स्वामी में, और औषधियों में रचा/किया है—उसी अपने कृत-बल से मेरी रक्षा करो।

Mantra 6

यन्नासत्या भुरण्यथो यद्वा देव भिषज्यथः । अयं वां वत्सो मतिभिर्न विन्धते हविष्मन्तं हि गच्छथः ॥

हे नासत्यौ! चाहे तुम वेग से मार्ग पर दौड़ते हो, या हे देवो, चाहे तुम भिषज्यथः (चिकित्सा करके) ठीक करते हो—यह तुम्हारा यह वत्स (प्रिय बालक), अपनी मतियों से तुम्हें नहीं पा सकता; क्योंकि तुम हविष्मन्त (हविष्-समृद्ध यजमान) के पास ही जाते हो।

Mantra 7

आ नूनमश्विनोॠषिः स्तोमं चिकेत वामया । आ सोमं मधुमत्तमं घर्मं सिञ्चादथर्वणि ॥

अब अश्विनों का ऋषि तुम्हारे लिए आनंद-बल से स्तोम (स्तुति-हिम्न) को जगा दे; और अथर्वणि-विधि से वह सोम—अत्यन्त मधुमय—और घर्म (उष्ण अर्घ्य/उष्ण हवि) को उँडेल दे।

Mantra 8

आ नूनं रघुवर्तनिं रथं तिष्ठाथो अश्विना । आ वां स्तोमा इमे मम नभो न चुच्यवीरत ॥

हे अश्विनौ, अब तुम शीघ्र-गति से घूमने वाले अपने रथ पर आरूढ़ होओ। मेरे ये स्तोत्र तुम्हारी ओर उठते हैं; वे नभ की अचल ऊँचाई की भाँति न गिरते हैं, न डगमगाते हैं।

Mantra 9

यदद्य वां नासत्योक्थैराचुच्युवीमहि । यद्वा वाणीभिरश्विनेवेत्काण्वस्य बोधतम् ॥

हे नासत्यौ, यदि आज हमने उन्नत उक्थों (स्तुतिगीतों) से तुम्हें उद्बोधित किया हो, अथवा हे अश्विनौ, वाणियों—प्रेरित वचनों—से; तो काण्व के आह्वान को जानकर जाग्रत होओ।

Mantra 10

यद्वां कक्षीवाँ उत यद्व्यश्व ऋषिर्यद्वां दीर्घतमा जुहाव । पृथी यद्वां वैन्यः सादनेष्वेवेदतो अश्विना चेतयेथाम् ॥

जब कक्षीवान् ने तुम्हें पुकारा, और जब ऋषि व्यश्व ने तुम्हें पुकारा; जब दीर्घतमस् ने तुम्हें आह्वान किया, और जब पृथी वैण्य ने भी निवास-स्थानों के आसनों में—तब, हे अश्विनौ, अब भी हमारी ओर सचेत और सावधान होओ।

Mantra 11

यातं छर्दिष्पा उत नः परस्पा भूतं जगत्पा उत नस्तनूपा । वर्तिस्तोकाय तनयाय यातम् ॥

आओ—हमारे आश्रय के रक्षक; और हमारे लिए परे से (शत्रुबलों से) भी संरक्षण करने वाले बनो। चलायमान जगत् के पालक बनो, और हमारे तनु (देह) के भी रक्षक बनो। हमारे शिशु और संतान के लिए कल्याण-मार्ग (सुरक्षित पथ) लेकर आओ।

Mantra 12

यदिन्द्रेण सरथं याथो अश्विना यद्वा वायुना भवथः समोकसा । यदादित्येभिॠभुभिः सजोषसा यद्वा विष्णोर्विक्रमणेषु तिष्ठथः ॥

हे अश्विनौ! यदि इन्द्र के साथ एक ही रथ पर तुम यात्रा करते हो, अथवा वायु के साथ एक ही गृह में निवास करते हो; यदि आदित्यों और ऋभुओं के साथ एक ही आनन्दमय संगति में तुम संयुक्त हो, अथवा विष्णु के विक्रमणों (विस्तृत पदचापों) में तुम स्थित हो—तो यहाँ हमारे लिए स्मरण करो और हमारे कल्याण-उद्भव के लिए कर्म करो।

Mantra 13

यदद्याश्विनावहं हुवेय वाजसातये । यत्पृत्सु तुर्वणे सहस्तच्छ्रेष्ठमश्विनोरवः ॥

यदि आज मैं वाजसाति (वाज—बल-समृद्धि की प्राप्ति) के लिए अश्विनौ का आह्वान करूँ, तो युद्धों में, विजय-प्राप्ति हेतु, वही पराक्रम अश्विनों की सबसे श्रेष्ठ सहायता है।

Mantra 14

आ नूनं यातमश्विनेमा हव्यानि वां हिता । इमे सोमासो अधि तुर्वशे यदाविमे कण्वेषु वामथ ॥

अब ही आओ, हे अश्विनौ; तुम्हारे लिए ये हवियाँ सुव्यवस्थित रखी गई हैं। ये सोम तुर्वश के लिए बिछाए गए हैं, और ये ही कण्वों के बीच भी तुम्हारे लिए हैं—अतः आओ।

Mantra 15

यन्नासत्या पराके अर्वाके अस्ति भेषजम् । तेन नूनं विमदाय प्रचेतसा छर्दिर्वत्साय यच्छतम् ॥

हे नासत्यौ, जो भी भेषज दूर से हो या निकट से—उसी से अब, हे प्रचेतसौ, विमद को आश्रय-शान्ति प्रदान करो; वत्स को भी (वह) प्रदान करो।

Mantra 16

अभुत्स्यु प्र देव्या साकं वाचाहमश्विनोः । व्यावर्देव्या मतिं वि रातिं मर्त्येभ्यः ॥

मैं दिव्य वाणी के साथ, अश्विनों के लिए प्रकट हुआ हूँ। देवी ने विचार को और दान को खोल दिया है; उसने मर्त्यों के लिए अपना दीप्तिमय वरदान फैला दिया है।

Mantra 18

यदुषो यासि भानुना सं सूर्येण रोचसे । आ हायमश्विनो रथो वर्तिर्याति नृपाय्यम् ॥

हे उषा! जब तू अपनी किरण (भानु) के साथ चलती है और सूर्य के साथ संयुक्त होकर प्रकाशित होती है, तब निश्चय ही अश्विनों का यह रथ अपनी परिक्रामी गति में रक्षक-स्वामित्व (नृपाय्य) की ओर बढ़ता है।

Mantra 19

यदापीतासो अंशवो गावो न दुह्र ऊधभिः । यद्वा वाणीरनूषत प्र देवयन्तो अश्विना ॥

जब पूर्ण-परिपूर्ण किरणें, मानो थनों वाले गौओं की भाँति, दुग्ध-धारा उँडेलती हैं; और जब देव-यज्ञ की ओर अग्रसर होते हुए स्वर-ध्वनियाँ प्रत्युत्तर में गूँज उठती हैं—तब, हे अश्विनो, (सहायता सहित) आओ।

Mantra 20

प्र द्युम्नाय प्र शवसे प्र नृषाह्याय शर्मणे । प्र दक्षाय प्रचेतसा ॥

दीप्तिमय तेज के लिए आगे बढ़ो, पराक्रम के लिए आगे बढ़ो, शान्ति देने वाली नर-विजयी शक्ति के लिए आगे बढ़ो; दक्षता के लिए, प्रचेतस्—जाग्रत-बुद्धि—के लिए आगे बढ़ो।

Mantra 21

यन्नूनं धीभिरश्विना पितुर्योना निषीदथः । यद्वा सुम्नेभिरुक्थ्या ॥

हे अश्विनौ, जब तुम अभी दीप्त धियों द्वारा पिता के योनि-स्थान में आसीन होते हो; अथवा जब तुम अपने सुम्नों (अनुग्रहों) से—हे उक्थ्य, स्तुति-योग्य—(निकट आते हो), तब हमारे भीतर प्रतिष्ठित हो जाओ।

Frequently Asked Questions

They are the divine twin helpers—swift, youthful horsemen—invoked for rescue, healing, protection, and safe passage, especially at dawn and in times of danger.

It asks for a broad, unbreakable shelter, the driving away of hostile forces, protection of body and world, and a safe, secure future for children and descendants.

It is a vivid symbol for complete protection: a secure refuge that cannot be breached by threats (whether literal dangers, enemies, illness, or harmful influences).

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