
Sukta 8.86
Viśvaka
Aśvinau (Dasrā, Bhiṣajā, Mayobhūvā)
Jagatī (12-syllable cadence typical for longer pādas; refrain-like closing)
यह संक्षिप्त जगती-छन्द का सूक्त आश्विनौ—अद्भुत युगल वैद्य और आनन्द-प्रदाता—का आवाहन करता है। कवि उनसे प्रार्थना करता है कि वे ‘तनू को गढ़ें/देहधारी को रूप दें’ (तनूकृ-) और मैत्री का बन्धन अटूट रखें। बार-बार दोहराई गई याचनाओं में द्रष्टा विश्वक आश्विनों के उपकारों का स्मरण करता है और उनकी सहायता को ऋत (विश्व-व्यवस्था) के अधीन जीवन-समग्रता की रक्षा, समृद्धि तथा दृढ़ सहचर्य के रूप में प्रस्तुत करता है।
Mantra 1
उभा हि दस्रा भिषजा मयोभुवोभा दक्षस्य वचसो बभूवथुः । ता वां विश्वको हवते तनूकृथे मा नो वि यौष्टं सख्या मुमोचतम् ॥
तुम दोनों ही अद्भुत हो, तुम दोनों वैद्य-चिकित्सक हो, तुम दोनों आनंद-प्रदाता हो; तुम दोनों दक्षता और प्रेरित वाणी की शक्ति बन गए हो। इसलिए विश्वक तुम्हें तनू-निर्माण हेतु पुकारता है; हमें अलग न करो, मित्रता के बंधन को ढीला न छोड़ो—उसे मत तोड़ो।
Mantra 2
कथा नूनं वां विमना उप स्तवद्युवं धियं ददथुर्वस्यइष्टये । ता वां विश्वको हवते तनूकृथे मा नो वि यौष्टं सख्या मुमोचतम् ॥
अब वह व्याकुल-मन वाला तुम्हारे पास कैसे आए और तुम्हारी स्तुति करे, यदि तुम दोनों उत्तम अवस्था की चाह के लिए प्रकाशमयी धिया न दो? इसलिए विश्वक तुम्हें तनू-निर्माण हेतु पुकारता है; हमें अलग न करो, मित्रता के बंधन को छोड़ न दो—उसे मत खोलो।
Mantra 3
युवं हि ष्मा पुरुभुजेममेधतुं विष्णाप्वे ददथुर्वस्यइष्टये । ता वां विश्वको हवते तनूकृथे मा नो वि यौष्टं सख्या मुमोचतम् ॥
तुम दोनों ही, हे पुरुभुजौ, इस (यजमान) को समृद्धि में बढ़ाने के लिए—और विष्णापू के लिए भी, श्रेष्ठ की अभिलाषा हेतु—दान करते हो। इसलिए विश्वक तुम्हें देहधारी के गठन/संवर्धन के लिए पुकारता है; हमें अलग न करो, हमारी सख्य-डोर को मत खोलो।
Mantra 4
उत त्यं वीरं धनसामृजीषिणं दूरे चित्सन्तमवसे हवामहे । यस्य स्वादिष्ठा सुमतिः पितुर्यथा मा नो वि यौष्टं सख्या मुमोचतम् ॥
और उस वीर को—धनसमूहों के स्वामी, ऋजिषिण (सीधे चलाने वाले)—को, जो दूर स्थित हो तब भी, हम सहायता के लिए पुकारते हैं। जिसकी अति-स्वादिष्ट सुमति पिता के समान है—वह हमारी संगति को न ढीला करे, न बिखेरे; हमें सख्य-बंधन से मुक्त न करे।
Mantra 5
ऋतेन देवः सविता शमायत ऋतस्य शृङ्गमुर्विया वि पप्रथे । ऋतं सासाह महि चित्पृतन्यतो मा नो वि यौष्टं सख्या मुमोचतम् ॥
ऋत (सत्य-व्यवस्था) के द्वारा देव सविता शान्ति को प्राप्त होता है और कल्याण करता है; ऋत का शृंग उसने विशालता में दूर-दूर तक फैला दिया है। युद्ध में प्रयत्नशील महाबलों के विरुद्ध भी उसने हमारे लिए ऋत को जीत लिया है—वह हमारी संगति को न ढीला करे; हमें सख्य-बंधन से मुक्त न करे।
The hymn praises the Aśvins (Aśvinau), the divine twin helpers known as wondrous ones (Dasrā), healers (Bhiṣajā), and bringers of well-being (Mayobhūvā).
It asks them to restore and “shape” the embodied person (tanūkṛ-), bring well-being and growth, and not loosen the bond of supportive friendship (sakhyā) that keeps one safe and whole.
It is especially suited to dawn, the Aśvins’ time, as a morning prayer for health, protection, and steady support through the day, often alongside a simple ghee offering or quiet recitation.
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