
Sukta 8.83
Devas / Ādityas (collective divine powers; opening of a hymn that soon names Varuṇa, Mitra, Aryaman)
यह सूक्त समष्टि देवों—विशेषतः सार्वभौम आदित्यों (वरुण, मित्र, अर्यमन्)—का आह्वान करता है, जिन्हें उपासक भीतर और बाहर की शक्ति के लिए चुनी हुई, व्यापक और रक्षक ‘सहायता’ (अवः) मानता है। इसमें उनकी जागरूक चेतना, नैतिक शासन-व्यवस्था और दुष्टता को दूर भगाने की सामर्थ्य की स्तुति है; और अंत में इन्द्र के नेतृत्व वाले उदार दिव्य समुदाय को संबोधित किया गया है।
Mantra 1
देवानामिदवो महत्तदा वृणीमहे वयम् । वृष्णामस्मभ्यमूतये ॥
देवों की वही महान् सहायता—निश्चय ही—हम अपने लिए चुनते हैं, ताकि वृष्ण (बल-शक्तियाँ) हमारे भीतर, हमारी ऊति (रक्षा-सहायता) के लिए आएँ।
Mantra 2
ते नः सन्तु युजः सदा वरुणो मित्रो अर्यमा । वृधासश्च प्रचेतसः ॥
वरुण, मित्र, अर्यमा—वृद्धिदाता और प्रचेतस् (जाग्रत्-चेतना वाले)—वे सदा हमारे युज (जुए हुए) सहचर बनें।
Mantra 3
अति नो विष्पिता पुरु नौभिरपो न पर्षथ । यूयमृतस्य रथ्यः ॥
हे गृहाधिपतियो, अनेक नौकाओं से हमें जल के पार की भाँति, इस पार से उस पार पहुँचा दो। तुम ही ऋत (सत्य-व्यवस्था) के रथी हो।
Mantra 4
वामं नो अस्त्वर्यमन्वामं वरुण शंस्यम् । वामं ह्यावृणीमहे ॥
हे अर्यमन्, हमारे लिए कल्याणकारी और वरणीय हो; हे वरुण, हमारे लिए वह कल्याण हो जो प्रशंस्य/घोष्य है। हाँ, उसी कल्याण को हम चुनते और अपनाते हैं।
Mantra 5
वामस्य हि प्रचेतस ईशानाशो रिशादसः । नेमादित्या अघस्य यत् ॥
क्योंकि हे प्रचेतस्, तुम वांछित कल्याण के स्वामी हो, अहित के विनाशक हो। हे आदित्यो, पाप/अघ के आघात के आगे तुम नहीं झुकते।
Mantra 6
वयमिद्वः सुदानवः क्षियन्तो यान्तो अध्वन्ना । देवा वृधाय हूमहे ॥
हे सुदानवो! हम निश्चय ही—चाहे निवास करते हों या पथ पर चलते-यात्रा करते हों—हे देवो, अपनी वृद्धि और उन्नति के लिए तुम्हें आह्वान करते हैं।
Mantra 7
अधि न इन्द्रैषां विष्णो सजात्यानाम् । इता मरुतो अश्विना ॥
हे इन्द्र! और हे विष्णो! इन (दिव्य) शक्तियों की इस सजातीयता/कुटुम्ब-भाव पर हमें अधिष्ठित करो; और हे मरुतो, हे अश्विनौ, यहाँ आओ—हमारी गति-चाल का शासन करने के लिए।
Mantra 8
प्र भ्रातृत्वं सुदानवोऽध द्विता समान्या । मातुर्गर्भे भरामहे ॥
हे सुदानवो! हम भ्रातृत्व-भाव को आगे बढ़ाते हैं—बार-बार, समान एकत्व में—मानो माता के गर्भ में धारण किए गए हों, एक ही सामंजस्य में ढलने के लिए।
Mantra 9
यूयं हि ष्ठा सुदानव इन्द्रज्येष्ठा अभिद्यवः । अधा चिद्व उत ब्रुवे ॥
तुम ही निश्चय उदार दानवाले हो—इन्द्र को ज्येष्ठ और अग्रणी मानकर—दीप्तिमान स्वर्ग की ओर उर्ध्वगामी होकर; इसलिए मैं तुमसे यह वचन भी कहता हूँ।
The hymn begins with the collective Devas and quickly emphasizes the Ādityas—especially Varuṇa, Mitra, and Aryaman—then closes by addressing the Deva-host with Indra as leader.
The worshipper ‘chooses’ the Gods’ vast help for protection, inner strength, and freedom from harmful and evil influences, trusting the Ādityas’ moral and cosmic guardianship.
It is suited for recitation in a fire offering or daily prayer for protection and clarity—invoking the Ādityas for lawful order and Indra-like courage to overcome obstacles.
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